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सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला मामले पर केंद्र का बयान: धार्मिक आस्था का निर्णय नहीं कर सकतीं अदालतें

केंद्र सरकार ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखा है। उन्होंने धार्मिक स्वायत्तता का समर्थन करते हुए कहा कि अदालतें धार्मिक आस्था और परंपराओं के औचित्य पर निर्णय नहीं कर सकतीं। केंद्र का यह भी कहना है कि यह मामला लिंग आधारित भेदभाव से संबंधित नहीं है, बल्कि भगवान अयप्पा की विशिष्ट परंपरा से जुड़ा हुआ है। जानें इस महत्वपूर्ण मामले के बारे में और क्या कहा गया है।
 

केंद्र का धार्मिक स्वायत्तता का समर्थन


नई दिल्ली: सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर केंद्र सरकार ने मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में धार्मिक स्वायत्तता का समर्थन किया। केंद्र ने स्पष्ट किया कि अदालतों को धार्मिक आस्था और परंपराओं के औचित्य पर निर्णय लेने का अधिकार नहीं है। इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट की नौ-न्यायाधीशों की संविधान पीठ के समक्ष शुरू हुई, जिसमें केंद्र ने अपना हलफनामा पेश किया।


केंद्र का कहना है कि यह मामला धार्मिक आस्था से संबंधित है और अदालतें इस पर निर्णय नहीं कर सकतीं। हलफनामे में यह भी कहा गया कि सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं के प्रवेश पर रोक लिंग आधारित भेदभाव नहीं है, बल्कि यह भगवान अयप्पा की विशिष्ट परंपरा से जुड़ा हुआ है।


संवैधानिक नैतिकता और परंपराएं

केंद्र ने यह भी कहा कि संवैधानिक नैतिकता का उपयोग सदियों पुरानी परंपराओं को समाप्त करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए, जब तक कि वे अमानवीय या अनैतिक न हों। भारत की विविधता को ध्यान में रखते हुए, हर धर्म की अपनी मान्यताएं हैं, और अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान किया जाना चाहिए।


सामाजिक बुराई और धार्मिक प्रथा

जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि यदि कोई सामाजिक बुराई है जिसे धार्मिक प्रथा का नाम दिया गया है, तो अदालत उनके बीच अंतर कर सकती है। इस पर केंद्र ने कहा कि इसका समाधान अनुच्छेद 25(2)(बी) में है, जिसका अर्थ है कि संसद इस पर कानून बना सकती है।