नेशनल इंजीनियर्स डे: सर विश्वेश्वरैया के योगदान की याद
नेशनल इंजीनियर्स डे का महत्व
नई दिल्ली: हर वर्ष 15 सितंबर को भारत में नेशनल इंजीनियर्स डे मनाया जाता है। यह दिन महान इंजीनियर सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया की जयंती के अवसर पर मनाया जाता है। इस दिन हम उनके इंजीनियरिंग क्षेत्र में योगदान को याद करते हैं और तकनीकी विशेषज्ञों की देश के विकास में भूमिका को उजागर करते हैं। विश्वेश्वरैया ने सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और अपनी तकनीकी ज्ञान का उपयोग सिंचाई, जल प्रबंधन, उद्योग और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में किया।
विश्वेश्वरैया का व्यापक कार्य
सर एम. विश्वेश्वरैया का कार्य केवल एक परियोजना तक सीमित नहीं था। उन्होंने ऐसी योजनाओं पर काम किया, जिनका उद्देश्य लोगों की आवश्यकताओं को पूरा करना और विकास को बढ़ावा देना था। वह 1912 से 1918 तक मैसूर के दीवान रहे और इस दौरान उन्होंने शिक्षा, उद्योग और बुनियादी ढांचे के विकास पर जोर दिया। उनके प्रयासों से मैसूर में कई संस्थानों और उद्योगों को बढ़ावा मिला, जिसके कारण उन्हें 'मॉडर्न मैसूर का पिता' कहा गया।
जल प्रबंधन में उनकी प्रमुख पहल
कृष्णराज सागर बांध विश्वेश्वरैया के महत्वपूर्ण कार्यों में से एक है। कावेरी नदी पर बने इस बांध के निर्माण में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही, जिससे सिंचाई और जल आपूर्ति में सहायता मिली। इसके अलावा, पुणे के पास खडकवासला जलाशय में उन्होंने स्वचालित वाटर फ्लडगेट्स से जुड़ी सिंचाई व्यवस्था विकसित की, जिसने उन्हें इंजीनियरिंग में एक अलग पहचान दिलाई।
बाढ़ प्रबंधन की योजनाएँ
हैदराबाद में बाढ़ की समस्या से निपटने के लिए भी विश्वेश्वरैया ने महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने जल प्रबंधन और ड्रेनेज सिस्टम को विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके कार्य का एक बड़ा हिस्सा यह सुनिश्चित करने से संबंधित था कि पानी जैसी प्राकृतिक चुनौतियों को बेहतर तकनीकी उपायों के माध्यम से नियंत्रित किया जा सके। यही कारण है कि उन्हें भारत में जल प्रबंधन के प्रमुख इंजीनियरों में से एक माना जाता है।
औद्योगिक विकास में योगदान
विश्वेश्वरैया ने मैसूर के औद्योगिक विकास पर भी ध्यान केंद्रित किया। उनके प्रयासों से भद्रावती आयरन एंड स्टील वर्क्स और मैसूर संदल ऑयल एंड सोप फैक्टरी जैसे उद्योगों को बढ़ावा मिला। उनका मानना था कि किसी क्षेत्र का विकास केवल बुनियादी ढांचे तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि रोजगार और उद्योगों के विस्तार से भी जुड़ा होना चाहिए। मैसूर में उनके कार्यकाल के दौरान इसी सोच को आगे बढ़ाने का प्रयास किया गया।
शिक्षा में योगदान
विश्वेश्वरैया ने शिक्षा के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1917 में उन्होंने कर्नाटक में सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज की स्थापना में महत्वपूर्ण योगदान दिया। यह संस्थान आज यूनिवर्सिटी विश्वेश्वरैया कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग के नाम से जाना जाता है। उनके योगदान के लिए 1955 में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया। ब्रिटिश सरकार ने भी उन्हें नाइट कमांडर ऑफ द ऑर्डर ऑफ द इंडियन एम्पायर की उपाधि दी थी। 1962 में 102 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ।