×

अप्रैल फूल डे: मजेदार शरारतों की परंपरा का इतिहास

अप्रैल फूल डे हर साल 1 अप्रैल को मनाया जाता है, जब लोग अपने दोस्तों और परिवार के साथ मजेदार शरारतें करते हैं। इस परंपरा की शुरुआत के पीछे कई दिलचस्प कहानियाँ हैं, जिनमें फ्रांस का कैलेंडर विवाद और प्राचीन रोम का उत्सव शामिल हैं। जानें कि कैसे इस दिन की मजेदार परंपरा विकसित हुई और इसके पीछे के नियम क्या हैं।
 

अप्रैल फूल डे:


अप्रैल फूल डे: हर साल वसंत ऋतु के आगमन के साथ 1 अप्रैल का दिन आता है, जब लोग अपने दोस्तों और परिवार के साथ मजेदार शरारतें करने में जुट जाते हैं। इसे दुनिया भर में अप्रैल फ़ूल्स डे के रूप में मनाया जाता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि यह मजेदार परंपरा कैसे शुरू हुई? दिलचस्प बात यह है कि इतिहासकार इस परंपरा के सटीक उद्गम के बारे में सहमत नहीं हैं। आइए, इसके पीछे की कुछ प्रमुख थ्योरीज़ पर एक नज़र डालते हैं।


फ्रांस का कैलेंडर विवाद

इतिहासकारों के बीच सबसे प्रचलित थ्योरी 16वीं सदी के फ्रांस से संबंधित है। उस समय नया साल वसंत विषुव के आसपास, यानी 1 अप्रैल को मनाया जाता था। बाद में कैलेंडर में बदलाव किया गया और नए साल की शुरुआत 1 जनवरी से होने लगी। जिन लोगों को इस बदलाव की जानकारी देर से मिली या जो पुरानी परंपरा को बनाए रखना चाहते थे, वे 1 अप्रैल को जश्न मनाते रहे और उनका मजाक उड़ाया जाने लगा। ऐसे लोगों को अप्रैल फूल कहा जाने लगा। फ्रांस में आज भी इस दिन को Poisson d’Avril कहा जाता है, जहां बच्चे एक-दूसरे की पीठ पर कागज़ की मछली चिपका देते हैं।


प्राचीन रोम और गोथम गांव की किंवदंती

कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इस दिन की जड़ें प्राचीन रोमन उत्सव हिलारिया में हैं, जहां लोग भेष बदलकर और मौज-मस्ती करके मौसम के बदलाव का जश्न मनाते थे। वहीं, ब्रिटिश लोककथाओं के अनुसार, इसकी शुरुआत 13वीं सदी में नॉटिंघमशायर के गोथम गांव से हुई थी। जब राजा किंग जॉन ने गांव की जमीन पर शिकारगाह बनाने का प्रयास किया, तो गांव वालों ने खुद को पागल साबित करने के लिए अजीबोगरीब हरकतें कीं। राजा के सैनिक उन्हें बेवकूफ समझकर लौट गए। कहा जाता है कि गांव वालों की इसी चालाकी की याद में यह दिन मनाया जाता है।


दोपहर 12 बजे के बाद मजाक करना है मना

एक दिलचस्प नियम जो 1851 से चला आ रहा है, वह यह है कि अप्रैल फूल के प्रैंक्स केवल 1 अप्रैल की दोपहर 12 बजे तक ही मान्य होते हैं। मान्यता है कि दोपहर 12 बजे के बाद मजाक के पीछे का सच बता दिया जाना चाहिए। अगर कोई 12 बजे के बाद भी प्रैंक करता है, तो उसे सबसे बड़ा 'मूर्ख' माना जाता है।


इतिहास के 3 सबसे मशहूर 'प्रैंक्स'

पेड़ों पर उगती स्पेगेटी (1957): एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि स्विट्जरलैंड में पेड़ों पर स्पेगेटी उगती है। दर्शक इसे सच मानकर पेड़ उगाने के तरीके पूछने लगे थे.


काल्पनिक सैन सेरिफ़ द्वीप (1977): एक सैन सेरिफ नामक मनगढ़ंत द्वीप के लिए पूरी ट्रैवल गाइड छापी गई थी, जो असल में सेमी-कोलन (;) के आकार का था.


डिजिटल बिग बेन (1980): लंदन की मशहूर बिग बेन घड़ी अब पूरी तरह डिजिटल हो जाएगी, जिस पर लोगों ने खूब हंगामा किया था.