चंदेरी: ऐतिहासिक धरोहर और पर्यटन स्थल की खोज
चंदेरी का ऐतिहासिक महत्व
चंदेरी को भगवान श्रीकृष्ण की बुआ श्रुति के पुत्र शिशुपाल की राजधानी माना जाता है। इसका उल्लेख प्राचीन काल में चेदी राज्य के रूप में मिलता है। चंदेरी की भौगोलिक स्थिति ने इसे समृद्ध बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसे पहले चंद्रगिरि के नाम से जाना जाता था और यह बुंदेलखंड तथा मालवा की सीमा पर स्थित है। महाभारत में भी इसका उल्लेख किया गया है। यहां मालवा के सुल्तानों और बुंदेल के राजपूतों द्वारा निर्मित कई भव्य इमारतें देखी जा सकती हैं। नदी किनारे की गुफाओं में बने शैलचित्र सांस्कृतिक धरोहर और कलात्मकता का परिचय देते हैं।
चंदेरी की साड़ियाँ
चंदेरी की साड़ियाँ अपनी बुनाई और नफासत के लिए प्रसिद्ध हैं। ये साड़ियाँ न केवल स्थानीय बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी लोकप्रिय हैं।
चंदेरी में घूमने की जगहें
कोशक महल
खिलजी वंश के शासनकाल में निर्मित यह महल इस्लामी वास्तुकला का अद्भुत उदाहरण है। इसका चतुर्भुज आकार और त्रि-स्तरीय संरचना इसे विशेष बनाते हैं। महल के विशाल द्वार और झरोखे इसकी स्थापत्य कला को और भी आकर्षक बनाते हैं।
चंदेरी किला
यह किला 71 मीटर ऊँची पहाड़ी पर स्थित है और इसकी दीवारें 5 किमी लंबी हैं। किले तक पहुँचने के लिए तीन रास्ते हैं, जिनमें से एक पक्का रास्ता है। खूनी दरवाजा नामक द्वार से पैदल भी पहुँचा जा सकता है।
बत्तीसी बावड़ी
यह बावड़ी अफगान वास्तुकला का एक अद्भुत उदाहरण है। इसकी सुंदर सीढ़ियाँ और स्वागत द्वार इसे और भी भव्य बनाते हैं।
कटी घाटी
यह मार्ग चंदेरी के दक्षिणी किनारे पर स्थित है और इसे मालवा के सुलतान ग्यासुद्दीन खिलजी के स्वागत के लिए रातों-रात बनाया गया था।
शहजादी का रोजा
यह मकबरा चंदेरी के गवर्नर की बेटी मेहरुनिस्सा और एक सेनापति के अमर प्रेम का प्रतीक है। इसे 15वीं शताब्दी में बनवाया गया था।
यात्रा से जुड़ी जानकारी
चंदेरी का निकटतम रेलवे स्टेशन ललितुर है और भोपाल एयरपोर्ट से कैब लेकर यहाँ पहुँचा जा सकता है। यहाँ के स्थानीय व्यंजनों में मक्के की रोटी, दाल बाफला, रसखीर और सूजी के लड्डू शामिल हैं।
यहाँ घूमने का सबसे अच्छा समय अक्टूबर से मार्च के बीच है। दो लोगों के एक दिन रहने और खाने का खर्च लगभग 2.5 से 3 हजार रुपए तक आता है। यहाँ का तापमान अधिकतम 40 डिग्री सेल्सियस और न्यूनतम 15 से 20 डिग्री सेल्सियस तक रहता है।