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BRICS शिखर सम्मेलन में डिजिटल करेंसी पर चर्चा

नई दिल्ली में BRICS शिखर सम्मेलन में 12 और 13 सितंबर को 11 देशों के नेता भाग लेंगे। इस सम्मेलन में डॉलर पर निर्भरता कम करने और डिजिटल करेंसी के उपयोग को बढ़ावा देने पर चर्चा की जाएगी। भारत, चीन और रूस मिलकर अंतरराष्ट्रीय व्यापार में स्थानीय मुद्राओं के उपयोग को बढ़ाने की दिशा में प्रयास कर रहे हैं। जानें इस सम्मेलन में और क्या महत्वपूर्ण मुद्दे उठाए जाएंगे।
 

BRICS शिखर सम्मेलन का आयोजन


नई दिल्ली के भारत मंडपम में BRICS शिखर सम्मेलन 12 और 13 सितंबर को आयोजित किया जा रहा है, जिसमें 11 देशों के प्रमुख नेता भाग लेंगे। सम्मेलन से पहले, समूह के भीतर डॉलर पर निर्भरता कम करने और सीमा पार भुगतान को सरल बनाने पर चर्चा तेज हो गई है।


डॉलर की भूमिका को कम करने के प्रयास

भारत, चीन और रूस लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अमेरिकी डॉलर की भूमिका को घटाने और स्थानीय मुद्राओं के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए प्रयासरत हैं। इस संदर्भ में, भारत BRICS देशों के बीच केंद्रीय बैंकों की डिजिटल करेंसी के उपयोग को बढ़ावा देने का प्रस्ताव रख सकता है।


डिजिटल करेंसी की कनेक्टिविटी

रिपोर्टों के अनुसार, भारत किसी एक साझा करेंसी या एकीकृत भुगतान नेटवर्क के पक्ष में नहीं है, जिसे सीधे डॉलर या SWIFT के विकल्प के रूप में देखा जाए। भारत का ध्यान विभिन्न देशों की डिजिटल मुद्राओं को आपस में जोड़ने पर है। इस प्रस्ताव के तहत, सदस्य देश अपनी-अपनी केंद्रीय बैंक डिजिटल करेंसी को एक तकनीकी व्यवस्था के माध्यम से कनेक्ट कर सकते हैं। इस मॉडल में, प्रत्येक देश अपनी डिजिटल मुद्रा पर नियंत्रण बनाए रखेगा। उदाहरण के लिए, भारत का ई-रुपया, चीन का डिजिटल युआन और रूस का डिजिटल रूबल अपनी-अपनी व्यवस्था में रहेंगे, लेकिन इनके बीच लेनदेन करना सरल हो जाएगा। इससे व्यापार के लिए किसी तीसरे देश की मुद्रा पर निर्भरता कम हो सकती है।


UPI से मिली दिशा

भारत इस मॉडल में अपने डिजिटल भुगतान अनुभव को आधार बना रहा है। UPI ने देश में तेज और सरल डिजिटल लेनदेन की व्यवस्था को व्यापक स्तर पर स्थापित किया है। भारत का मानना है कि इसी तरह विभिन्न देशों की भुगतान प्रणालियों को जोड़ने की दिशा में भी काम किया जा सकता है।


डिजिटल सेटलमेंट मॉडल का कार्यप्रणाली

प्रस्तावित व्यवस्था में भुगतान के लिए डिजिटल सेटलमेंट साइकिल का उपयोग किया जा सकता है। इसमें हर लेनदेन का तत्काल भुगतान करने के बजाय, एक निश्चित अवधि के दौरान दोनों देशों के बीच हुए आयात-निर्यात का हिसाब जोड़ा जाएगा। उदाहरण के लिए, यदि किसी अवधि में भारत चीन से 500 अरब रुपये का सामान खरीदता है और चीन भारत से 450 अरब रुपये का आयात करता है, तो दोनों लेनदेन का हिसाब मिलाकर केवल 50 अरब रुपये के अंतर का भुगतान करना होगा।