CBSE 12वीं रिजल्ट विवाद: ऑन-स्क्रीन मार्किंग प्रणाली पर उठे सवाल
CBSE 12वीं रिजल्ट में विवाद
केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) द्वारा 12वीं कक्षा के परिणामों की घोषणा के बाद विवादों का एक नया दौर शुरू हो गया है। इस विवाद का मुख्य कारण ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OMS) प्रणाली है, जिसे इस वर्ष बोर्ड ने कॉपियों की जांच के लिए लागू किया। इस कार्य के लिए कोएम्प्ट एडुटेक प्राइवेट लिमिटेड नामक कंपनी को जिम्मेदारी सौंपी गई थी। रिपोर्टों के अनुसार, CBSE अब इस कंपनी के खिलाफ कार्रवाई करने की योजना बना रहा है। एक रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि जब OMS प्रणाली को लागू करने पर विचार किया जा रहा था, तब बोर्ड ने 32 बिंदुओं पर चिंता व्यक्त की थी।
कोएम्प्ट एडुटेक प्राइवेट लिमिटेड पर सवाल
CBSE के टेंडर प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। यह पहली बार नहीं है जब कोएम्प्ट एडुटेक प्राइवेट लिमिटेड पर विवाद के आरोप लगे हैं। 2019 में, तेलंगाना में इंटरमीडिएट रिजल्ट में 3.8 लाख से अधिक छात्र फेल हो गए थे, जिसके लिए कंपनी पर मूल्यांकन में गड़बड़ी के आरोप लगे थे। उस समय इस कंपनी का नाम ग्लोबारेना टेक्नोलॉजीज था। अब सवाल यह उठता है कि CBSE ने विवादित कंपनी को इतना बड़ा टेंडर क्यों दिया?
OSM प्रणाली का विवरण
इस विवाद को समझने के लिए OMS प्रणाली के बारे में जानना आवश्यक है। यह प्रणाली बोर्ड द्वारा समय की बचत के लिए लागू की गई है, जिसमें फिजिकल कॉपियां टीचर्स को चेकिंग के लिए नहीं भेजी जातीं, बल्कि उन्हें स्कैन की गई कॉपियां डिजिटल फॉर्मेट में दी जाती हैं। बोर्ड का दावा है कि इससे पेपर चेकिंग में तेजी आएगी। हालांकि, कंपनी ने स्कैनिंग में कई गलतियां की, जिससे टीचर्स को कॉपियों की सही छवि नहीं मिली और परिणाम में त्रुटियां आईं।
CBSE टेंडर प्रक्रिया की टाइमलाइन
रिपोर्टों के अनुसार, इस प्रक्रिया के लिए टेंडर तीन बार जारी किया गया, जिसमें कई खामियां सामने आईं। पहला टेंडर फरवरी 2025 में जारी हुआ, लेकिन बाद में इसे सार्वजनिक रिकॉर्ड से हटा दिया गया। दूसरा टेंडर मई 2025 में हुआ, जिसमें चार कंपनियों ने आवेदन किया, लेकिन सभी को अयोग्य घोषित कर दिया गया। अंततः तीसरे टेंडर में नियमों में बदलाव कर कोएम्प्ट एडुटेक प्राइवेट लिमिटेड को योग्य ठहराया गया।
आरोपों की गंभीरता
दो बार टेंडर निकालने के बाद भी कंपनियों को अयोग्य घोषित किया गया, लेकिन तीसरी बार नियमों में बदलाव कर कोएम्प्ट को टेंडर दिया गया। इसमें सबसे बड़ा बदलाव यह था कि पुरानी गड़बड़ियों के कारण कंपनियों को अयोग्य ठहराने का नियम हटा दिया गया। इसके अलावा, औसत टर्नओवर की सीमा को 50 करोड़ कर दिया गया और सॉफ्टवेयर की गुणवत्ता मानक को भी कम किया गया।
खराब प्रदर्शन के बावजूद चयन
अब सवाल यह उठता है कि जब कोएम्प्ट एडुटेक प्राइवेट लिमिटेड का रिकॉर्ड खराब था, तो उसे टेंडर क्यों दिया गया? अधिकारियों का कहना है कि CBSE ने टेंडर निकाला था और इस कंपनी ने सबसे कम बोली लगाई थी। बताया गया है कि CBSE ने 40 पन्नों की कॉपी को स्कैन करने के लिए इस कंपनी को केवल 25 रुपये प्रति कॉपी का भुगतान किया। अधिकारियों का कहना है कि गलती सॉफ्टवेयर की नहीं, बल्कि मानवीय भूल के कारण हुई है।