CBSE के डिजिटल मार्किंग सिस्टम पर छात्रों का गुस्सा: क्या तकनीक ने किया भरोसा तोड़?
नई दिल्ली में छात्रों की बढ़ती चिंताएं
नई दिल्ली: शिक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और गति लाने के उद्देश्य से लागू की गई तकनीक अब लाखों छात्रों के लिए समस्या बन गई है। CBSE के ऑन स्क्रीन मार्किंग सिस्टम (OSM) को लेकर देशभर में चिंताएं बढ़ गई हैं। छात्रों का कहना है कि उनके प्रयासों का सही मूल्यांकन नहीं किया गया है। कई स्थानों पर अंक में गड़बड़ी की शिकायतें आई हैं, जबकि कुछ छात्रों ने बताया कि उन्हें अपेक्षा से बहुत कम अंक मिले। इस पर सोशल मीडिया पर छात्रों और उनके अभिभावकों का गुस्सा खुलकर सामने आया है।
OSM प्रणाली का परिचय
CBSE ने पिछले कुछ वर्षों में कॉपियों की जांच प्रक्रिया को डिजिटल बनाने के लिए ऑन स्क्रीन मार्किंग सिस्टम को लागू किया। इस प्रणाली के तहत छात्रों की उत्तर पुस्तिकाओं को स्कैन करके डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अपलोड किया जाता है। परीक्षक कंप्यूटर स्क्रीन पर बैठकर कॉपियों की जांच करते हैं और अंक सीधे सिस्टम में दर्ज किए जाते हैं। बोर्ड का दावा है कि इससे जांच में पारदर्शिता बढ़ेगी और मानवीय त्रुटियों की संभावना कम होगी।
स्क्रीन पर विवाद
पहले परीक्षक हाथ से कॉपियां जांचते थे, लेकिन अब कई छात्रों ने आरोप लगाया है कि स्क्रीन पर कॉपियां सही तरीके से नहीं खुलीं। कुछ पृष्ठ गायब थे या अंक दर्ज करने में तकनीकी समस्याएं आईं। इस कारण वही प्रणाली विवादों में आ गई है, जिसे भविष्य का मॉडल माना जा रहा था। कुछ छात्रों ने कहा कि कॉपियों के स्कैन धुंधले थे, जिससे उत्तर स्पष्ट नहीं पढ़े जा सके।
छात्रों की समस्याएं
सबसे अधिक शिकायतें कम अंक आने को लेकर हैं। कई छात्रों ने बताया कि उन्होंने स्कूल और प्री-बोर्ड परीक्षाओं में अच्छा प्रदर्शन किया था, लेकिन बोर्ड के परिणाम में उन्हें उम्मीद से कम अंक मिले। कुछ छात्रों ने कहा कि उनके करियर की दिशा बदल गई है क्योंकि अच्छे कॉलेजों में प्रवेश के लिए कटऑफ बढ़ गई है। अभिभावकों ने भी कहा कि इस विवाद ने बच्चों के आत्मविश्वास को प्रभावित किया है।
सिस्टम पर भरोसा टूटता जा रहा है
रीचेकिंग के लिए आवेदन करने वालों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है। कई छात्रों और अभिभावकों का कहना है कि उन्हें अपने बच्चों की मेहनत पर भरोसा है, लेकिन सिस्टम पर विश्वास टूट गया है। कुछ मामलों में छात्रों ने आरोप लगाया कि उनके उत्तर पूरी तरह से जांचे नहीं गए। तकनीकी समस्याओं के कारण कई छात्रों को शिकायत दर्ज करने में कठिनाई हुई।
मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव
इस विवाद का सबसे बड़ा असर छात्रों की मानसिक स्थिति पर पड़ा है। रिजल्ट खराब आने के बाद कई छात्र तनाव और अवसाद का सामना कर रहे हैं। अभिभावकों का कहना है कि एक तकनीकी गलती किसी छात्र के करियर को प्रभावित कर सकती है। मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि बोर्ड रिजल्ट पहले से ही छात्रों पर मानसिक दबाव डालते हैं।
सोशल मीडिया पर गुस्सा
जैसे ही रिजल्ट विवाद बढ़ा, सोशल मीडिया पर छात्रों और अभिभावकों का गुस्सा खुलकर सामने आया। X, इंस्टाग्राम और फेसबुक पर हजारों पोस्ट वायरल होने लगीं। छात्रों ने #CBSERecheck और #JusticeForStudents जैसे हैशटैग चलाए। यह मुद्दा अब केवल शिक्षा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बन गया है।
CBSE की सफाई
विवाद बढ़ने के बाद CBSE ने सफाई दी है कि ऑन स्क्रीन मार्किंग सिस्टम पूरी तरह सुरक्षित और पारदर्शी है। बोर्ड का कहना है कि कॉपियों की जांच कई स्तरों पर की जाती है। हालांकि, कुछ मामलों में तकनीकी त्रुटियों की संभावना को नकारा नहीं किया जा सकता।
शिक्षा मंत्री का बयान
केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि छात्रों की समस्याओं को गंभीरता से लिया जा रहा है। उन्होंने अधिकारियों को जांच और सुधार के निर्देश दिए हैं। मंत्री के बयान के बाद छात्रों को कुछ राहत मिली है, लेकिन सवाल अब भी बने हुए हैं।
छात्रों को राहत की उम्मीद
CBSE ने संकेत दिए हैं कि जिन छात्रों को अपने नंबरों पर संदेह है, उन्हें री-इवैल्यूएशन और रीचेकिंग का मौका दिया जाएगा। शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि अगर तकनीकी गड़बड़ी साबित होती है, तो बोर्ड को सिस्टम ऑडिट करवाना पड़ सकता है।
भविष्य का सवाल
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या डिजिटल सिस्टम छात्रों का भविष्य सुरक्षित कर पाएगा? तकनीक ने शिक्षा प्रणाली को तेज और आधुनिक बनाया है, लेकिन क्या यह पूरी तरह भरोसेमंद है? यह विवाद केवल नंबरों का नहीं, बल्कि उस भरोसे का है जो लाखों छात्र और उनके परिवार शिक्षा प्रणाली पर करते हैं।