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फरीदाबाद के युवक ने अस्पताल में लापरवाही का आरोप लगाया, हाथ गंवाने की कहानी

फरीदाबाद के अंकित राठौर ने अस्पताल में लापरवाही का आरोप लगाते हुए मुख्यमंत्री से न्याय की मांग की है। 29 वर्षीय अंकित की फूड पाइप सर्जरी के बाद उनका हाथ सुन्न पड़ गया, जिसके चलते उन्हें गैंग्रीन हो गया और अंततः हाथ काटना पड़ा। इस मामले में कानूनी पहलुओं और डॉक्टरों की जिम्मेदारी पर चर्चा की गई है। जानें इस दर्दनाक घटना के पीछे की पूरी कहानी और क्या हो सकता है आगे।
 

अंकित राठौर की दर्दनाक कहानी

फरीदाबाद के अंकित राठौर, जिनकी उम्र 29 वर्ष है, 2 जून को लखनऊ के डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल में भर्ती हुए थे। उनकी तबीयत खराब होने पर डॉक्टरों ने फूड पाइप की सर्जरी की। प्रारंभ में उनकी स्थिति स्थिर रही, लेकिन कुछ दिनों बाद उनका एक हाथ सुन्न पड़ गया। जब उन्होंने अस्पताल के स्टाफ से इसकी शिकायत की, तो उनकी बात को नजरअंदाज कर दिया गया। अंततः, उन्हें अपना हाथ गंवाना पड़ा।


लापरवाही का आरोप

अंकित ने सरकार को एक पत्र लिखा है, जिसमें उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से न्याय की मांग की है। उनका कहना है कि डॉक्टरों ने समय पर ध्यान नहीं दिया, जिससे गैंग्रीन की स्थिति उत्पन्न हुई और अंततः हाथ काटना पड़ा। गैंग्रीन तब होती है जब किसी अंग में रक्त प्रवाह रुक जाता है, जिससे ऊतक सड़ने लगते हैं।


हाथ काटने का कारण

अंकित की फूड पाइप सर्जरी 8 जून को हुई थी, जिसके बाद उनका बायां हाथ सुन्न हो गया। उन्होंने अस्पताल में इसकी शिकायत की, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। 19 जून तक संक्रमण फैल गया और गैंग्रीन हो गया। डॉक्टरों ने इसके लिए अपनी जिम्मेदारी से इनकार कर दिया।


कानूनी पहलू

एडवोकेट स्निग्धा त्रिपाठी ने बताया कि भारतीय दंड संहिता की धारा 304 (ए) के तहत लापरवाही से हुई मौत के लिए 2 साल की सजा का प्रावधान है। इसके अलावा, धारा 336, 337 और 338 भी लापरवाही से होने वाले अपराधों के लिए सजा निर्धारित करती हैं।


डॉक्टरों की कानूनी सुरक्षा

एडवोकेट स्निग्धा ने बताया कि भारत में डॉक्टरों को लापरवाही के मामलों में सजा नहीं मिलने का एक कारण कानूनी सुरक्षा है। भारतीय दंड संहिता की धारा 88 और 92 के तहत, यदि डॉक्टर मरीज की भलाई के इरादे से इलाज करता है, तो उसे दोषी नहीं ठहराया जा सकता।


सजा दिलाने में कठिनाई

सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के अनुसार, किसी डॉक्टर को लापरवाही के लिए तभी जिम्मेदार ठहराया जा सकता है जब वह सामान्य चिकित्सा मानकों से नीचे गिर जाए। इसके लिए एक मेडिकल बोर्ड की राय लेना आवश्यक है, जिससे यह साबित हो सके कि लापरवाही गंभीर थी।


सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

जैकब मैथ्यू बनाम पंजाब राज्य (2005) के मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि डॉक्टर को लापरवाही के लिए तभी जिम्मेदार ठहराया जा सकता है जब उसके द्वारा की गई देखभाल में कमी हो।