☰
×

FSSAI का नया मसौदा: बच्चों के खाद्य उत्पादों में चीनी पर रोक

भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने बच्चों के लिए खाद्य उत्पादों में सुक्रोज और फ्रक्टोज के उपयोग पर रोक लगाने का नया मसौदा पेश किया है। यह कदम छोटे बच्चों को अतिरिक्त चीनी से बचाने और उनके स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के उद्देश्य से उठाया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि जीवन के पहले छह महीने में बच्चों को केवल मां का दूध ही मिलना चाहिए। जानें इस मसौदे के पीछे के कारण और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की राय।
 

बच्चों के लिए खाद्य नियमों में बदलाव

भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने बच्चों के पोषण से संबंधित नियमों में संशोधन के लिए एक नया मसौदा प्रस्तुत किया है। इस ड्राफ्ट में प्रस्तावित है कि 6 महीने तक के शिशुओं के लिए बनाए जाने वाले खाद्य उत्पादों में सुक्रोज और फ्रक्टोज का उपयोग नहीं किया जाएगा। सुक्रोज सामान्य चीनी है, जबकि फ्रक्टोज फलों और शहद में प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला मीठा तत्व है।


नए नियमों का उद्देश्य

यह मसौदा खाद्य सुरक्षा और मानक (शिशु पोषण के लिए खाद्य) नियम, 2020 में संशोधन के लिए है। पहले के नियमों के अनुसार, 6 महीने तक के बच्चों के आहार में सीमित मात्रा में सुक्रोज और फ्रक्टोज मिलाने की अनुमति थी, लेकिन अब इसे पूरी तरह से प्रतिबंधित करने का प्रस्ताव है।


FSSAI का यह निर्णय छोटे बच्चों को अतिरिक्त चीनी से बचाने के लिए लिया गया है, क्योंकि यह मोटापे और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि पहले 6 महीने में बच्चों को केवल मां का दूध ही मिलना चाहिए।


मसौदे का उद्देश्य और प्रक्रिया

FSSAI चाहता है कि लोग और स्वास्थ्य विशेषज्ञ इस मसौदे पर अपनी राय दें। सभी सुझावों पर विचार करने के बाद ही इस नियम को अंतिम रूप दिया जाएगा। वर्तमान में, जन्म से लेकर 24 महीने तक के बच्चों के लिए डिब्बाबंद आहार में पोषण, गुणवत्ता और सुरक्षा के कड़े मानक लागू हैं।


लैक्टोज और ग्लूकोज पॉलिमर को ऊर्जा और कार्बोहाइड्रेट के लिए सबसे अच्छा विकल्प माना गया है, जबकि सुक्रोज और फ्रक्टोज केवल आवश्यकता पड़ने पर ही सीमित मात्रा में मिलाने की अनुमति है।


FSSAI की चिंताएं

FSSAI का मानना है कि जीवन के पहले छह महीने बच्चे के स्वास्थ्य और विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं। इस उम्र में बच्चों के आहार में बिना अतिरिक्त चीनी के उनकी पोषण संबंधी आवश्यकताओं को पूरा किया जाना चाहिए।


नए मसौदे का उद्देश्य बच्चों में मीठे खाने की आदतों और मोटापे जैसे स्वास्थ्य जोखिमों को रोकना है। यह पहल मां के दूध को प्राथमिकता देने और कंपनियों को सुरक्षित विकल्प विकसित करने के लिए प्रेरित करती है।


वर्तमान नियम और प्रस्तावित बदलाव

वर्तमान नियमों के अनुसार, जन्म से 24 महीने तक के बच्चों के लिए बने शिशु पोषण उत्पादों के पोषण, गुणवत्ता और सुरक्षा के मानक निर्धारित हैं। नए मसौदे में प्रस्तावित है कि 6 महीने तक के शिशुओं के लिए उत्पादों में सुक्रोज और फ्रक्टोज का उपयोग नहीं किया जाएगा।


FSSAI का लक्ष्य है कि इस उम्र के बच्चों के उत्पाद उनकी पोषण संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करें और उनमें अतिरिक्त चीनी न हो।


स्वास्थ्य विशेषज्ञों की राय

सीनियर न्यूट्रिशनिस्ट सुनीत खन्ना का कहना है कि 2 से 18 साल के बच्चों को रोजाना 6 चम्मच से कम चीनी दी जानी चाहिए। अधिक चीनी से मोटापा, टाइप 2 डायबिटीज और अन्य स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं।


डॉ. सप्तर्षि भट्टाचार्य का कहना है कि भारत में 10 से 14 प्रतिशत बच्चे मोटापे का शिकार हैं। बचपन में शुरू होने वाला खान-पान भविष्य में स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकता है।


अमेरिकी अध्ययन के निष्कर्ष

अमेरिका के नेशनल सेंटर फॉर बायोटेक्नोलॉजी इन्फॉर्मेशन की एक स्टडी में पाया गया कि कम आय वाले परिवारों के बच्चों में फॉर्मूला दूध में अतिरिक्त चीनी की वजह से तेजी से वजन बढ़ रहा है।


शोधकर्ताओं ने 234 मां और बच्चों पर अध्ययन किया और पाया कि फॉर्मूला दूध में बच्चों को ठोस खाने की तुलना में अधिक चीनी मिल रही थी।


कंपनियों पर कार्रवाई

FSSAI ने नेस्ले, एबॉट और जायडस वेलनेस जैसी कंपनियों को नोटिस भेजा है। यह नोटिस बच्चों के दूध के पाउडर और पोषण पेय कॉम्प्लान के विज्ञापनों में किए गए दावों को लेकर है।


कंपनियों से पूछा गया है कि उनके पास इन दावों को साबित करने के लिए क्या ठोस वैज्ञानिक सबूत हैं।


भारत में चीनी की स्थिति

भारत में बिकने वाले कई बहुराष्ट्रीय ब्रांड के उत्पादों में यूरोपीय बाजारों की तुलना में अधिक चीनी पाई गई है। उदाहरण के लिए, भारत में स्प्राइट में प्रति 100 मिली 11.7 ग्राम चीनी है, जबकि यूरोप में यह केवल 4.4 ग्राम है।


इकनॉमिक सर्वे 2025-26 के अनुसार, भारत में मोटापा तेजी से बढ़ रहा है और यह एक बड़ी स्वास्थ्य चुनौती बन गया है।


सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियाँ

सुप्रीम कोर्ट ने FSSAI से पूछा है कि पैकेज्ड फूड पर शुगर, नमक और सैचुरेटेड फैट की चेतावनी वाले लेबल लगाने में इतना समय क्यों लग रहा है।


FSSAI ने बताया कि नई व्यवस्था के लिए नियम बनाने और अधिसूचना जारी करने में समय लग रहा है।