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IAS अधिकारी अशोक खेमका का चुनाव आयोग पर कड़ा बयान

IAS अधिकारी अशोक खेमका ने चुनाव आयोग में चल रहे विवाद पर अपनी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने आयोग की पारदर्शिता की आवश्यकता पर जोर दिया है, साथ ही चुनाव आयोग की विश्वसनीयता को लेकर जनता की चिंताओं को भी उजागर किया है। खेमका का यह बयान ऐसे समय में आया है जब आयोग पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। जानें इस मुद्दे पर उनके विचार और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर उठते सवालों के बारे में।
 

चुनाव आयोग के विवाद पर खेमका की प्रतिक्रिया

IAS अधिकारी अशोक खेमका ने चुनाव आयोग में चल रहे विवाद पर अपनी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने एक समाचार रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि आयोग को पारदर्शी तरीके से कार्य करना चाहिए। खेमका ने बताया कि रिपोर्ट में किए गए खुलासे ने चुनाव आयोग की विश्वसनीयता को लेकर जनता की चिंताओं को और बढ़ा दिया है।


पारदर्शिता की आवश्यकता

खेमका के अनुसार, तीनों चुनाव आयुक्तों को पारदर्शिता, सामूहिकता और कानून के दायरे में रहकर कार्य करना चाहिए। उन्होंने कहा कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों की वैधता के लिए चुनाव आयोग पर जनता का भरोसा होना आवश्यक है।


अशोक खेमका का बयान

अशोक खेमका, पूर्व IAS अधिकारी:-
'द इंडियन एक्सप्रेस' के खुलासे ने चुनाव आयोग की विश्वसनीयता को लेकर जनता की चिंताएं बढ़ा दी हैं। तीनों आयुक्तों को पारदर्शिता, आपसी सहयोग और कानून के दायरे में रहकर काम करना चाहिए। स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों की वैधता के लिए ECI में जनता का भरोसा बहुत जरूरी है।


बयान का महत्व

यह बयान ऐसे समय में आया है जब चुनाव आयोग पर सवाल उठ रहे हैं। ज्ञानेश कुमार पर आरोप है कि वह अपने सहयोगियों की बातों को नजरअंदाज कर रहे हैं और उनकी आपत्तियों पर ध्यान नहीं दे रहे हैं। कॉकरोच जनता पार्टी ने उनके इस्तीफे की मांग करते हुए आंदोलन जारी रखने की घोषणा की है।


अशोक खेमका की पहचान

अशोक खेमका 1991 बैच के हरियाणा कैडर के IAS अधिकारी हैं। वह 30 अप्रैल 2025 को ट्रांसपोर्ट विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव के पद से सेवानिवृत्त हुए थे। उन्हें 2012 में रॉबर्ट वाड्रा और DLF के बीच भूमि सौदे का म्यूटेशन रद्द करने के कारण राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली। अपने 33 साल के करियर में, उन्हें 57 बार तबादले का सामना करना पड़ा और वह भ्रष्टाचार के खिलाफ मुखर रहे हैं।


रिपोर्ट में उठाए गए सवाल

एक समाचार रिपोर्ट में यह सामने आया है कि चुनाव आयोग के दो आयुक्तों ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार मुख्य चुनाव आयुक्त के निर्णयों पर आपत्ति जताई है। उन्होंने आरोप लगाया कि कई निर्णय उनकी जानकारी के बिना लिए गए। इनमें नए मतदाताओं को जोड़ने और मतदाता सूची के सॉफ्टवेयर पर नियंत्रण जैसे मुद्दे शामिल हैं।


अनबन का कारण

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने फॉर्म-6 में किए गए बदलाव को अवैध बताया है। उन्होंने चेतावनी दी थी कि मतदाता डेटाबेस को दिल्ली में केंद्रित करने से राज्य स्तर के अधिकारियों को दरकिनार किया जा रहा है।


चुनाव आयोग पर उठते सवाल

रिपोर्ट के प्रकाशन के बाद, चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगे हैं। विभिन्न सामाजिक संगठनों और राजनीतिक दलों ने आयोग की आलोचना की है। आयोग ने असहमतियों को सुझाव बताया है और इन आरोपों से इनकार किया है। शनिवार को तीनों अधिकारियों ने एक साथ अपनी बात रखी और कहा कि पिछले एक साल में सभी निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए हैं।