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ISRO का PSLV-C62 मिशन: तकनीकी विफलता ने उठाए सवाल, क्या होगी अगली रणनीति?

ISRO's PSLV-C62 mission, launched with great anticipation, faced significant technical failures during its third stage, leading to the loss of crucial satellites, including the EOS-N1. The mission's initial phases were successful, but communication was lost shortly after the third stage began. This incident raises concerns about the reliability of solid fuel motors and the impact on India's commercial launch services. ISRO has committed to analyzing the data to identify the root cause and ensure that such issues do not recur in future missions. The agency's history of resilience suggests that India will continue to advance its space program despite setbacks.
 

PSLV-C62 की उड़ान का प्रारंभ


सुबह ठीक 10:17 बजे PSLV-C62 ने अपनी उड़ान भरी, जिससे देशभर में उत्साह का माहौल था। पहले दो चरणों में रॉकेट ने बेहतरीन प्रदर्शन किया और स्टेज अलग होने की प्रक्रिया भी सामान्य रही। मिशन कंट्रोल ने किसी खतरे का संकेत नहीं पाया, जिससे सभी को सफलता की उम्मीद थी।


तीसरे चरण में आई समस्या

जैसे ही रॉकेट का तीसरा चरण शुरू हुआ, तकनीकी समस्याएं सामने आईं। मिशन कंट्रोल को आवश्यक टेलीमेट्री डेटा प्राप्त होना बंद हो गया, जो संकेत था कि सिस्टम में कुछ गड़बड़ है। इसके बाद उड़ान पथ में बदलाव देखा गया और रॉकेट की स्थिरता प्रभावित होने लगी, जिससे मिशन पर खतरा मंडराने लगा। कुछ ही मिनटों में संपर्क टूट गया।


इसरो की प्रतिक्रिया

इसरो ने जानकारी दी कि तीसरे चरण के अंत तक रॉकेट सामान्य था, लेकिन इसके बाद रोलिंग मूवमेंट में गड़बड़ी आई। फ्लाइट पाथ भी निर्धारित मार्ग से भटक गया, जिसके कारण सैटेलाइट्स को उनकी ऑर्बिट में नहीं पहुंचाया जा सका। इसरो के प्रमुख वी नारायणन ने कहा कि डेटा की गहन जांच की जा रही है और सभी पहलुओं पर ध्यान दिया जा रहा है।


मुख्य सैटेलाइट की पहचान

इस मिशन का मुख्य पेलोड EOS-N1 था, जिसे अन्वेषा के नाम से भी जाना जाता है। यह सैटेलाइट समुद्री गतिविधियों की निगरानी के लिए विकसित किया गया था और इसे डीआरडीओ द्वारा डिजाइन किया गया था। इसकी विफलता से भारत को समुद्र में होने वाली गतिविधियों पर नजर रखने में बड़ा नुकसान हुआ है।


अन्य सैटेलाइट्स का उद्देश्य

PSLV-C62 में कुल 16 सैटेलाइट्स शामिल थे, जिनमें छात्र सैटेलाइट्स और कुछ प्राइवेट कंपनियों के प्रयोगात्मक सैटेलाइट्स भी थे। इसमें स्पेन का एक री-एंट्री डेमो सैटेलाइट भी शामिल था। इन सभी को 505 किलोमीटर की ऊंचाई पर स्थापित करने का लक्ष्य था, लेकिन अब सभी का संपर्क टूट गया है, जो कई परियोजनाओं के लिए एक बड़ा झटका है।


तकनीकी विफलता के सवाल

बार-बार आ रही तकनीकी समस्याओं ने चिंता बढ़ा दी है। रॉकेट के सॉलिड फ्यूल मोटर की विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगे हैं और क्वालिटी चेक को लेकर चर्चा तेज हो गई है। इससे प्राइवेट स्पेस कंपनियों का भरोसा प्रभावित हो सकता है और भारत की कमर्शियल लॉन्च सेवाओं पर भी असर पड़ेगा। हालांकि, इसरो ने आश्वासन दिया है कि सुधार के लिए कदम उठाए जाएंगे।


इसरो की भविष्य की रणनीति

इसरो अब सभी डेटा का विश्लेषण करेगा और तकनीकी गड़बड़ी की असली वजह का पता लगाएगा। अगले मिशनों में वही गलती नहीं दोहराई जाएगी। देश का स्पेस प्रोग्राम आगे बढ़ता रहेगा और हर असफलता से सीख ली जाएगी। इसरो का इतिहास यही दर्शाता है कि जल्द ही भारत फिर से नई उड़ान भरेगा।