ISRO ने सेमी-क्रायोजेनिक इंजन का सफल परीक्षण किया, 2040 तक चंद्रमा पर कदम रखने की योजना
ISRO का महत्वपूर्ण परीक्षण
बेंगलुरु। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने अपने सेमी-क्रायोजेनिक इंजन पावर हेड का 88 प्रतिशत लक्ष्य क्षमता (Thrust) पर सफलतापूर्वक 'हॉट टेस्ट' किया है। यह परीक्षण तमिलनाडु के इसरो प्रोपल्शन कॉम्प्लेक्स में संपन्न हुआ, जो नए प्रणोदन प्रणाली के विकास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हुआ है। इस परीक्षण के दौरान 175 टन के थ्रस्ट स्तर पर इंजन पूरी तरह से स्थिर रहा।
ISRO के चेयरमैन का बयान
ISRO के अध्यक्ष वी. नारायणन ने बेंगलुरु में 17वें एयर चीफ मार्शल एल.एम. कत्रे मेमोरियल लेक्चर में कहा कि जिस क्रायोजेनिक तकनीक को अन्य देशों ने भारत को देने से मना कर दिया था, उसमें अब भारत ने महारत हासिल कर ली है। वर्तमान में देश के पास तीन क्रायोजेनिक प्रोपल्शन सिस्टम हैं और इस प्रक्रिया में कई विश्व रिकॉर्ड भी स्थापित हुए हैं। LVM3 की ताकत बढ़ेगी, क्योंकि अगला लक्ष्य 200 टन थ्रस्ट रखा गया है। इससे पहले 47 प्रतिशत और 60 प्रतिशत थ्रस्ट पर भी सफल परीक्षण किए जा चुके हैं।
चंद्रमा पर कदम रखने की योजना
2040 तक चंद्रमा पर कदम रखने की तैयारी
वी. नारायणन ने इसे एक बड़ी सफलता बताते हुए कहा कि यह परीक्षण थ्रस्ट चैंबर को छोड़कर किया गया था। गगनयान मिशन पर चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि यह एक अत्यधिक तकनीक-प्रधान मिशन है। तीन मानव रहित मिशन को इंसानों को अंतरिक्ष में भेजने से पहले वाहन की सुरक्षा जांचने के लिए अंतरिक्ष में भेजा जाएगा। इन तीनों में से पहले मिशन की तारीख की घोषणा जल्द की जाएगी। ISRO के भविष्य के रोडमैप और महत्वपूर्ण मिशनों की जानकारी साझा करते हुए उन्होंने कहा कि भारत अपने पहले मानव रहित गगनयान मिशन की तैयारी कर रहा है। इसके साथ ही चंद्रमा से नमूने लाने के लिए Chandrayaan-4 और जापान के साथ मिलकर एक भारी रोवर वाले Long-term Chandrayaan-5 मिशन पर काम आगे बढ़ रहा है।
भारत का अंतरिक्ष विज्ञान में लक्ष्य
साल 2035 तक ISRO का लक्ष्य भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन स्थापित करना और साल 2040 तक चंद्रमा पर भारतीय अंतरिक्ष यात्री को उतारना है। अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में भारत की यह प्रगति आत्मनिर्भरता और वैश्विक शक्ति बनने की दिशा में महत्वपूर्ण निर्णय है।