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अंग संस्कृति का महापर्व, चंपानगर में बिहुला-विषहरी पूजा की धूम, सतीत्व और लोक आस्था का महासंगम

 


भागलपुर, 13 अगस्त (हि.स.)।

अंग प्रदेश की ऐतिहासिक धरती और सिल्क सिटी भागलपुर का चंपानगर क्षेत्र इन दिनों पूरी तरह भक्तिमय हो गया है। मां मनसा (विषहरी) और सती बिहुला की पावन स्मृति में मनाया जाने वाला लोक आस्था का महापर्व 'बिहुला-विषहरी पूजा' पारंपरिक श्रद्धा और उल्लास के साथ शुरू हो गया है।

चंपानगर स्थित मुख्य विषहरी मंदिर (मंझूषा मंदिर) में सुबह से ही माता के दर्शन और डलिया चढ़ाने के लिए श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ रही है। ढोल-ढाक की थाप और पारंपरिक लोक गीतों से पूरा माहौल गुंजायमान है। उल्लेखनीय है कि यह पर्व अंग जनपद के ऐतिहासिक चंपानगर के शासक चांद सौदागर, उनके पुत्र बाला लखेंद्र और पुत्रवधू सती बिहुला की पौराणिक कथा से जुड़ा है।

कथा के अनुसार, शिव भक्त चांद सौदागर ने मां मनसा (विषहरी) की पूजा करने से इनकार कर दिया था। मां मनसा के कोप के कारण चांद सौदागर के छह बेटों की मौत हो गई। सातवें बेटे बाला लखेंद्र को नाग दंश से बचाने के लिए लोहे का बासरघर (लोहे का महल) बनाया गया, लेकिन मां मनसा की आज्ञा से नाग ने उसे भी डस लिया।

पति की मृत्यु के बाद सती बिहुला हार नहीं मानी। वह अपने पति के शव को केले के थम (नाव) पर रखकर देवलोक (इंद्रपुरी) के लिए निकल पड़ीं। रास्ते में कई बाधाओं का सामना करते हुए, अपने सतीत्व और दृढ़ संकल्प के बल पर उन्होंने देवताओं को प्रसन्न किया। बिहुला ने न केवल अपने पति बाला लखेंद्र को पुनर्जीवित कराया, बल्कि चांद सौदागर के अन्य छह बेटों को भी वापस पा लिया।

इसके बाद चांद सौदागर ने मां मनसा की पूजा स्वीकार की। तब से सतीत्व, प्रेम और नाग पूजा के प्रतीक के रूप में यह पर्व मनाया जाता है।

चंपानगर मंदिर सहित शहर के विभिन्न मंदिरों में मां मनसा, सती बिहुला, बाला लखेंद्र और चांद सौदागर की भव्य मिट्टी की प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं। पूजा में अंग प्रदेश की प्रसिद्ध मंजूषा कला' का विशेष महत्व है। मंदिर और डलिया को इस कला से सजाया जाता है, जिसमें बिहुला की पूरी गाथा चित्रों के माध्यम से दर्ज होती है। श्रद्धालु बांस की बनी विशेष टोकरी (डलिया) में दूध, लावा (धान का खील), फूल, फल और अंकुरित अनाज रखकर मां विषहरी को अर्पित करते हैं।

नाग देवता को प्रसन्न करने के लिए दूध और लावा का विशेष भोग लगाया जाता है। रात भर मंदिरों में 'बिहुला-विषहरी' की संगीतमय लोक गाथा का गायन होता है। कलाकार पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ बिहुला के संघर्ष की कहानी सुनाते हैं, जिसे सुनने दूर-दूर से लोग आते हैं। यह पर्व सती बिहुला के अदम्य साहस और पतिव्रता धर्म को नमन करता है। यह समाज को संदेश देता है कि दृढ़ संकल्प से नियति को भी बदला जा सकता है।

अंग प्रदेश के इस पर्व में नाग (सर्प) को देवता मानकर पूजा जाता है। यह पर्यावरण, जीव-जंतुओं और मानव के बीच सह-अस्तित्व और प्रकृति प्रेम को दर्शाता है। बिहुला-विषहरी पूजा के माध्यम से अंग प्रदेश की प्राचीन लोक कला 'मंजूषा' और क्षेत्रीय लोक गीतों को जीवित रखा जा रहा है। यह पर्व नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ता है। चंपानगर मंदिर में बिना किसी भेदभाव के हर वर्ग के लोग एक साथ मिलकर पूजा-अर्चना करते हैं, जो सामाजिक एकता का अनूठा उदाहरण है। चंपानगर विषहरी पूजा समिति के पदाधिकारियों के अनुसार, इस वर्ष श्रद्धालुओं की सुविधा और सुरक्षा के लिए विशेष इंतजाम किए गए हैं। तीन दिवसीय इस मेले में बिहार ही नहीं, बल्कि पड़ोसी राज्यों झारखंड और पश्चिम बंगाल से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु चंपानगर पहुंच रहे हैं।

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हिन्दुस्थान समाचार / बिजय शंकर