होली पर्व : बलिया के गड़हांचल में फूहड़ता से दूर युवा —बुजुर्ग मिलकर संभाल रहें फाग की विरासत
बलिया, 03 मार्च (हि.स.)। उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में होली के अवसर पर गाया जाने वाला फाग अध्यात्म और दर्शन का मिला जुला स्वरूप है। जनपद बलिया में बिहार से सटे गड़हांचल के नाम से मशहूर क्षेत्र में पुरनियों ने फाग गीतों की समृद्ध विरासत को सहेजने के साथ -साथ उससे नई पीढ़ी को जोड़ने का बखूबी काम किया है। इलाके के भरौली गांव में पारम्परिक गीतों को फूहड़ता और आधुनिकता से बदरंग होने से बचाते हुए वसंत पंचमी के बाद से हर शाम दलानों में बुजुर्गों और नौजवानों के सजे गोल में परंपरागत वाद्य 'डाफ' पर जब पूरे जोश से थाप पड़ती है तो उम्र कहीं पीछे छूटती नजर आने लगती है। डाफ के साथ 'झाल' की झंकार से तरंगित ऊर्जा श्रोताओं को रोमांचित कर देती है। हालांकि, होली की समृद्ध परंपरा के वाहक कलाकार फाग की जगह लेते जा रहे फूहड़ गीतों से बेहद आहत हैं। उनका मानना है कि ग्रामीण संस्कृति और परंपराओं को बचाए रखने के लिए फाग गीतों का चलन जारी रहना चाहिए।
एक ओर जहां मोबाइल, सोशल मीडिया और डिजिटल मनोरंजन ने लोगों को खुद तक सीमित कर दिया है। वहीं, उत्तर प्रदेश के बलिया एक ऐसा इलाका है, जहां होली की समृद्ध परम्परा फाग युवाओं को भी जोड़े हुए है। 'बिरज में हरि होरी मचाई, इतसे आवत नवल राधिका, उत से कुंवर कन्हाई। खेलत फाग परस्पर हिल मिल, शोभा बरनी न जाई, घरे-बाजत बधाई...।' इस तरह के गीत होली के दस दिन पहले से गड़हांचल के गांवों में सुनाई देने लगते हैं। इन्हें गाने वाले वाले कलाकार चर्चित नहीं बल्कि गांव-घर के पुरनिया हैं। इनके 'गोल' में युवाओं की मौजूदगी उम्मीद जगाती है कि यह समृद्ध परंपरा आगे बढ़ती रहेगी।
भरौली गांव में होली से पहले और उसके बाद बुढ़वा मंगल तक हर शाम गुझिया-मिठाई और चाय-नमकीन के साथ-साथ 'ठंडई' के बीच फाग की स्वर लहरिया खूब आकर्षित करती हैं।
सैकड़ों सालों से चली आ रही अपनी इस समृद्ध विरासत पर भरौली के लोगों ने हिन्दुस्थान समाचार से बात की। वर्तमान दौर में होली गीतों के नाम पर परोसी जा रही अश्लीलता से आहत वयोवृद्ध अक्षय कुमार राय ने कहा कि होली सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि यह सामाजिक समरसता और हमारी परंपराओं का प्रतीक पर्व है। वसंत पंचमी से ही ग्रामीण इलाकों में फाग गायन शुरू हो जाता है जो होली के बाद मंगलवार (बुढ़वा मंगल) तक होता है। उन्होंने कहा कि यह परम्परा सिर्फ भरौली में ही नहीं है। गड़हांचल और उसके आसपास के गांवों में भी पीढ़ी दर पीढ़ी कायम है।
मशहूर भोजपुरी गायक गोपाल राय के पिता शिवनारायण राय गामा ने कहा कि पहले गांव-गांव में वसंत पंचमी के बाद से ही फाग सुनाई देने लगता था। रात में चोपाल सजती थी, ढोल-नगाड़े चजते थे और 'सदा आनंद रहे एहि द्वारे, मोहन खेले होली' जैसे गीत गूंजते थे। उन्हाेंने बताया कि हमारे गांव में नारदीय रामायण गायन की परंपरा भी बहुत पुरानी है। सुखद है कि इस परंपरा को आगे बढ़ाने में युवा भी सहयोग कर रहे हैं।
भरौली निवासी पेशे से शिक्षक संजय कुमार राय ने बताया कि फाग गाने वालों की संख्या कम हुई है। आसपास के गावों में फाग परंपरा दम तोड़ती नजर आ रही है। लेकिन सुखद है कि हमारे यहां आज भी लोग सामूहिक रूप से ढोलक-मजीरा पर फाग गायन करते हुए उत्सव मनाते हैं। राय ने बताया कि पहले गांवों में जोगीरा की टोली घर-घर जाकर गीत गाती थी। रिटायर्ड शिक्षक विनोद राय बताते हैं कि होली गिले-शिकवे भुलाने का पर्व है। होलिका दहन के दूसरे दिन लोग होलिका स्थल पर पहुंच राख को सिर-माथे पर लगाते हैं। वहीं से फाग गाते हुए वापस आते हैं। साल भर के गिले-शिकवे पल भर में दूर हो जाते हैं।
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हिन्दुस्थान समाचार / नीतू तिवारी