बसंत आ रहा है, शुरू हो गई बाबा बैद्यनाथ धाम में पावन आनन्द की बेला
-डॉ. मयंक चतुर्वेदी
देवघर के बाबा बैद्यनाथ धाम में बसंत पंचमी का पावन पर्व आते ही चारों ओर शिवमय वातावरण छा गया है। द्वादश ज्योतिर्लिंगों में माने जाने वाले इस पावन धाम पर श्रद्धा का ऐसा सैलाब उमड़ पड़ा है, मानो हिमालय की गोद से निकली गंगा की धारा बाबा के चरणों में समा रही हो। हर ओर 'बोल बम! जय बाबा बैद्यनाथ!' के उद्घोष गूंज रहे हैं। सड़कें, मैदान, मंदिर परिसर इस वक्त सब कुछ भक्तों की भक्ति-भावना से सराबोर हो चुका है। यह दृश्य देखकर मन में एक अजीब सी भावुकता जाग उठती है और परम आनन्द से आनन्दित मन, मतिष्क, ह्दय और इस सब के साथ संपूर्ण शरीर नृत्य कर उठता है, जैसे भगवान शंकर स्वयं अपने भक्तों को साक्षात् दर्शन देने यहां आ गए हों।
वैसे बसंत पंचमी शुक्रवार 23 जनवरी को है। देशभर में मां सरस्वती की आराधना के साथ ही देवघर में बाबा बैद्यनाथ का पारंपरिक तिलकोत्सव धूमधाम से होगा। तिलक-अभिषेक के बाद लाखों श्रद्धालु अबीर-गुलाल की होली में डूब जाएंगे। देखा जाए तो यह मिथिलांचल और देवघर की सांस्कृतिक आस्था का जीवंत प्रतीक है। कल्पना कीजिए, सुबह के उजाले में बाबा के ज्योतिर्लिंग पर फुलेल चढ़ता हुआ, पुजारियों की मंत्रोच्चार से वातावरण गुंजायमान और भक्तों की आंखों में अपने आराध्य शक्ति एवं शिव के प्रति अपार श्रद्धा।
असली कहानी तो उन भक्तों की है, जिनकी आस्था हिमालय जितनी ऊंची और गंगा जितनी गहरी है। मिथिलांचल की लोकमान्यता यही कहती है कि देवी पार्वती पर्वतराज हिमालय की पुत्री हैं और भगवान शंकर मिथिला के दामाद। मिथिलांचल; नेपाल की तराई से बिहार के विस्तृत भाग तक फैला यह क्षेत्र शिव-पार्वती के विवाह की सांस्कृतिक धरोहर से जुड़ा है। महाशिवरात्रि पर होने वाले दिव्य विवाह से ठीक 25 दिन पहले, बसंत पंचमी को मिथिलांचल के लाखों भक्त देवघर पहुंचकर बाबा का तिलक करते हैं। यह तिलक रस्म है और अपने दामाद को सजाने की ससुराल वाली ममता का प्रतीक भी है। वस्तुत: यह धाम माता सती के हृदय पीठ (हृदय) से जुड़ा है और मनोकामनाओं को पूरा करने वाला मनोकामना लिंग कहलाता है
इस बार भी मिथिलांचल से एक लाख से अधिक श्रद्धालु पहले ही देवघर पहुंच चुके हैं। दरभंगा, मधुबनी, सहरसा, पूर्णिया, कटिहार, कोसी क्षेत्र, मुजफ्फरपुर, समस्तीपुर, सीतामढ़ी, मधेपुरा, मुंगेर और नेपाल के तराई इलाकों से ये भक्त पैदल, साइकिल या ट्रक पर सवार होकर आए हैं। देवघर के हर कोने में मिथिला का रंग छाया है। मधुबनी की महिलाएं मैथिली गीत गा रही हैं, “हरि अनंत हरि कथा अनंता...” और पुरुष नचारी के ताल पर थिरक रहे हैं। पूरा शहर गुलजार है।
खास बात यह है कि ये भक्त होटल या धर्मशाला में ठहरने को तैयार नहीं। वे खुले मैदानों, सड़कों के किनारे या पेड़ों की छांव में रुकते हैं। इन्हें अपने दामाद के घर जाकर ठहरना शोभा नहीं देता, यही उनकी मान्यता है। रातें वे आग के ढेर के पास बैठकर भजन गाते काटते हैं। एक युवा भक्त मुस्कुराते हुए कहते हैं, “बाबा खुश होंगे तो स्वयं जगह बना देंगे।” यह त्याग और श्रद्धा का अनुपम दृष्य है, जिसे देखकर आधुनिक जीवन की भागदौड़ में सादगी सहज याद आ जाती है।
सबसे भावुक क्षण तो सुल्तानगंज से शुरू होने वाली 108 किलोमीटर की कठिन कांवड़ यात्रा का है। बिहार के सुल्तानगंज से गंगा का पवित्र जल भरकर ये भक्त नंगे पैर पैदल चलते हैं। रास्ते भर नचारी और वैवाहिक गीत गाते हुए वे भोलेनाथ को रिझाते हैं-“ए दामाद जी, आइस विद लई...।” पथरीले रास्ते, चढ़ाई, बारिश कुछ भी उन्हें रोक नहीं पाता। इस बार भी सैकड़ों कांवड़िए पहुंच चुके हैं। एक कांवड़िए की आंखें नम हो जाती हैं जब वे बताते हैं, “पिछले साल पत्नी की बीमारी ठीक हुई बाबा की कृपा से। इस बार खेत की पहली बाली लेकर आया हूं।” वसंत पंचमी को जलार्पण के साथ वे बाबा को शुद्ध घी का भोग और खेत की पहली फसल की बाली अर्पित करेंगे। यह अर्पण निश्चित ही जीवन की फसल को भगवान को समर्पित करने का संकल्प पूरा करने जैसा है।
बसंत पंचमी का दिन और भी रोमांचक होगा। श्रृंगार पूजा से पहले बाबा पर फुलेल लगाया जाएगा। लक्ष्मी-नारायण मंदिर में पुजारियों द्वारा तिलक की विधि संपन्न होगी। इसके बाद अबीर-गुलाल की बौछार के साथ उत्सव शुरू होगा। इससे जुड़ा एक तथ्य यह भी है कि मिथिलांचल में इसी दिन से होली का आगमन माना जाता है। बच्चे, बूढ़े, युवा सब रंगों में नहा जाएंगे। कल्पना कीजिए, बाबा का दरबार रंग-बिरंगे फूलों सा सजा हुआ, भक्तों की हंसी-ठिठोली और भक्ति भजनों का संगम। यह होली बाबा के साथ की आनन्दमय भव्य होली है, मंदिर परसिर में मौजूद चहकती हुई एक युवती कहती है, महाशिवरात्रि तक यह उत्साह बना रहेगा, जब शिव-पार्वती का विवाह होगा।
इस आस्था के सैलाब में यदि अपने धार्मिक और सांस्कृतिक इतिहास के आधार पर गोते लगाएं तो याद आता है कि बाबा बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग की कथा रामायण काल से जुड़ी है। रावण ने यहां शिवलिंग प्रतिष्ठित किया था। भगवान विष्णु की कृपा से यह स्थापित हो गया। किंतु यहां बसंत पंचमी का महत्व अलग ही है; यह विवाह पूर्व का तिलक समारोह है। नेपाल से बिहार तक के भक्त एक सूत्र में बंधे हैं। एक नेपाली भक्त भावुक होकर कहते हैं, “मिथिला की सीमा पार कर बाबा के दरबार में आना उनका साक्षात्कार कर लेने पर लगता है कि अब जीवन में कुछ भी पाना शेष नहीं है।” आज यहां का दृष्य देखकर अंत में यही कहना होगा कि आस्था कैसे पहाड़ तोड़ देती है, दूरी मिटा देती है, यह बाबा के दरबार में चहुंओर सहज दिखाई देता है। जय बाबा बैद्यनाथ! बोल बम!
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी