भोरमदेव वन्यजीव अभयारण्य में शुरू हुआ जंगल सफारी
रायपुर , 03 मई (हि.स.)।रायपुर -छत्तीसगढ़ के कबीरधाम (कवर्धा) जिले में स्थित भोरमदेव वन्यजीव अभयारण्य में जंगल सफारी की आधिकारिक शुरुआत मई 2026 की शुरुआत में कर दी गई है।
छत्तीसगढ़ के कबीरधाम जिले में स्थित 352 वर्ग किमी फैला भोरमदेव वन्यजीव अभयारण्य में अब 35 किमी लंबा जंगल सफारी ट्रैक और इको-टूरिज्म गतिविधियां शुरू हो गई हैं। मैकल श्रृंखला में स्थित, यह कान्हा और अचानकमार टाइगर रिजर्व को जोड़ने वाला एक महत्वपूर्ण गलियारा है, जहाँ पर्यटक अब बाघ, तेंदुआ, भालू और गौर को प्राकृतिक आवास में देख सकते हैं।
उल्लेखनीय है कि छत्तीसगढ़ के उपमुख्यमंत्री और वन मंत्री विजय शर्मा ने घोषणा की थी कि इस नई जंगल सफारी का भव्य शुभारंभ 27-28 अप्रैल 2026 को किया जाएगा। आधिकारिक तौर पर इसे आम पर्यटकों के लिए 1 मई 2026 से खोल दिया गया है। अधिकारियों के अनुसार, इस पहल का मुख्य उद्देश्य राज्य में इको-टूरिज्म को बढ़ावा देना, स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के अवसर पैदा करना और अभयारण्य की समृद्ध जैव विविधता को प्रदर्शित करना है।भोरमदेव कॉरिडोर प्रोजेक्ट: मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा ने 146 करोड़ रुपये की लागत वाले 'भोरमदेव कॉरिडोर' की आधारशिला रखी है। आधिकारिक बयान के अनुसार, यह प्रोजेक्ट भोरमदेव को एक प्रमुख आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करेगा।
अभयारण्य की अधीक्षक अनीता साहू के अनुसार, सफारी के लिए 'करियाआमा' गेट पर एक हाई-टेक स्कैनर सिस्टम लगाया गया है और केवल टिकट सत्यापन के बाद ही प्रवेश की अनुमति दी जा रही है। ऑनलाइन टिकट बुकिंग की सुविधा और ऑनलाइन टिकट बुकिंग की सुविधा और पर्यटकों के लिए स्थानीय महिला समूहों द्वारा संचालित वनांचल रसोई की स्थापना की गई है।
जंगल सफारी के लिए लगभग 36 किलोमीटर लंबा सफारी मार्ग तैयार किया गया है, जो घने जंगलों, ऊँची पहाड़ियों और झरनों के बीच से गुजरता है। इस सफर में पर्यटकों को 22 बार सकरी नदी पार करने का अनूठा अनुभव मिलता है। यहाँ पर्यटक बाघ, तेंदुआ, भालू, गौर (बाइसन), सांभर, चीतल और नीलगाय जैसे जानवरों को उनके प्राकृतिक आवास में देख सकते हैं।टिकाऊ पर्यटन पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए यहाँ इलेक्ट्रिक वाहनों का उपयोग करने और इको-कॉटेज व नेचर ट्रेल्स विकसित करने की योजना है।
सफारी वाहनों में अनुभवी गाइड पर्यटकों को इन प्रजातियों के बारे में विस्तार से जानकारी देंगे, जो शैक्षिक मूल्य भी बढ़ाएगा। यह पहल शुद्ध इको-टूरिज्म पर आधारित है. भविष्य में इको-कॉटेज, नेचर ट्रेल्स और गाइडेड वॉक विकसित किए जाएंगे।
हिन्दुस्थान समाचार / केशव केदारनाथ शर्मा