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प्राचीन काजल की कालिख से आधुनिक नैनोसेंसर तक : बीएचयू शोधकर्ताओं ने विकसित की लेड पहचानने वाली नैनो सामग्री

 




सरसों के तेल के दीपक से निकली कालिख से बने कार्बन नैनोडॉट्स जल में 1.57 नैनोमोलर तक लेड आयनों की पहचान करने में सक्षम

वाराणसी, 03 अक्टूबर (हि.स.)। सदियों से भारतीय घरों में काजल और काले रंग के निर्माण में इस्तेमाल होती रही सरसों के तेल के दीपक की कालिख अब अत्याधुनिक नैनोविज्ञान में नई भूमिका निभा रही है। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के नेतृत्व में किए गए एक बहु-संस्थागत अध्ययन में शोधकर्ताओं ने इसी साधारण कार्बन कालिख को प्रकाशदीप्त कार्बन नैनोडॉट्स में परिवर्तित किया है। अध्ययन के अनुसार, ये नैनोडॉट्स जल में मौजूद विषैले लेड (पीबी²⁺) आयनों की अत्यंत कम सांद्रता का पता लगाने में सक्षम हैं।

यह शोध जर्नल आरएससी एडवांसेज में प्रकाशित हुआ है और पारंपरिक रूप से उपलब्ध कार्बन स्रोत को कम लागत वाली कार्यात्मक नैनो सामग्री में बदलने की संभावनाओं को सामने लाता है।

——पारंपरिक काजल की कालिख से तैयार हुई नैनो सामग्री

भारतीय परंपरा में सरसों के तेल के दीपक की लौ के ऊपर मिट्टी का पात्र उल्टा रखकर कालिख एकत्र करने की प्रथा रही है। इस कालिख का उपयोग पारंपरिक रूप से बंधक पदार्थ के साथ मिलाकर काला रंग बनाने तथा घी के साथ मिलाकर काजल तैयार करने में किया जाता रहा है।

शोधकर्ताओं ने इसी पारंपरिक रूप से उपलब्ध कार्बन स्रोत को शुद्ध कर नियंत्रित परिस्थितियों में संसाधित किया और उससे ऐसे कार्बन नैनोडॉट्स तैयार किए, जो पानी में आसानी से वितरित हो सकते हैं। अध्ययन में इन नैनोडॉट्स की संरचना, प्रकाशीय गुणों और जैविक व्यवहार का भी विश्लेषण किया गया।

——बीएचयू के नेतृत्व में बहु-संस्थागत अध्ययन

यह अध्ययन बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में जे.आर.एफ. सोनाम लामु शेर्पा ने डॉ. अर्चना तिवारी के निर्देशन में किया। शोध को ए.एन.आर.एफ.-पावर अनुदान से वित्तीय सहायता मिली।

अध्ययन में सिक्किम विश्वविद्यालय, हैदराबाद विश्वविद्यालय और आईआईएसईआर भोपाल के शोधकर्ताओं ने भी सहयोग किया।

——दहन की परिस्थितियों से बदली कालिख की संरचना

शोधकर्ताओं ने यह भी अध्ययन किया कि सीमित दहन वातावरण कार्बन कणों के निर्माण और उनकी आंतरिक संरचना को किस प्रकार प्रभावित करता है। अध्ययन के दौरान पात्र का आयतन चार गुना तक बढ़ाने पर भी कार्बन कणों के आकार में कोई उल्लेखनीय बदलाव नहीं पाया गया। हालांकि, उनकी दोष घनत्व में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई।

सूक्ष्मदर्शीय और स्पेक्ट्रोस्कोपिक विश्लेषण से पता चला कि इन कार्बन नैनोडॉट्स में एक आंशिक रूप से ग्रेफाइटीकृत नैनोक्रिस्टलीय केंद्र मौजूद है, जो अत्यधिक अव्यवस्थित और दोष-समृद्ध अक्रिस्टलीय कार्बन मैट्रिक्स से घिरा हुआ है। शोधकर्ताओं के अनुसार, यही संरचनात्मक विशेषताएं नैनोडॉट्स के प्रकाशीय और संवेदन गुणों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

——1.57 नैनोमोलर तक लेड की पहचान

अध्ययन की प्रमुख उपलब्धियों में इन कार्बन नैनोडॉट्स की Pb²⁺ आयनों के प्रति उच्च संवेदनशीलता और चयनात्मकता सामने आना है। शोधकर्ताओं के अनुसार, नैनोडॉट्स की लेड पहचान सीमा 1.57 nM तक पाई गई, जबकि इसकी रैखिक पहचान सीमा 0–17 nM रही। विशेष रूप से उल्लेखनीय बात यह है कि इस संवेदनशीलता को हासिल करने के लिए नैनोडॉट्स की सतह पर किसी अतिरिक्त सतह-कार्यात्मककरण की आवश्यकता नहीं पड़ी।

——डब्ल्यूएचओ के पेयजल दिशानिर्देश से करीब 31 गुना कम

शोध में प्राप्त पहचान सीमा को पेयजल में लेड की सांद्रता के संदर्भ में भी देखा गया। अध्ययन में विश्व स्वास्थ्य संगठन के 10 µg L⁻¹ के दिशानिर्देश मान के बराबर सांद्रता को लगभग 48.3 nM माना गया है। इसके मुकाबले नैनोडॉट्स की 1.57 nM की पहचान सीमा लगभग 31 गुना कम है। यह दर्शाता है कि विकसित सामग्री पानी में लेड की बहुत कम सांद्रता का पता लगाने के लिए एक संभावित नैनोसेंसिंग प्लेटफॉर्म हो सकती है।

———जैव-संगतता का भी किया गया परीक्षण

शोधकर्ताओं ने नैनोडॉट्स की संभावित जैविक उपयोगिता का प्रारंभिक आकलन करने के लिए C2C12 अमरित माउस मायोब्लास्ट कोशिका-रेखा पर एमटीटी परीक्षण किया।

परीक्षण में 25–150 µg mL⁻¹ की सांद्रता सीमा में कोई स्पष्ट कोशिका-विषाक्तता नहीं पाई गई। इसके विपरीत, इस सीमा में कोशिका प्रसार देखा गया। शोधकर्ताओं के अनुसार, परीक्षण की गई परिस्थितियों में ये परिणाम सामग्री की संभावित जैव-संगतता और भविष्य में इसके जैविक अनुप्रयोगों की संभावना का संकेत देते हैं।

——पारंपरिक ज्ञान से टिकाऊ नैनो तकनीक तक

अध्ययन भारतीय पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक नैनोविज्ञान के बीच एक दिलचस्प वैज्ञानिक संबंध भी सामने लाता है। सरसों के तेल के दीपक से उत्पन्न आसानी से उपलब्ध कार्बन कालिख को उपयोगी नैनो सामग्री में परिवर्तित करके शोधकर्ताओं ने कम लागत वाले प्रारंभिक पदार्थ से कार्यात्मक सामग्री तैयार करने का एक संभावित टिकाऊ मार्ग प्रस्तुत किया है। शोध के निष्कर्ष संकेत देते हैं कि सदियों पुरानी घरेलू परंपरा में इस्तेमाल होने वाला यह साधारण कार्बन स्रोत आधुनिक पर्यावरणीय निगरानी और नैनोसेंसिंग के लिए उपयोगी सामग्री का आधार बन सकता है।

हालांकि, वास्तविक जल-नमूनों में इसकी प्रभावशीलता, विभिन्न सह-अस्तित्व वाले आयनों के बीच प्रदर्शन और बड़े पैमाने पर उत्पादन जैसे पहलुओं का आगे मूल्यांकन आवश्यक होगा।

हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी