(पुस्तक समीक्षा) मोदी सरकार के 12 साल के कार्यकाल का वस्तुनिष्ठ विश्लेषण करती है- पॉवर, पॉलिसी, पॉलिटिक्स पुस्तक
नई दिल्ली, 05 सितंबर (हि.स.)। भारतीय राजनीति को समझने की कोशिश अक्सर दो पाटों के बीच फंस जाती है। या तो वह सत्ता के गलियारों में घूमती हुई नेताओं के बयानों और सरकारी फैसलों का ब्योरा बनकर रह जाती है, या फिर इतनी वैचारिक हो जाती है कि आम मतदाता, उसकी उम्मीदें और रोजमर्रा की जिंदगी कहीं पीछे छूट जाती है। विक्रम कपूर की पुस्तक ‘पॉवर, पॉलिसी, पॉलिटिक्स: इनसाइड मोदी’ज भारत (2014–2026)’ इन दोनों रास्तों से अलग चलने की कोशिश करती है। यह पुस्तक मोदी के 2014 से 2026 तक के राजनीतिक दौर को केवल घटनाओं की श्रृंखला के रूप में नहीं देखती, बल्कि यह समझने का प्रयास करती है कि इस दौरान सत्ता चलाने का तरीका, नीतियां बनाने की शैली, राजनीतिक नैरेटिव और मतदाता की अपेक्षाएं किस तरह बदलती गईं।
127 पृष्ठ की यह पुस्तक आकार में भले छोटी है, लेकिन इसका विषय बहुत बड़ा है। लेखक ने 19 अध्यायों में लगभग बारह साल की भारतीय राजनीति को समेटने की कोशिश की है। यह आसान काम नहीं है। 2014 से 2026 के बीच देश ने नोटबंदी, जीएसटी, सर्जिकल स्ट्राइक, बालाकोट, अनुच्छेद 370, नागरिकता संशोधन कानून, शाहीन बाग, कृषि कानून, कोविड महामारी, कल्याणकारी योजनाओं के विस्तार, 2024 के लोकसभा चुनाव और 2026 के पश्चिम बंगाल चुनाव जैसे कई निर्णायक मोड़ देखे। कपूर इन घटनाओं को अलग-अलग डिब्बों में नहीं रखते, बल्कि उनके बीच एक संबंध खोजते हैं। यही इस किताब की केंद्रीय कोशिश है।
किताब की शुरुआत जिस जगह से होती है, वह भी लेखक के नजरिये को समझने में मदद करती है। साल 2014 के लोकसभा चुनाव के समय कपूर दक्षिण अफ्रीका के जोहान्सबर्ग में थे। वहां अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस अपने दो दशक पूरे होने का चुनाव लड़ रही थी और उसी समय भारत में 30 साल बाद किसी एक दल को पूर्ण बहुमत मिला। इस अनुभव के जरिए लेखक भारतीय राजनीति में आए बदलाव को बाहर से देखने की कोशिश करते हैं। 15 अगस्त 2014 को लाल किले से मोदी द्वारा जन धन योजना की घोषणा को वे केवल एक कल्याणकारी कार्यक्रम नहीं मानते, बल्कि आने वाले वर्षों के शासन मॉडल की आधारभूत तैयारी के रूप में देखते हैं।
यहीं से पुस्तक का एक महत्वपूर्ण विचार सामने आता है कि नीति का असर केवल उसके घोषित उद्देश्य में नहीं, बल्कि उस व्यवस्था में भी होता है जिसे वह आगे के फैसलों के लिए तैयार करती है। जन धन खाते, आधार और मोबाइल को लेखक इसी नजरिये से देखते हैं। उनके मुताबिक ‘जैम’ व्यवस्था ने सरकार और नागरिक के बीच मौजूद पारंपरिक बिचौलियों को कम करने और सरकारी लाभ सीधे पहुंचाने के लिए एक नया ढांचा तैयार किया। बाद की योजनाओं और संकट के समय प्रत्यक्ष लाभ अंतरण को समझने के लिए लेखक इसी शुरुआती निर्माण को महत्वपूर्ण मानते हैं।
नोटबंदी पर आते ही किताब का स्वर बदल जाता है। 8 नवंबर 2016 की रात को लेखक चंडीगढ़ में पंजाब विधानसभा चुनाव की रिपोर्टिंग कर रहे थे। अचानक 500 और 1000 रुपये के नोटों को अमान्य करने की घोषणा ने देश को जिस तरह प्रभावित किया, उसे कपूर केवल आर्थिक नीति के रूप में नहीं देखते। वे इसे सत्ता की निर्णय लेने की शैली और जनता के साथ उसके रिश्ते के उदाहरण के रूप में भी पढ़ते हैं।
सुरक्षा नीति पर पुस्तक का विश्लेषण भी इसी सोच को आगे बढ़ाता है। उरी के बाद सर्जिकल स्ट्राइक और पुलवामा के बाद बालाकोट को कपूर केवल सैन्य कार्रवाई के रूप में नहीं देखते। उनके लिए बड़ा बदलाव यह था कि सुरक्षा से जुड़े फैसलों को सार्वजनिक राजनीतिक संवाद का हिस्सा बनाया गया। सैन्य कार्रवाई पहले भी होती रही थी, लेकिन उसकी राजनीतिक प्रस्तुति और सार्वजनिक स्वीकार्यता का स्वरूप बदल गया। सुरक्षा अब केवल रक्षा प्रतिष्ठान का विषय नहीं रही, बल्कि राष्ट्रवाद, नेतृत्व और राजनीतिक पहचान से भी जुड़ गई।
मई 2025 के पहलगाम आतंकी हमले और उसके बाद बने सैन्य तनाव के संदर्भ में लेखक इस बदलाव को और आगे ले जाते हैं। उनके मुताबिक आज सरकारों को केवल वास्तविक सीमा पर ही नहीं, बल्कि जनधारणा और वैश्विक नैरेटिव के स्तर पर भी लड़ना पड़ता है। यह किताब का एक महत्वपूर्ण राजनीतिक निष्कर्षआधुनिक राजनीति में किसी कार्रवाई का असर उतना ही महत्वपूर्ण है जितना उसका संचार है।
अनुच्छेद 370, तीन तलाक, नागरिकता संशोधन कानून और वक्फ सुधार जैसे मुद्दों पर भी कपूर इसी ‘नैरेटिव’ की भूमिका तलाशते हैं। अनुच्छेद 370 के मामले में उनका जोर फैसले की गति, गोपनीयता और क्रियान्वयन पर है। तीन तलाक के मामले में वे बताते हैं कि इसे धार्मिक मुद्दे की जगह मुस्लिम महिलाओं के अधिकार और लैंगिक न्याय के सवाल के रूप में प्रस्तुत किया गया। इससे राजनीतिक विरोध के लिए जगह पहले जैसी नहीं रही।
सीएए के बाद शाहीन बाग का आंदोलन इस मॉडल के सामने एक अलग तरह की चुनौती बनकर आता है। यहां किताब सत्ता के साथ-साथ विरोध को भी समझने की कोशिश करती है। लेखक का निष्कर्ष है कि सड़क पर बड़ी संख्या में मौजूद होना अपने आप में पर्याप्त नहीं है। यदि आंदोलन के पास व्यापक राजनीतिक और चुनावी संगठन नहीं है, तो उसका दीर्घकालिक प्रभाव सीमित हो सकता है। यह निष्कर्ष बहस पैदा कर सकता है, लेकिन यही पुस्तक की खूबी भी है कि वह पाठक को असहमति की गुंजाइश देती है।
कोविड का अध्याय इस समीक्षा के लिहाज से शायद पुस्तक का सबसे भावनात्मक हिस्सा है। कोविड : व्हेन रियलिटी ओवरपावर्ड नैरेटिव शीर्षक अपने आप में बहुत कुछ कह देता है। मार्च 2020 का लॉकडाउन, सड़कों पर पैदल लौटते प्रवासी मजदूर, दूसरी लहर के दौरान अस्पतालों के बाहर परेशान लोग, ऑक्सीजन और दवाओं की कमी इन सबके बीच सरकार की संचार रणनीति की सीमाएं सामने आईं। लेखक यह भी बताते हैं कि महामारी का असर उनके अपने घर तक पहुंचा था। इससे इस हिस्से में महज राजनीतिक विश्लेषण नहीं रहता, बल्कि एक व्यक्तिगत अनुभव की छाया भी दिखाई देती है।
इसका सबसे प्रभावशाली उदाहरण लेखक महिला मतदाताओं के रूप में सामने रखते हैं। 2024 के आसपास ग्रामीण महिलाओं के राजनीतिक व्यवहार में आया बदलाव उनके लिए महज चुनावी आंकड़ा नहीं है। पुस्तक में दर्ज एक महिला का वाक्य ‘पहले घर के मर्द वोट डिसाइड करते थे, अब हम भी करते हैं’, इस बदलाव को किसी भी राजनीतिक आंकड़े से ज्यादा सरलता से समझा देता है।
यही किताब की सबसे बड़ी साहित्यिक खूबी है। कपूर बड़े राजनीतिक सिद्धांतों को आम लोगों की आवाज से जोड़ते हैं। नोटबंदी की रात किसी कार्यकर्ता की नकदी को लेकर चिंता, बैंक की कतार में खड़े व्यक्ति का ‘अगर सबके लिए है तो ठीक है’ कहना, किसान का ‘अब यह आंदोलन है, सिर्फ विरोध नहीं’ कहना और अस्पताल के डॉक्टर का ‘हम मरीज चुन रहे हैं’ कहना ये छोटे-छोटे संवाद उस समय की मनःस्थिति को पकड़ते हैं।
इन संवादों से किताब एक रिपोर्ट की तरह पढ़ी जाने लगती है। पाठक केवल यह नहीं पढ़ता कि कोई नीति क्या थी; वह यह भी महसूस करता है कि उस नीति का असर किसी बैंक की कतार में खड़े व्यक्ति, किसी किसान, किसी महिला या किसी डॉक्टर पर कैसा था। यही वह जगह है जहां किताब सबसे ज्यादा जीवित लगती है।
2024 का लोकसभा चुनाव पुस्तक के विश्लेषण का एक महत्वपूर्ण मोड़ है। भाजपा का 240 सीटों पर रुकना और एनडीए का 293 सीटों के साथ सरकार बनाना लेखक के लिए मोदी मॉडल की असफलता नहीं, बल्कि उसके सामने मतदाता द्वारा रखी गई एक नई शर्त है। महंगाई और बेरोजगारी को बड़ी चिंताओं के रूप में सामने रखते हुए कपूर यह तर्क देते हैं कि मतदाता ने नरेन्द्र मोदी को पूरी तरह खारिज नहीं किया, लेकिन विपक्ष और सत्ता के बीच की दूरी जरूर कम कर दी।
उनका निष्कर्ष ‘निरंतरता, लेकिन जवाबदेही के साथ’ 2024 के जनादेश की उनकी सबसे संक्षिप्त व्याख्या है। यह व्याख्या इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि लेखक इसे न तो सत्ता की हार बताते हैं और न ही विपक्ष की जीत। वे इसे मतदाता के संकेत के रूप में देखते हैं।
इसी साल के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव को लेखक इसी राजनीतिक यात्रा के अगले पड़ाव के रूप में देखते हैं। भाजपा की 208 सीटों की जीत और सरकार का गठन उनके मुताबिक इस बात का उदाहरण है कि कोई राजनीतिक दल लगातार प्रयास के बाद किसी मजबूत क्षेत्रीय राजनीतिक दुर्ग को भी बदल सकता है। 2021 में 77 सीटों को वे ‘आगमन’ और 2026 की जीत को ‘सत्ता की प्राप्ति’ के रूप में देखते हैं।
किताब का ऐतिहासिक हिस्सा मोदी के लंबे प्रधानमंत्री पद के कार्यकाल की तुलना जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी से करता है। यहां लेखक एक महत्वपूर्ण तकनीकी अंतर सामने रखते हैं। नेहरू का कुल प्रधानमंत्री कार्यकाल लंबा था, लेकिन उनके शुरुआती वर्षों में अंतरिम व्यवस्था भी शामिल थी। इसके विपरीत मोदी का पूरा कार्यकाल 2014, 2019 और 2024 के चुनावी जनादेशों पर आधारित रहा है।
नेहरू और मोदी की तुलना करते हुए लेखक दोनों के सामने मौजूद अलग-अलग भारत को रेखांकित करते हैं। नेहरू के सामने विभाजन, गरीबी और संस्थानों के निर्माण की चुनौती थी, जबकि मोदी के सामने एक स्थापित लोकतंत्र को डिजिटल, आकांक्षी और वैश्विक महत्वाकांक्षा वाले भारत में बदलने की चुनौती बताई गई है। कपूर इसे चार प्रमुख तत्वों में समझाते हैं। सत्ता का केंद्रीकरण, रणनीतिक गति, नैरेटिव नियंत्रण और कल्याणकारी डिलीवरी। निर्णय अपेक्षाकृत सीमित दायरे में तेजी से लिए जाते हैं, उन्हें लागू करने में गति रखी जाती है, जटिल नीतियों को सरल और भावनात्मक राजनीतिक संदेश में बदला जाता है और सरकारी योजनाओं की सीधी डिलीवरी के जरिए लाभार्थियों का एक नया आधार तैयार किया जाता है।
यह मॉडल पुस्तक का सबसे महत्वाकांक्षी निष्कर्ष है। हालांकि इसे पढ़ते हुए यह सवाल उठता है कि क्या इतने विशाल और विविध लोकतंत्र को चार स्तंभों में पूरी तरह समझा जा सकता है। संभवतः नहीं, लेकिन एक विश्लेषणात्मक ढांचा देने की दृष्टि से यह प्रयास उपयोगी है। पाठक इससे सहमत हो या असहमत, वह भारतीय राजनीति को देखने के लिए एक नया चश्मा जरूर पाता है।
कुल मिलाकर पॉवर, पॉलिसी, पॉलिटिक्स को केवल मोदी के शासनकाल की राजनीतिक टाइमलाइन के रूप में पढ़ना इसके साथ न्याय नहीं होगा। यह पुस्तक दरअसल यह समझने की कोशिश है कि 2014 के बाद सत्ता और नागरिक के बीच रिश्ता कैसे बदला। सरकारी योजना अब केवल योजना नहीं रही, वह राजनीतिक अनुभव बन गई। सुरक्षा केवल सीमा का विषय नहीं रही, वह राजनीतिक पहचान का हिस्सा बन गई। चुनाव केवल जातीय समीकरणों का खेल नहीं रहे, बल्कि कल्याणकारी योजनाओं, नेतृत्व, नैरेटिव और व्यक्तिगत अनुभवों का मिश्रण बन गए।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पुस्तक राजनीति को केवल संसद और सत्ता के कमरों में नहीं खोजती। वह उसे बैंक की कतार, खेत, सड़क, अस्पताल, चाय की दुकान और मतदान केंद्र तक ले जाती है। शायद इसी वजह से इसके सबसे याद रहने वाले हिस्से बड़े नेताओं के भाषण नहीं, बल्कि आम नागरिकों के छोटे-छोटे वाक्य हैं।
पुस्तक : पॉवर, पॉलिसी, पॉलिटिक्स: इनसाइड मोदी’ज भारत(2014–2026)
लेखक : विक्रम कपूर
प्रस्तावना : यशवंत देशमुख
पृष्ठ : 127, मूल्य: 349
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हिन्दुस्थान समाचार / प्रशांत शेखर