उत्सवों में ‘वेस्ट’ हुआ फुटवियर आदिवासी बच्चों के लिए बना ‘बेस्ट’
-लावारिस जूतों-चप्पलों का पुनर्चक्रण जरूरतमंद विद्यार्थियों के पैरों का सुरक्षा कवच
मुंबई, 9 सितंबर (हिं.स.) । महानगर में उत्सवों और जुलूसों के दौरान उमड़ने वाली भारी भीड़ जब समाप्त होती है, तो सड़कों पर कई टन जूते-चप्पल और अन्य कचरा पीछे छूट जाता है। अब इसी बेकार समझे जाने वाले फुटवियर को मानवीय संवेदना और रचनात्मक सोच से नया जीवन दिया जा रहा है। उत्सवों के बाद जमा होने वाले जूते-चप्पलों के पुनर्चक्रण से दूरदराज और आदिवासी क्षेत्रों के जरूरतमंद विद्यार्थियों के लिए नए फुटवियर तैयार किए जा रहे हैं। इससे नन्हे पैरों को सुरक्षा मिलने के साथ उनकी स्कूल तक की राह भी कुछ आसान होने की उम्मीद है।
चार टन फुटवियर का होगा पुनर्चक्रण
मुंबई महानगरपालिका के अधिकारियों से मिली जानकारी के अनुसार, लालबाग, परेल और चिंचपोकली क्षेत्रों में जुलूसों के बाद जमा हुए करीब 4 मीट्रिक टन फुटवियर को पुनर्चक्रण के लिए भेजा गया है। इन बेकार जूते-चप्पलों में मौजूद उपयोगी सामग्री से नई चप्पलें तैयार कर उन्हें गडचिरोली, नंदुरबार जैसे दुर्गम और आदिवासी क्षेत्रों के जरूरतमंद विद्यार्थियों को नि:शुल्क वितरित करने की योजना है। मुंबई महानगरपालिका के एफ-दक्षिण विभाग ने ग्रीनसोल फाउंडेशन के सहयोग से यह पहल शुरू की है। इस पहल के कारण उत्सवों की भीड़ में पीछे छूट जाने वाले फुटवियर सीधे डंपिंग ग्राउंड में जाने के बजाय पुनर्चक्रण की प्रक्रिया से गुजरकर दोबारा समाज के उपयोग में आएंगे।
एक चप्पल में तीन समस्याओं का समाधान
इस पहल का उद्देश्य केवल पुराने फुटवियर का पुन: उपयोग करना नहीं है। इसके पीछे स्वास्थ्य, पर्यावरण और सामाजिक समानता से जुड़े तीन महत्वपूर्ण लक्ष्य हैं। दूरदराज के क्षेत्रों में रहने वाले कई बच्चों के पास उचित फुटवियर उपलब्ध नहीं होते। ऐसे में उन्हें पत्थरों, कांटों, कीचड़, गर्म जमीन और अन्य जोखिमों के बीच नंगे पैर चलकर स्कूल जाना पड़ सकता है। पैरों की सुरक्षा के लिए उचित फुटवियर महत्वपूर्ण है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन की जानकारी के अनुसार, पोडोकॉनियोसिस जैसे रोगों से बचाव के लिए प्रभावित मिट्टी के सीधे संपर्क से बचना और नियमित रूप से जूते पहनना महत्वपूर्ण निवारक उपायों में शामिल है। दूसरी ओर, इस्तेमाल न होने वाले जूते-चप्पलों का उचित प्रबंधन नहीं होने पर वे ठोस कचरे का हिस्सा बन जाते हैं। इस तरह फुटवियर की कमी से उत्पन्न स्वास्थ्य संबंधी समस्या और इस्तेमाल किए गए फुटवियर से पैदा होने वाले कचरे—दोनों का एक साथ समाधान करने का प्रयास इस पहल के माध्यम से किया जा रहा है।
अभिनव पहल को 13 वर्ष पूरे
इस अवधारणा की शुरुआत खिलाड़ियों श्रियांश भंडारी और रमेश धामी ने वर्ष 2013 में की थी। बेकार पड़े जूते-चप्पलों में मौजूद उपयोगी सामग्री को अलग कर उससे जरूरतमंद बच्चों के लिए फुटवियर तैयार किए जा सकते हैं, इसी विचार से इस पहल की शुरुआत हुई। ग्रीनसोल फाउंडेशन की आधिकारिक स्थापना वर्ष 2016 में हुई। संस्था के अनुसार, बेकार फुटवियर और औद्योगिक कचरे को पुनर्चक्रित कर उपयोगी उत्पादों में बदला जाता है और उन्हें जरूरतमंद स्कूली बच्चों तक पहुंचाया जाता है। संस्था का दावा है कि अब तक 8.50 लाख से अधिक जरूरतमंद बच्चों को फुटवियर उपलब्ध कराया जा चुका है। इस प्रक्रिया के माध्यम से 4,374 टन कार्बन डाईऑक्साइड (CO₂) उत्सर्जन कम होने की बात भी संस्था ने कही है।
कचरे से नए फुटवियर तक का सफर
जुलूसों के बाद एकत्र किए गए जूते-चप्पलों को सीधे बच्चों को नहीं दिया जाता। इसके लिए सफाई, छंटाई और पुनर्चक्रण की व्यवस्थित प्रक्रिया अपनाई जाती है। सबसे पहले एकत्र किए गए फुटवियर के सोल और ऊपरी हिस्से को अलग किया जाता है। इसके बाद सामग्री की छंटाई कर उसे धोया और सैनिटाइज किया जाता है। इस्तेमाल किए गए फुटवियर में मौजूद करीब 80 से 90 प्रतिशत सामग्री का पुन: उपयोग कर बच्चों के पैरों के आकार के अनुसार नई चप्पलें तैयार करने का प्रयास किया जाता है। यानी मुंबई की सड़कों पर उत्सव की भीड़ में छूट गई कोई चप्पल महज कचरा बनकर नहीं रह जाती। उसके उपयोगी हिस्से को पुनर्चक्रण की प्रक्रिया में शामिल किया जाता है और कुछ समय बाद वही सामग्री किसी दूरदराज गांव के विद्यार्थी के पैरों की सुरक्षा करने वाले नए फुटवियर का रूप ले लेती है।
चप्पलों से आगे भी पुनर्चक्रण
ग्रीनसोल का पुनर्चक्रण अभियान केवल फुटवियर तक सीमित नहीं है। संस्था द्वारा बेकार कपड़ों और फ्लेक्स बैनरों का उपयोग कर बच्चों के लिए मैट और बैग भी तैयार किए जाते हैं। उत्सवों के दौरान पैदा होने वाले कचरे के एक हिस्से को दोबारा उत्पादन चक्र में शामिल करने का यह प्रयास है। ‘इस्तेमाल करो और फेंक दो’ की संस्कृति के बजाय ‘इस्तेमाल करो, एकत्र करो, पुनर्चक्रण करो और दोबारा समाज के काम में लाओ’ परिपत्र अर्थव्यवस्था की यह दिशा इस पहल के माध्यम से सामने आती है।
मुंबई जैसे महानगर में जुलूस के बाद सड़क पर पड़ी कोई चप्पल भले ही मामूली वस्तु लगे, लेकिन लंबी दूरी तय कर स्कूल जाने वाले दूरदराज क्षेत्र के विद्यार्थी के लिए अच्छी चप्पल रोजमर्रा की यात्रा में जरूरी सुरक्षा प्रदान कर सकती है। इस तरह भीड़ में छूटे फुटवियर का सफर डंपिंग ग्राउंड पर खत्म होने के बजाय किसी जरूरतमंद विद्यार्थी की स्कूल जाने वाली राह तक पहुंच सकता है। उत्सव के उल्लास में पीछे छूटी एक चप्पल इस तरह किसी दूसरे बच्चे के जीवन में उपयोगी साबित हो सकती है।
‘एक कदम से दूसरे कदम तक’
गणेशोत्सव की भीड़ में पीछे छूट गई चप्पल अब केवल एक खोई हुई वस्तु नहीं रह गई है। उसके पुनर्चक्रण से किसी जरूरतमंद बच्चे को नंगे पैर चलने से सुरक्षा मिल सकती है और स्कूल तक सुरक्षित पहुंचने का अवसर भी। मुंबई की उत्सवी भीड़ में छूटे फुटवियर को मिली यह नई दिशा पर्यावरण संरक्षण के साथ सामाजिक जिम्मेदारी का भी एक प्रभावी उदाहरण बन रही है। एक बच्चे के कदमों के पीछे छूटी वस्तु, दूसरे बच्चे के सुरक्षित कदमों का सहारा बन रही है।-----------
हिन्दुस्थान समाचार / मनीष कुलकर्णी