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ग्लेशियर संकट-प्रकृति का बिगड़ता संतुलन और हमारा भविष्य (लेखिका पूनम झा)

 


कठुआ, 05 जून (हि.स.)। पृथ्वी पर जीवन का आधार जल है और इस जल का सबसे बड़ा भंडार ग्लेशियरों के रूप में मौजूद है। ग्लेशियर जिन्हें “बर्फ की नदियाँ” भी कहा जाता है पहाड़ों पर जमी विशाल बर्फ की परतें होती हैं जो धीरे-धीरे खिसकती रहती हैं। इनका सीमित मात्रा में पिघलना अत्यंत आवश्यक है क्योंकि यही नदियों का स्रोत बनते हैं और मानव जीवन के लिए जल उपलब्ध कराते हैं।

ग्लेशियर मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं अल्पाइन (घाटी) ग्लेशियर और पर्वतीय ग्लेशियर। हिमालय, काराकोरम और लद्दाख जैसे क्षेत्रों में भारत के प्रमुख ग्लेशियर पाए जाते हैं। इनमें सियाचिन ग्लेशियर सबसे प्रमुख है जो न केवल भारत का सबसे बड़ा बल्कि विश्व के सबसे बड़े ग्लेशियरों में से एक है। इसके अलावा गंगोत्री, यमुनोत्री, पिंडारी, मिलम और जेमू जैसे ग्लेशियर भी हमारे जल स्रोतों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो पृथ्वी पर कुल जल का लगभग 97 प्रतिशत समुद्रों में है जबकि मात्र 3 प्रतिशत ही मीठा पानी है। इस मीठे पानी का लगभग 68 प्रतिशत हिस्सा ग्लेशियरों और बर्फ के रूप में जमा है। यही कारण है कि करोड़ों लोगकृविशेषकर भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में इन ग्लेशियरों पर निर्भर हैं। किन्तु वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। तापमान में वृद्धि, अनियमित बर्फबारी और बढ़ता प्रदूषण इस समस्या को और गंभीर बना रहे हैं। यदि यह स्थिति जारी रही तो भविष्य में समुद्र का जलस्तर बढ़ेगा, तटीय क्षेत्रों में बाढ़ आएगी और मीठे पानी की भारी कमी हो सकती है।

ग्लेशियरों के पिघलने के पीछे मानव गतिविधियाँ भी बड़ी भूमिका निभाती हैं। पॉलिथीन का अत्यधिक उपयोग, कचरे का खुले में जलाना, पराली दहन और औद्योगिक प्रदूषण वातावरण को नुकसान पहुँचा रहे हैं। इनसे निकलने वाली गैसें तापमान बढ़ाती हैं जिससे ग्लेशियरों का संतुलन बिगड़ता है।

हालाँकि कुछ सकारात्मक बदलाव भी देखने को मिले हैं। आज सौर ऊर्जा, विद्युत आधारित परिवहन और स्वच्छ ईंधन के उपयोग से प्रदूषण कम करने के प्रयास हो रहे हैं। फिर भी बढ़ती जनसंख्या, अत्यधिक ऊर्जा खपत और प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध उपयोग नई चुनौतियाँ पैदा कर रहे हैं।

ग्लेशियरों को बचाने के लिए हमें बहुआयामी प्रयास करने होंगे। पर्यावरण संरक्षण, वृक्षारोपण, प्रदूषण नियंत्रण और प्लास्टिक के उपयोग में कमी अत्यंत आवश्यक है। वर्षा जल संचयन (रेन वाटर हार्वेस्टिंग) को बढ़ावा देना भी एक प्रभावी उपाय है जिससे भूजल स्तर को सुधारा जा सकता है। वैज्ञानिक अनुसंधान जैसे प्लास्टिक को नष्ट करने वाले सूक्ष्म जीवों पर शोध को प्रोत्साहित करना भी समय की आवश्यकता है। इसके साथ ही हमें अपनी जीवनशैली में भी बदलाव लाना होगा। ऊर्जा की बचत, प्राकृतिक संसाधनों का संतुलित उपयोग और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार व्यवहार अपनाकर ही हम इस संकट से उबर सकते हैं।

अंतत ग्लेशियर केवल बर्फ के पहाड़ नहीं हैं बल्कि मानव जीवन की धड़कन हैं। यदि आज हम इन्हें बचाने के लिए जागरूक नहीं हुए तो आने वाली पीढ़ियों को जल संकट का सामना करना पड़ेगा।

इसलिए यह केवल सरकार या वैज्ञानिकों की नहीं बल्कि हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है कि हम प्रकृति की इस अमूल्य धरोहर की रक्षा करें।

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हिन्दुस्थान समाचार / सचिन खजूरिया