गुवा गोलीकांड : खनिज संपदा की धरती पर अधिकार की आवाज और शहादत की दर्दनाक दास्तान
- जल-जंगल-जमीन, रोजगार और आदिवासी अधिकारों के सवाल पर आंदोलन ने लिया था उग्र रूप- स्थानीय स्मृतियों में 11 आदिवासी शहीदों का उल्लेख, हर वर्ष 8 सितंबर को मनाया जाता है शहादत दिवस- अलग झारखंड राज्य के संघर्ष की पृष्ठभूमि में गुवा गोलीकांड को माना जाता है महत्वपूर्ण घटना
पश्चिमी सिंहभूम, 08 सितंबर (हि.स.)। लौह अयस्क की लाल मिट्टी, घने जंगलों और पहाड़ियों से घिरा गुवा आज झारखंड की खनिज संपदा की पहचान है, लेकिन इसी धरती के सीने में एक ऐसी दर्दनाक कहानी भी दफन है, जिसे कोल्हान की स्मृतियां आज तक नहीं भुला पाई हैं। 8 सितंबर 1980 का दिन गुवा और पूरे क्षेत्र के इतिहास में एक ऐसे काले अध्याय के रूप में दर्ज है, जब जल, जंगल और जमीन पर अधिकार, स्थानीय लोगों के रोजगार और आदिवासी हितों से जुड़े सवालों को लेकर चल रहा आंदोलन पुलिस और आंदोलनकारियों के बीच खूनी टकराव में बदल गया।
इस संघर्ष के बाद गुवा अस्पताल परिसर में हुई गोलीबारी ने घटना को और भयावह बना दिया। स्थानीय स्मृतियों में इस गोलीकांड से जुड़े 11 आदिवासी शहीदों का उल्लेख मिलता है। इन्हीं शहीदों की स्मृति में हर वर्ष 8 सितंबर को गुवा शहादत दिवस मनाया जाता है। यह दिन केवल श्रद्धांजलि का अवसर नहीं, बल्कि उस दौर की सामाजिक बेचैनी और उन सवालों को याद करने का दिन भी है, जिनके लिए आदिवासी समाज ने लंबा संघर्ष किया।
खनिज से समृद्ध धरती, लेकिन अधिकारों को लेकर बढ़ता असंतोष
गुवा और आसपास का क्षेत्र लौह अयस्क के विशाल भंडार के लिए जाना जाता रहा है। 1980 के दशक से पहले ही यहां बड़े पैमाने पर खनन गतिविधियां शुरू हो चुकी थीं। क्षेत्र की पहाड़ियों में मौजूद लौह अयस्क औद्योगिक विकास के लिए महत्वपूर्ण था, लेकिन स्थानीय आदिवासी समुदाय के सामने विकास के दूसरे ही सवाल थे।
उनके लिए सवाल यह था कि जिस जमीन और प्राकृतिक संसाधनों के बीच उनकी पीढ़ियां गुजर रही हैं, उस संपदा से होने वाले विकास में उनका हिस्सा कहां है। जमीन, रोजगार और पारंपरिक संसाधनों पर अधिकार को लेकर असंतोष लगातार बढ़ रहा था। स्थानीय लोगों को यह महसूस हो रहा था कि उनकी जमीन और क्षेत्र की प्राकृतिक संपदा का उपयोग तो हो रहा है, लेकिन उसके लाभ में स्थानीय समाज की हिस्सेदारी अपेक्षित नहीं है।
आदिवासी समाज में जमीन का अर्थ केवल खेत या संपत्ति नहीं होता। जमीन जीवन, संस्कृति, सामाजिक व्यवस्था और पहचान का आधार होती है। जंगल से मिलने वाले संसाधन उनकी रोजमर्रा की जरूरतों और पारंपरिक जीवन से जुड़े थे। ऐसे में जमीन और जंगल से जुड़े अधिकारों पर किसी भी तरह का दबाव स्थानीय समाज के लिए महज आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि अस्तित्व और अस्मिता का प्रश्न बन जाता था। इन्हीं परिस्थितियों में स्थानीय रोजगार, जमीन और प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार की मांग धीरे-धीरे व्यापक आंदोलन का रूप लेने लगी।
8 सितंबर को गुवा में उमड़ा आंदोलन
8 सितंबर 1980 को गुवा में बड़ी संख्या में आंदोलनकारी जुटे। आंदोलन का केंद्र स्थानीय लोगों के अधिकार और आदिवासी हितों से जुड़े मुद्दे थे। जैसे-जैसे प्रदर्शन आगे बढ़ा, पुलिस और आंदोलनकारियों के बीच तनाव बढ़ता गया। विभिन्न स्थानीय एवं ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, स्थिति बिगड़ने के बाद दोनों पक्षों के बीच हिंसक झड़प हुई।
आंदोलनकारियों के पास तीर-धनुष जैसे पारंपरिक हथियार होने का उल्लेख मिलता है। दूसरी ओर पुलिस ने बल प्रयोग किया और गोलीबारी हुई। टकराव में कई लोग घायल हुए। इस संघर्ष में बिहार मिलिट्री पुलिस के चार जवानों की मौत का भी ऐतिहासिक विवरणों में उल्लेख मिलता है। इसके बाद घटनाक्रम ने और गंभीर रूप ले लिया। लेकिन गुवा गोलीकांड की सबसे भयावह स्मृति उस समय सामने आई, जब संघर्ष में घायल आंदोलनकारियों को इलाज के लिए गुवा अस्पताल ले जाया गया।
अस्पताल परिसर की गोलीबारी ने छोड़े गहरे निशान
घायल आंदोलनकारियों के अस्पताल पहुंचने के बाद जो कुछ हुआ, उसे लेकर स्थानीय समाज में आज भी गहरी पीड़ा और आक्रोश की स्मृति मौजूद है। विभिन्न स्थानीय और ऐतिहासिक विवरणों में आरोप लगाया गया है कि अस्पताल में उपचार करा रहे घायल आंदोलनकारियों को बाहर निकालकर गोली मारी गई। अस्पताल, जहां घायल लोगों को जीवन बचाने के लिए ले जाया गया था, वही स्थान गोलीबारी का केंद्र बन गया। यही स्मृति गुवा की त्रासदी को और अधिक भयावह बनाती है।
इस गोलीकांड में मारे गए लोगों की स्मृति में स्थानीय स्तर पर जिन नामों का उल्लेख किया जाता है, उनमें ईश्वर सरदार, रामो लागूरी, चंदों लागुरी, रेंगी सुरीन, बागी देवगम, जीतू सुरीन, चैतन्य चाम्पिया, चूड़ी हांसदा, जुरा पूर्ति और गोन्डा होनागा समेत अन्य शहीदों के नाम शामिल हैं।
हालांकि स्थानीय स्मृतियों में 11 शहीदों का उल्लेख मिलता है, लेकिन उपलब्ध नामों की विभिन्न सूचियों में अंतर भी पाया जाता है। इसलिए इस घटना से जुड़े शहीदों की संख्या और नामों का उल्लेख करते समय स्थानीय स्मृति और उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के बीच मौजूद अंतर को ध्यान में रखना जरूरी है। फिर भी इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि गुवा की घटना ने स्थानीय समाज के मानस पर गहरा प्रभाव डाला।
गोलीकांड के बाद तेज हुई अधिकारों की आवाज
गुवा गोलीकांड के बाद कोल्हान में आक्रोश और गहरा हुआ। इस घटना ने उन सवालों को और मुखर कर दिया, जिन्हें लेकर आदिवासी समाज पहले से आंदोलनरत था। जल, जंगल और जमीन पर अधिकार का सवाल आंदोलन की केंद्रीय धुरी बन गया। इसके साथ स्थानीय लोगों को रोजगार, विस्थापन, खनिज संपदा पर स्थानीय समुदायों की हिस्सेदारी और आदिवासी अस्मिता के सवाल भी जुड़ते चले गए। यही वे मुद्दे थे, जिन्होंने आगे चलकर झारखंड आंदोलन को व्यापक सामाजिक आधार देने में भूमिका निभाई। अलग राज्य की मांग केवल प्रशासनिक सीमाओं के पुनर्गठन की मांग नहीं थी। उसके पीछे अपनी पहचान, संस्कृति, भाषा, परंपरा और प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार की भावना भी जुड़ी हुई थी। गुवा गोलीकांड इसी व्यापक संघर्ष की पृष्ठभूमि में एक महत्वपूर्ण घटना के रूप में याद किया जाता है।
झारखंड आंदोलन की स्मृति में गुवा का स्थान
झारखंड अलग राज्य की मांग के लिए आंदोलन कई दशकों तक चलता रहा। इस दौरान अनेक छोटे-बड़े आंदोलन हुए और विभिन्न क्षेत्रों में लोगों ने अपनी मांगों को लेकर संघर्ष किया। गुवा की घटना भी इसी संघर्ष की स्मृतियों का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई। आदिवासी समाज के लिए यह घटना केवल अतीत की कोई तारीख नहीं रही। हर वर्ष शहादत दिवस पर शहीदों को याद करना इस बात का प्रतीक है कि संघर्ष की वह स्मृति आज भी समाज की सामूहिक चेतना में मौजूद है।
लंबे आंदोलन के बाद 15 नवंबर 2000 को झारखंड अलग राज्य के रूप में अस्तित्व में आया। राज्य गठन को झारखंड आंदोलन की लंबी यात्रा की ऐतिहासिक परिणति माना गया। लेकिन राज्य बनने के बाद भी उन आंदोलनों और शहादतों की स्मृति समाप्त नहीं हुई, जिन्होंने इस संघर्ष को आकार दिया था।
शहादत स्थल आज भी सुनाता है संघर्ष की कहानी
गुवा में शहीदों की स्मृति को संरक्षित करने के लिए शहादत स्थल बनाया गया है। हर वर्ष 8 सितंबर को यहां श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित होते हैं। स्थानीय लोग और विभिन्न सामाजिक संगठनों से जुड़े लोग शहीदों को नमन करते हैं। इस वर्ष शहीद स्थल का जीर्णोद्धार भी किया गया है। सड़क से शहीद स्मारक तक पहुंचने के लिए सीढ़ी बनाई गई है। इससे श्रद्धालुओं और आम लोगों को स्मारक तक पहुंचने में सुविधा होगी। यह जीर्णोद्धार केवल एक स्थल के विकास तक सीमित नहीं है। स्थानीय समाज के लिए यह उस ऐतिहासिक स्मृति को सुरक्षित रखने की कोशिश है, जिसे आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना जरूरी माना जाता है।
आज भी जिंदा हैं गुवा के सवाल
गुवा गोलीकांड को चार दशक से अधिक समय बीत चुका है। दुनिया बदल गई, झारखंड अलग राज्य बन गया और विकास की नई परियोजनाएं सामने आईं। लेकिन गुवा की कहानी में उठे कई सवाल आज भी प्रासंगिक हैं। खनिज संपदा से समृद्ध क्षेत्रों में स्थानीय लोगों को रोजगार कितना मिला? प्राकृतिक संसाधनों के दोहन से प्रभावित समुदायों को विकास में कितना हिस्सा मिला? जमीन और जंगल से जुड़े पारंपरिक अधिकारों की रक्षा कैसे हुई? विकास की प्रक्रिया में स्थानीय समाज की भागीदारी कितनी रही? ये सवाल केवल गुवा के नहीं हैं। देश के उन तमाम आदिवासी और खनिज बहुल इलाकों से जुड़े हैं, जहां प्राकृतिक संपदा और स्थानीय समुदायों के अधिकार आमने-सामने आते रहे हैं।
गुवा की घटना यह भी याद दिलाती है कि विकास केवल खनिज उत्पादन या औद्योगिक विस्तार का नाम नहीं है। विकास का वास्तविक अर्थ तभी पूरा होता है, जब उससे प्रभावित समाज को सम्मान, अधिकार, रोजगार और बेहतर जीवन का अवसर मिले।--------------
हिन्दुस्थान समाचार / गोविंद पाठक