हरतालिका तीज : शिव-पार्वती के अटूट प्रेम और अखंड सौभाग्य का पर्व
-हरतालिका तीज (14 सितंबर) पर विशेष-उदय कुमार सिंह
हरतालिका तीज भारतीय सनातन परंपरा में सुहाग, दांपत्य सुख, प्रेम और पारिवारिक मंगलकामना से जुड़ा प्रमुख पर्व है। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाने वाला यह व्रत भगवान शिव और माता पार्वती के अटूट दांपत्य का स्मरण कराता है। इस वर्ष हरतालिका तीज का पर्व 14 सितंबर को मनाया जाएगा। इस अवसर पर सुहागिन महिलाएं पति की लंबी आयु, स्वस्थ जीवन, अखंड सौभाग्य और दांपत्य जीवन में सुख-शांति की कामना के साथ निर्जला व्रत रखेंगी। अविवाहित युवतियां भी मनचाहे वर की प्राप्ति की कामना से यह व्रत करती हैं।
हरतालिका तीज केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित पर्व नहीं है बल्कि यह भारतीय परिवार और सामाजिक जीवन में स्त्री की आस्था, त्याग और पारिवारिक मंगलकामना की अभिव्यक्ति भी है। इस दिन महिलाएं पारंपरिक परिधान और सोलह शृंगार से सजती हैं। घरों और मंदिरों में भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा के लिए विशेष तैयारियां की जाती हैं। मिट्टी से शिव-पार्वती की प्रतिमाएं बनाकर उनका पूजन करने की भी परंपरा है।
माता पार्वती की तपस्या से जुड़ी है मान्यताहरतालिका तीज की धार्मिक मान्यता भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह से जुड़ी हुई है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी। उन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी अपनी साधना जारी रखी और अन्न-जल का त्याग कर भगवान शिव की आराधना की। उनकी तपस्या और दृढ़ संकल्प से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार किया।
इसी कथा को हरतालिका तीज के व्रत की मूल भावना से जोड़ा जाता है। मान्यता है कि माता पार्वती की तरह श्रद्धा और संकल्प के साथ व्रत करने वाली महिलाओं को दांपत्य जीवन में सुख, सौभाग्य और स्थायित्व का आशीर्वाद प्राप्त होता है। यही कारण है कि इस दिन शिव-पार्वती की पूजा को विशेष महत्व दिया जाता है।
हरतालिका तीज नाम के पीछे भी एक धार्मिक कथा जुड़ी है। मान्यता के अनुसार माता पार्वती को उनके पिता ने भगवान विष्णु से विवाह का प्रस्ताव दिया था, लेकिन पार्वती भगवान शिव को ही पति रूप में चाहती थीं। उनकी सखी उन्हें एक वन में ले गईं, जहां उन्होंने भगवान शिव को पाने के लिए कठोर तपस्या की। 'हरत' और 'आलिका' यानी सखी द्वारा उन्हें हर ले जाने की कथा से इस व्रत का नाम हरतालिका पड़ा।
निर्जला व्रत और रात्रि जागरण की परंपराहरतालिका तीज को कठिन व्रतों में गिना जाता है। परंपरा के अनुसार व्रती महिलाएं पूरे दिन अन्न और जल का त्याग करती हैं। कई स्थानों पर रात्रि जागरण की परंपरा भी है। महिलाएं सामूहिक रूप से शिव-पार्वती के भजन, कीर्तन और तीज के लोकगीत गाती हैं।
सुबह स्नान-ध्यान के बाद महिलाएं पूजा की तैयारी करती हैं। परंपरागत रूप से नदी, सरोवर या अन्य पवित्र जलस्रोत में स्नान करने का उल्लेख मिलता है। इसके बाद भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा की जाती है। पूजन में बेलपत्र, दूब, दूध, बेर, धतूरा, पुष्प, अक्षत, चंदन, धूप और दीप सहित विभिन्न पूजन सामग्री अर्पित की जाती है।
कई क्षेत्रों में महिलाएं मिट्टी से भगवान शिव, माता पार्वती और गणेश की प्रतिमाएं तैयार करती हैं। इन्हें पूजा स्थल पर स्थापित कर विधि-विधान से पूजन किया जाता है। माता पार्वती को सुहाग की सामग्री अर्पित करने की परंपरा भी है। महिलाएं स्वयं सोलह शृंगार करती हैं और माता गौरी को भी शृंगार सामग्री अर्पित करती हैं।
पूजा में कथा और आरती का विशेष महत्वहरतालिका तीज की पूजा में भगवान गणेश का स्मरण कर पूजा का शुभारंभ किया जाता है। इसके बाद भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा की जाती है। व्रत की कथा सुनने और सुनाने की भी परंपरा है। कथा के माध्यम से माता पार्वती की तपस्या और भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने की उनकी इच्छा का स्मरण किया जाता है।
पूजा के बाद शिव-पार्वती की आरती की जाती है और श्रद्धालु अपने परिवार की सुख-समृद्धि, पति की दीर्घायु तथा संतान के मंगल की कामना करते हैं। अविवाहित युवतियां योग्य और मनचाहे वर की प्राप्ति की प्रार्थना करती हैं।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, हरतालिका तीज का व्रत केवल पति की लंबी आयु के लिए ही नहीं, बल्कि वैवाहिक जीवन में प्रेम, विश्वास और सामंजस्य बनाए रखने की कामना से भी किया जाता है। यही वजह है कि इस पर्व का भावनात्मक पक्ष भी काफी मजबूत है।
कैसे करें हरतालिका तीज की पूजा?हरतालिका तीज की पूजा से पहले व्रती महिलाओं को स्नान-ध्यान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए। पूजा के लिए आवश्यक सामग्री पहले से तैयार कर लेना सुविधाजनक रहता है। इसमें गौरा-पार्वती की मिट्टी की प्रतिमा, भगवान शिव की प्रतिमा या प्रतीक, पुष्प, फल, धूप, दीप, आसन, वस्त्र, जल, अक्षत, चंदन, पान, सुपारी और शृंगार सामग्री आदि शामिल किए जा सकते हैं।
पूजा स्थल को स्वच्छ कर वहां शिव-पार्वती की प्रतिमा स्थापित की जाती है। सबसे पहले व्रत और पूजा का संकल्प लिया जाता है। इसके बाद भगवान गणेश का पूजन किया जाता है। गणेश पूजन के बाद माता पार्वती और भगवान शिव का आवाहन कर विधि-विधान से पूजा की जाती है।
पूजन के दौरान शिवलिंग या भगवान शिव को जल, दूध, बेलपत्र, पुष्प आदि अर्पित किए जाते हैं। माता पार्वती को पुष्प और सुहाग सामग्री चढ़ाई जाती है। इसके बाद हरतालिका तीज की कथा का श्रवण किया जाता है। अंत में शिव-पार्वती की आरती कर पूजा स्थल की प्रदक्षिणा की जाती है।
पूजा समाप्त होने पर पति की दीर्घायु, परिवार की सुख-समृद्धि और संतान के मंगल की कामना की जाती है। परंपरा के अनुसार सामर्थ्य के अनुसार किसी सुहागिन महिला या ब्राह्मणी को अन्न, वस्त्र, धन अथवा शृंगार सामग्री का दान भी किया जाता है।
14 सितंबर को ये रहेंगे प्रमुख मुहूर्त
इस वर्ष हरतालिका तीज के दिन पूजा के लिए कई महत्वपूर्ण समय बताए गए हैं-
ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 4:32 बजे से 5:19 बजे तक
पूजन का शुभ मुहूर्त: सुबह 6:05 बजे से 7:06 बजे तक
अभिजीत मुहूर्त: सुबह 11:52 बजे से दोपहर 12:41 बजे तक
पूजा के लिए सुबह 6:05 बजे से 7:06 बजे तक का समय विशेष रूप से शुभ माना गया है। हालांकि अलग-अलग स्थानों पर सूर्योदय और पंचांग के अनुसार मुहूर्त में थोड़ा अंतर हो सकता है।
हरतालिका तीज पर बनेंगे शुभ संयोगज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार इस वर्ष हरतालिका तीज पर कई शुभ योगों का संयोग बन रहा है। इस दिन चित्रा नक्षत्र के साथ ब्रह्म योग का निर्माण बताया गया है। इसके अलावा ऐन्द्र योग का भी प्रभाव रहेगा। धार्मिक दृष्टि से ऐसे शुभ संयोगों में भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना को विशेष फलदायी माना जाता है।
मान्यता है कि शुभ योगों में विधि-विधान से पूजा करने से परिवार में सुख-शांति और वैवाहिक जीवन में सामंजस्य बना रहता है। हालांकि इन योगों के फल से संबंधित मान्यताएं ज्योतिषीय और धार्मिक परंपराओं पर आधारित हैं।
हरतालिका तीज के दिन विभिन्न कार्यों के लिए चौघड़िया देखने की भी परंपरा है। उपलब्ध पंचांग विवरण के अनुसार दिन के चौघड़िया इस प्रकार हैं।
दिन का चौघड़ियाअमृत : सुबह 6:05 से 7:38 बजे तक
काल : सुबह 7:38 से 9:11 बजे तक
शुभ : सुबह 9:11 से 10:43 बजे तक
रोग : सुबह 10:43 से दोपहर 12:16 बजे तक
उद्वेग : दोपहर 12:16 से 1:49 बजे तक
चर : दोपहर 1:49 से 3:22 बजे तक
अमृत : शाम 4:55 से 6:28 बजे तक
रात का चौघड़िया
चर : शाम 6:28 से 7:55 बजे तक
रोग : शाम 7:55 से रात 9:22 बजे तक
काल : रात 9:22 से 10:49 बजे तक
लाभ : रात 10:49 से 12:16 बजे तक
उद्वेग : रात 12:16 से 1:43 बजे तक
शुभ : रात 1:43 से 3:11 बजे तक
अमृत : रात 3:11 से 4:38 बजे तक
चर : सुबह 4:38 से 6:05 बजे तक
15 सितंबर को सूर्योदय के बाद खुलेगा व्रतहरतालिका तीज का व्रत सामान्य उपवास से अलग माना जाता है। निर्जला व्रत होने के कारण इसके पारण को लेकर भी विशेष सावधानी बरती जाती है। इस वर्ष व्रत का पारण 15 सितंबर 2026 को सूर्योदय के बाद किया जाएगा। धार्मिक मान्यता के अनुसार पारण से पहले भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करना शुभ माना जाता है। इसके बाद व्रती महिलाएं व्रत खोलती हैं। लंबे समय तक निर्जला व्रत रखने के कारण पारण के समय हल्का और सहज भोजन या पेय लेने की परंपरा कई परिवारों में देखने को मिलती है।
लोकजीवन और संस्कृति से भी गहरा जुड़ावहरतालिका तीज का महत्व केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है। यह पर्व भारतीय लोकजीवन और महिला संस्कृति से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। गांवों से लेकर शहरों तक महिलाएं समूह में तीज के गीत गाती हैं। पारंपरिक गीतों में शिव-पार्वती के विवाह, माता पार्वती की तपस्या, मायके-ससुराल के रिश्तों और वैवाहिक जीवन की भावनाओं का चित्रण मिलता है।
कई स्थानों पर तीज के अवसर पर झूले लगाए जाते हैं और महिलाएं पारंपरिक गीतों के साथ उत्सव मनाती हैं। नवविवाहित महिलाओं के लिए यह पर्व विशेष महत्व रखता है। मायके से उनके लिए वस्त्र, शृंगार सामग्री, मिठाई और अन्य उपहार भेजने की परंपरा भी अनेक क्षेत्रों में प्रचलित है।
इस प्रकार हरतालिका तीज धार्मिक आस्था के साथ पारिवारिक संबंधों को भी मजबूत करने वाला पर्व बन जाता है। यह पर्व पति-पत्नी के रिश्ते में प्रेम और विश्वास की कामना के साथ मां-बेटी, बहन-सखी और परिवार के बीच आत्मीयता को भी बढ़ाता है।-----------
हिन्दुस्थान समाचार / उदय कुमार सिंह