सिरोंज में सदियों पुरानी परंपरा , बंदूक की गोली से होगा होलिका दहन
विदिशा, 02 मार्च (हि.स.)। मप्र के विदिशा जिले के सिरोंज नगर में होलिका दहन की एक अनोखी और सदियों पुरानी परंपरा आज भी पूरे श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाई जाती है। इस वर्ष भी नगर में पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ होलिका दहन का आयोजन किया जाएगा। खास बात यह है कि यहां की “बड़ी होली” को बंदूक से गोली चलाकर प्रज्वलित किया जाता है। उसी अग्नि से नगर के विभिन्न स्थानों पर स्थापित अन्य होलिकाओं को जलाया जाता है।
जानकारी के अनुसार सिरोंज नगर में इस बार 33 से अधिक स्थानों पर होलिका दहन किया जाएगा। इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु और नागरिक उपस्थित रहेंगे। त्योहार के दौरान किसी भी प्रकार की अव्यवस्था न हो, इसके लिए पुलिस और प्रशासन ने सुरक्षा के विशेष इंतजाम किए हैं। प्रमुख स्थानों पर पुलिस बल तैनात रहेगा और संवेदनशील क्षेत्रों में निगरानी भी रखी जाएगी।
सिरोंज की यह परंपरा पूरे क्षेत्र में अपनी अलग पहचान रखती है। यहां बड़ी होली को जलाने की प्रक्रिया बेहद अनोखी है। होलिका दहन के लिए पहले सूखी घास, लकड़ी और रुई का ढेर लगाया जाता है। इसके बाद पारंपरिक तरीके से बंदूक से गोली चलाई जाती है। गोली से उत्पन्न चिंगारी और आग से होलिका प्रज्वलित होती है। इसके बाद उसी अग्नि से नगर के अन्य स्थानों की होलिकाओं को भी जलाया जाता है।
धर्माचार्य पंडित नलिनीकांत शर्मा के अनुसार यह परंपरा कई सौ वर्षों से चली आ रही है और इसका संबंध होल्कर शासनकाल से माना जाता है। उस समय इस बड़ी होली को “रावजी की होली” कहा जाता था। होल्कर राज्य के समय भी इसी प्रकार सूखी घास और रुई का ढेर लगाकर बंदूक से फायर किया जाता था, जिससे आग उत्पन्न होती थी और उसी से होली जलाई जाती थी।
बताया जाता है कि बाद में इस परंपरा को होल्कर स्टेट के कानूनगो परिवार ने आगे बढ़ाया। तब से लेकर आज तक यह परंपरा लगातार जारी है। वर्तमान में सिरोंज के कानूनगो माथुर परिवार द्वारा इस ऐतिहासिक परंपरा का निर्वहन किया जा रहा है। परिवार के सदस्य हर वर्ष विधि-विधान से बड़ी होली का आयोजन करते हैं और उसी परंपरा के अनुसार बंदूक से फायर कर होली को प्रज्वलित करते हैं।
कानूनगो माथुर परिवार के वंशज महेश माथुर बताते हैं कि इतिहास में एक समय ऐसा भी आया जब इस परंपरा को रोकने की कोशिश की गई थी। यह घटना उस समय की बताई जाती है जब सिरोंज में नबाबी शासन स्थापित हुआ था। उस दौर में इस अनोखी परंपरा पर रोक लगाने का प्रयास किया गया था।
महेश माथुर के अनुसार उस समय भी उनके पूर्वजों ने परंपरा को जीवित रखा। उन्होंने होली के चबूतरे पर सूखी घास का ढेर लगाया और बंदूक से फायर कर उसे प्रज्वलित किया। इसके बाद से यह परंपरा लगातार पीढ़ी दर पीढ़ी निभाई जा रही है और आज भी उसी श्रद्धा के साथ जारी है।
नगरवासियों के लिए यह परंपरा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं बल्कि उनकी सांस्कृतिक पहचान भी है। हर वर्ष बड़ी संख्या में लोग इस अनोखे होलिका दहन को देखने के लिए एकत्र होते हैं। बड़ी होली जलने के बाद नगर के अन्य मोहल्लों और चौक-चौराहों पर भी उसी अग्नि से होलिका दहन किया जाता है।
होलिका दहन को लेकर नगर में उत्साह का माहौल है। लोग पहले से ही इसकी तैयारियों में जुट गए हैं। होली के इस विशेष आयोजन को देखने के लिए आसपास के क्षेत्रों से भी लोग सिरोंज पहुंचते हैं।
पुलिस-प्रशासन ने भी त्योहार को शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न कराने के लिए व्यापक तैयारियां की हैं। नगर के प्रमुख चौराहों और होलिका दहन स्थलों पर पुलिस की तैनाती की जाएगी। साथ ही सुरक्षा व्यवस्था को लेकर लगातार निगरानी भी रखी जाएगी।
उल्लेखनीय है कि सदियों पुरानी यह अनोखी परंपरा आज भी सिरोंज की सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखे हुए है। बंदूक की गोली से होलिका दहन की यह परंपरा नगरवासियों की आस्था, इतिहास और संस्कृति का प्रतीक बन चुकी है, जिसे आज भी पूरे सम्मान और उत्साह के साथ निभाया जा रहा है।
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हिन्दुस्थान समाचार / राकेश मीना