विभाजन विभीषिका विशेष : जिस बच्चे का जन्म ही शरणार्थी कैंप में हुआ
-सिंध की संपन्नता से मुंबई के कैंप और मध्य प्रदेश में नई जिंदगी तक झामनानी परिवार की कहानी
इंदौर, 13 अगस्त (हि.स.)। वह रात शायद किसी मां के लिए जिंदगी की सबसे कठिन रात रही होगी। एक ओर गर्भ में पल रहा बच्चा था, दूसरी ओर चारों तरफ अनिश्चितता, भय और बिछड़ने का खतरा। घर पीछे छूट चुका था, सामान कितना बचा है इसकी चिंता से अधिक चिंता इस बात की थी कि परिवार के लोग सुरक्षित रह पाएंगे या नहीं।
दरअसल, जिस भूमि को पीढ़ियों से अपना घर माना था, इस्लामिक जिहादियों की बढ़ती हिंसा, भीड़ में आकर जबरन हिन्दू युवतियों को उठाकर ले जाने की दिनोंदिन बढ़ती घटनाओं के बीच अनेक गैर हिन्दू परिवारों को रातों-रात अविभाजित भारत के सिंध प्रांन्त समेत लाहौर, करांची, (वर्तमान पाकिस्तान) से सब कुछ छोड़कर एक अनजान सफर पर निकलना पड़ा था और वह मंजिल थी भारत, किंतु भारत तक पहुंचना भी कहीं से सुरक्षित नहीं था।
लोग जिंदगी को दाव पर लगाकर घंटों भारत की नई सरहद पार करने निकल पड़े थे । इन्हीं में से एक झामनानी परिवार भी कई दिनों के प्रयासों के बाद किसी तरह से भारत की नई सीमामें प्रवेश करने में सफल रहा था। लाड़काना के पास शहदाद कोट से शुरू हुई यह यात्रा कराची, फिर हैदराबाद और उसके बाद समुद्र के रास्ते मुंबई तक पहुंची। परिवार में करीब 20-22 लोग थे और दो महिलाएं गर्भवती थीं। रास्ते में हर पड़ाव पर डर था, लेकिन उनके साथ एक उम्मीद भी थी कि भारत पहुंच जाएंगे तो शायद जिंदगी फिर से शुरू हो सकेगी।
वास्तव में विभाजन उस विराट त्रासदी की ये कहानी उस वक्त लाखों सिंधी हिंदुओं की है, जिन्हें अपनी जन्मभूमि छोड़कर भारत आना पड़ा, किंतु उनके परिवार की स्मृतियों में वह आज भी जीवित है- एक ऐसा दर्द, जिसकी शुरुआत उनके जन्म से पहले हो चुकी थी।
सिंध में था घर, कारोबार और अपना संसार
विभाजन से पहले झामनानी परिवार सिंध में रहता था। वहां जीवन अपनी गति से चल रहा था। घर था, सामाजिक पहचान थी और भविष्य को लेकर सामान्य उम्मीदें थीं, पर 1947 के बाद परिस्थितियां तेजी से बदलने लगीं। सिंध का विभाजन पंजाब की तरह नहीं हुआ। पूरा सिंध पाकिस्तान में चला गया। सिंध में रहने वाले अनेक हिंदू परिवारों ने शुरुआत में रुकने की कोशिश की। उन्हें उम्मीद थी कि हालात सामान्य हो जाएंगे। लेकिन जैसे-जैसे असुरक्षा बढ़ी, बड़ी संख्या में परिवार भारत की ओर निकलने लगे।
दादा हरसुमल ने लिया वह फैसला, जिसने पूरी पीढ़ी की जिंदगी बदल दी
परिवार के मुखिया हरसुमल भागचंद झामनानी ने जब भारत आने का निर्णय लिया तो उनसे तत्कालीन इस्लामिक जिहादियों ने यही कहा कि यहां सब कुछ छोड़कर जाना होगा। करीब 20-22 सदस्यों को सुरक्षित निकालना था। साथ में महिलाएं थीं, बच्चे थे और परिवार की अगली पीढ़ी को जन्म देने वाली दो गर्भवती महिलाएं भी थीं, इसलिए उन तमाम इस्लामिक जिहादियों की बात मानना झामनानी परिवार की मजबूरी बन गई ।
शहदाद कोट से कराची तक पहुंचना, कराची से ट्रेन द्वारा हैदराबाद और फिर समुद्र के रास्ते मुंबई, यह यात्रा उस समय कितनी कठिन रही होगी, इसकी कल्पना आज की पीढ़ी शायद ही कर सके। न सामान की सुरक्षा की गारंटी थी, न रास्ते की। हर स्टेशन पर आशंका थी। हर भीड़ में इस्लाम का जिहादी खतरा महसूस होता था। परिवार के बुजुर्गों की चिंता अलग थी और गर्भवती महिलाओं को सुरक्षित रखने की चिंता अलग, लेकिन उस कारवां की दिशा एक ही थी, भारत। भारत पहुंचते ही यहां एक नए संघर्ष की शुरुआत हो उठी। परिवार किसी तरह मुंबई पहुंचा और शरणार्थी शिविर में रहने लगा।
यही वह जगह थी जहां विस्थापित परिवारों की नई जिंदगी का पहला अध्याय शुरू होता था।जो लोग कल तक अपने घरों के मालिक थे, वे अब कैंप में रहने वाले शरणार्थी थे। अपनी रसोई नहीं, अपना कमरा नहीं, अपने घर की सुरक्षा नहीं। भोजन और आवास के लिए सरकारी व्यवस्था पर निर्भरता थी। इसी बीच परिवार की दोनों गर्भवती महिलाओं ने सरकारी शेल्टर होम में बच्चों को जन्म दिया। ईश्वरदास झामनानी इसी विस्थापन के दौर में जन्मे, इसलिए उनके जीवन की शुरुआत ही उस पीढ़ी के संघर्ष के बीच हुई जिसने अपने जन्मस्थान को पीछे छोड़ दिया था।
मुंबई का कैंप; जहां शरण मिली, लेकिन घर नहीं
मुंबई और उसके बाद पुनर्वास की प्रक्रिया में परिवार को दिल्ली के शरणार्थी कैंप में भी रहना पड़ा। देश की राजधानी दिल्ली और आर्थिक राजधानी मुंबई उस समय विभाजन से आए हजारों-लाखों लोगों के पुनर्वास का बड़ा केंद्र बन चुकी थी। कैंप का जीवन किसी स्थायी घर जैसा नहीं था। तंबू, अस्थायी कमरे, सीमित भोजन और भविष्य को लेकर अनिश्चितता, यही दिनचर्या थी। हर परिवार के पास अपनी एक कहानी थी। कोई लाहौर से आया था, कोई सिंध से, कोई कराची से। सबके पास अलग-अलग स्मृतियां थीं, लेकिन दर्द एक जैसा था; घर छूट गया था।
झामनानी परिवार के लिए भी यह समय जीवन की सबसे कठिन परीक्षाओं में से एक था
ईश्वरदास बताते हैं कि विस्थापन के बाद परिवार को खाने के लिए लाल चावल और घटिया किस्म का ज्वार तक मिलना कठिन परिस्थितियों की याद दिलाता है। रहने के लिए ऐसे मकान मिले थे, जिनकी हालत खराब थी। कभी संपन्न रहे परिवार के सामने अब रोजी-रोटी का संकट था। दादा हरसुमल भागचंद झामनानी अशक्त थे। सिंध से विभाजन के दौरान वहां रह रहे 15 लाख हिंदू में से साढ़े 12 लाख लोग भारत आए थे।
विभाजन की त्रासदी का सबसे मार्मिक पक्ष यह था कि संकट ने उम्र और हैसियत का अंतर मिटा दिया था। परिवार के अशक्त हो चुके दादा को भी काम करना पड़ा। यहां तक कि तीन-चार साल की उम्र का बच्चा भी परिवार की आर्थिक जद्दोजहद से अछूता नहीं रहा।
ईश्वरदास की स्मृतियों में यह प्रसंग आज सिर्फ गरीबी का वर्णन नहीं करते हैा, वे इसे अपने समय के सामाजिक पतन की तस्वीर मानते हैं, जिसमें एक परिवार, जिसने कभी सम्मान और सुविधा का जीवन जिया था, अचानक अस्तित्व बचाने की स्थिति में पहुंच गया था। विभाजन ने घर छीना, लेकिन उसके साथ आत्मनिर्भर होने का अधिकार भी कुछ समय के लिए छीन लिया।
लूट और अभाव के बीच भारत पर भरोसा बना रहा
विस्थापन की यात्रा में परिवार को असामाजिक तत्वों की लूट का सामना भी करना पड़ा। जो कुछ बचाकर लाए थे, उसमें से भी बहुत कुछ चला गया। फिर भी परिवार भारत आने पर आशान्वित था। सरकारी सहायता और पुनर्वास व्यवस्था ने कठिन समय में सहारा दिया। शरणार्थी कैंपों में जीवन भले ही कठिन था, लेकिन कम से कम परिवार को यह विश्वास था कि यहां उनके बच्चों का भविष्य सुरक्षित हो सकता है। यही विश्वास आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी पूंजी बना।
दिल्ली से मध्य प्रदेश-फिर शुरू हुआ स्थायी घर बनाने का संघर्ष
कैंप की अस्थायी जिंदगी के बाद झामनानी परिवार मध्य प्रदेश आया। यहां फिर से जीवन खड़ा करना था। न वह पुराना घर था, न पुराना कारोबार और न वह संपन्नता, जिसे परिवार सिंध में पीछे छोड़ आया था, लेकिन था यदि साथ तो वह श्रम का संस्कार था।मध्य प्रदेश ने ऐसे अनेक विस्थापित परिवारों को नया आधार दिया। झामनानी परिवार ने भी यहीं अपनी नई पहचान बनानी शुरू की।
पिता से मिली राष्ट्रसेवा की सीख
ईश्वरदास झामनानी के जीवन में उनके पिता स्वतंत्रता सेनानी स्वर्गीय होटलदास हरसुमल झामनानी की भूमिका विशेष रही। विभाजन की पीड़ा के बावजूद परिवार ने राष्ट्र के प्रति आस्था को कमजोर नहीं होने दिया। शायद यही कारण है कि आगे चलकर ईश्वरदास ने समाजसेवा को अपने जीवन का उद्देश्य बनाया। पांच दशकों से अधिक समय से वे सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षणिक और जनकल्याण के कार्यों में सक्रिय रहे हैं। आज वे विभिन्न सामाजिक संगठनों के माध्यम से सिंधी समाज को संगठित करने, युवाओं को जोड़ने और सिंधी भाषा-संस्कृति के संरक्षण की दिशा में कार्य कर रहे हैं।
सिंध छूटा, लेकिन सिंधियत नहीं
ईश्वरदास कहते हैं, “विभाजन के बाद सिंधी समाज के सामने सबसे बड़ा प्रश्न पुनर्वास का था। साथ ही अपनी भाषा, संस्कृति और पहचान को बचाए रखना भी चुनौती थी। अपनी जमीन से विस्थापित होने के बाद भी सिंधी समाज ने अपनी संस्कृति को विस्थापित नहीं होने दिया। मंदिर बने, सामाजिक संस्थाएं बनीं, शैक्षणिक संस्थाएं खड़ी हुईं और व्यापारिक नेटवर्क विकसित हुए।” ईश्वरदास झामनानी आज नई पीढ़ी से इसी विरासत को आगे बढ़ाने का आग्रह करते हैं। उनका कहना है कि समाज की पहचान के लिए जितनी जरूरी जीवन में आर्थिक सफलता है, उतनी ही भाषा, संस्कृति, संस्कार और सेवा भी है।
कैंप की जिंदगी से समाजसेवा तक
आज जब ईश्वरदास झामनानी सामाजिक जीवन में सक्रिय हैं, विभिन्न संस्थाओं में जिम्मेदारियां निभा रहे हैं और समाज की नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने की बात करते हैं, तब उनके पीछे खड़ा वह अतीत भी दिखाई देता है जिसमें उनका परिवार एक शरणार्थी कैंप में जिंदगी की शुरुआत कर रहा था।
जिस पीढ़ी ने सब कुछ खोकर अगली पीढ़ी को सब कुछ दिया
विभाजन ने झामनानी परिवार की पहली पीढ़ी से बहुत कुछ छीन लिया। मगर उस पीढ़ी ने अपनी अगली पीढ़ी से उम्मीद नहीं छीनी। उन्होंने बच्चों को संघर्ष करना सिखाया। मेहनत करना सिखाया। अपनी भाषा और संस्कृति को याद रखना सिखाया। और सबसे बढ़कर यह सिखाया कि घर केवल ईंट-पत्थर से नहीं बनता; घर उन रिश्तों, संस्कारों और स्मृतियों से बनता है जिन्हें इंसान अपने साथ लेकर चलता है।
यह कहना होगा कि एक पीढ़ी ने कैंप में रातें काटीं, दूसरी ने घर बनाया और तीसरी आज अपनी पहचान के साथ आगे बढ़ रही है। यही विभाजन की राख से निकली उस पीढ़ी की सबसे बड़ी विजय है, जिसने अपना अतीत खोया जरूर, किंतु अपने भविष्य को हारने नहीं दिया।
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी