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73 की उम्र में भी थमे नहीं हाथ, जसवाणी के रिखी राम बचा रहे बांस शिल्प की आखिरी लौ

 


बिलासपुर, 26 फ़रवरी (हि.स.)। जिला बिलासपुर की तहसील घुमारवीं के गांव जसवाणी में 73 वर्षीय रिखी राम आज भी अपने हाथों की मेहनत और पीढ़ियों से मिले पारंपरिक हुनर के सहारे जीवन यापन कर रहे हैं। उम्र के इस पड़ाव पर जहां अधिकांश लोग विश्राम चाहते हैं, वहीं रिखी राम रोज सुबह बांस की पतली पट्टियां चीरकर टोकरी, खारे और छड़ोलू तैयार करते हैं। उनके चेहरे की झुर्रियों में अनुभव की गहराई है, लेकिन आंखों में एक चिंता भी—कहीं बांस और लकड़ी की यह परंपरागत कारीगरी उनके साथ ही खत्म न हो जाए।

रिखी राम बताते हैं कि उन्होंने शुरुआती लगभग 15 वर्ष पढ़ाई में लगाए, लेकिन आठवीं कक्षा में अंग्रेजी विषय में असफल होने के बाद स्कूल छोड़ दिया। इसके बाद पास के गांव भदरोग में 10–12 वर्षों तक लकड़ी की कारीगरी सीखी। कठिन परिश्रम और लगन से उन्होंने काष्ठकला में महारत हासिल की।

रोजगार की तलाश उन्हें हिमाचल के कई पहाड़ी जिलों—शिमला, सिरमौर और अन्य क्षेत्रों—तक ले गई। उस दौर में पहाड़ी इलाकों में लकड़ी के मकान, दरवाजे-खिड़कियां और पारंपरिक ढांचों की काफी मांग थी, और रिखी राम की कारीगरी को सम्मान भी मिलता था।

एक चोट ने बदल दी जिंदगी

करीब दस वर्ष पहले जसवाणी में एक मकान निर्माण के दौरान उनके हाथ में गंभीर चोट लगी और हड्डियां टूट गईं। भारी लकड़ी का काम छोड़ना पड़ा। अचानक आय का स्रोत बंद हो गया, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने बांस से टोकरी और अन्य पारंपरिक बर्तन बनाना शुरू किया। यह काम अपेक्षाकृत हल्का था और गांव में इसकी मांग भी थी। कुछ वर्षों तक सब ठीक चलता रहा।

प्लास्टिक ने छीना बाजार

समय बदला और बाजार भी। सस्ते और टिकाऊ प्लास्टिक उत्पादों की बढ़ती उपलब्धता ने बांस के सामान की मांग को तेजी से घटा दिया।

रिखी राम कहते हैं कि पहले हर घर में बांस की टोकरी और खारे होते थे। अब ये सिर्फ खास मौकों तक सीमित रह गए हैं। समस्या सिर्फ मांग की नहीं है। पहले आसपास के गांवों में बांस आसानी से मिल जाता था, अब कच्चा माल ढूंढने के लिए दूर-दूर भटकना पड़ता है। कम उपलब्धता और बढ़ती लागत ने इस परंपरा को और कमजोर कर दिया है।

रिखी राम की सबसे बड़ी चिंता यह है कि युवा पीढ़ी इस काम से दूर जा रही है। मेहनत ज्यादा और आमदनी कम होने के कारण यह पेशा आकर्षक नहीं रहा। आधुनिक शिक्षा और नौकरी की दौड़ में पारंपरिक शिल्प पीछे छूटता जा रहा है। हालांकि उन्होंने अपने बेटे को यह हुनर सिखाया है, लेकिन वे मानते हैं कि केवल पारिवारिक प्रयासों से यह कला लंबे समय तक जीवित नहीं रह पाएगी।

उम्मीद की किरण सरकारी योजना

सरकार ने पारंपरिक कारीगरों और शिल्पकारों की सहायता के लिए विश्वकर्मा योजना चलाई है। इस योजना के माध्यम से जहां टूल किट खरीदने के लिए 15 हजार रुपये का अनुदान दिया जाता है तो वहीं सस्ती दरों पर ऋण की सुविधा भी प्रदान की जा रही है। इसके अतिरिक्त पांच दिन का एडवांस प्रशिक्षण भी प्रदान किया जाता है

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हिन्दुस्थान समाचार / सुनील शुक्ला