देश में पशुधन के लिए रोग मुक्त भविष्य, मध्य प्रदेश में बदलाव की बानगी
भोपाल, 31 अगस्त (हि.स.)। मध्य प्रदेश दुग्ध उत्पादन में देश का पहला राज्य होगा, मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव यूं ही नहीं कहते। न ही उन्होंने देश के कुल दुग्ध उत्पादन में प्रदेश की हिस्सेदारी को 12 फीसद से बढ़ाकर 20 प्रतिशत तक करने का लक्ष्य यूं ही ले लिया है। राज्य में यह सब भविष्य में संभव होने जा रहा है, एनएडीसीपी से ।
दरअसल, मध्य प्रदेश में पशुधन के स्वास्थ्य को लेकर चलाया जा रहा अभियान अब अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंच चुका है। यह प्रदेश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था, पशुपालकों की आय और डेयरी उद्योग के भविष्य से सीधे जुड़ा व्यापक प्रयास है, जिसे केंद्र सरकार के राष्ट्रीय पशु रोग नियंत्रण कार्यक्रम (एनएडीसीपी) के तहत खुरपका-मुंहपका (एफएमडी) और ब्रूसेलोसिस जैसी गंभीर बीमारियों पर नियंत्रण के लिए चलाया जा रहा है।
55 जिलों में साल में दो बार मुफ्त टीकाकरण
इस संबंध में संचालनालय पशुपालन एवं डेयरी विभाग में उपसंचालक डॉ. उमा परते कहती हैं, “मध्य प्रदेश केंद्र सरकार के टीकाकरण कार्यक्रम में देश के शीर्ष राज्यों में शामिल है। हमने पिछली बार भी अपना तय आंकड़ा पूरा किया था। उम्मीद है कि हम इस बार भी सफल होंगे।” उन्होंने बताया कि प्रदेश में वर्तमान में एफएमडी टीकाकरण का आठवां राउंड चल रहा है और यह प्रक्रिया हर छह माह में की जाती है, ताकि पशुधन में रोग प्रतिरोधक क्षमता बनी रहे और संक्रमण के प्रसार को प्रभावी ढंग से रोका जा सके।
डॉ. परते के अनुसार, “मध्य प्रदेश के सभी 55 जिलों में एफएमडी टीकाकरण अभियान चलाया जा रहा है। गाय-बैल और भैंस के साथ भेड़, बकरी और सूअरों को भी निर्धारित व्यवस्था के अनुसार मुफ्त टीका दिया जा रहा है। यह अभियान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि एफएमडी अत्यंत संक्रामक रोग है और इसका सीधा असर पशु के स्वास्थ्य, उत्पादकता और पशुपालक की आय पर पड़ सकता है।” उन्होंने बताया कि टीकाकरण के साथ बीमारी की स्थिति में तत्काल उपचार उपलब्ध कराने के लिए मोबाइल पशु चिकित्सा इकाइयां भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। मध्य प्रदेश में 1962 टोल-फ्री नंबर के माध्यम से पशुपालकों को घर या फार्म तक पशु चिकित्सा सेवा उपलब्ध कराने की व्यवस्था है।
एफएमडी फ्री जोन से डेयरी उद्योग को नई उड़ान
डॉ. उमा परते का कहना है कि “एफएमडी फ्री जोन घोषित होने के बाद मध्य प्रदेश के डेयरी उद्योग में क्रांतिकारी परिवर्तन देखने को मिलेंगे। रोगों का प्रभाव कम होने से पशुओं की उत्पादकता बनाए रखने, दूध उत्पादन को स्थिर करने और पशुपालकों के आर्थिक नुकसान को घटाने में मदद मिलेगी।”
उनके अनुसार, “मध्य प्रदेश में चल रहा अभियान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां पशुपालन कृषि का सहायक क्षेत्र न होकर लाखों ग्रामीण परिवारों की आय और आजीविका का आधार है। हर छह माह होने वाला टीकाकरण, ब्रूसेलोसिस नियंत्रण, डिजिटल ‘पशु आधार’, भारत पशुधन पोर्टल और 1962 की घर-द्वार पशु चिकित्सा सेवा मिलकर पशुधन स्वास्थ्य की ऐसी व्यवस्था तैयार कर रहे हैं, जिसका सीधा संबंध ग्रामीण समृद्धि से है।यदि इसी गति से टीकाकरण और रोग निगरानी जारी रहती है, तो मध्य प्रदेश राष्ट्रीय एफएमडी उन्मूलन के लक्ष्य में निर्णायक भूमिका निभा सकता है।”
डॉ. उमा परते का कहना है कि हमें स्वस्थ पशुधन तैयार करना है जो प्रदेश की डेयरी अर्थव्यवस्था को नई ऊंचाई दे सके। यही प्रयास आने वाले वर्षों में मध्य प्रदेश को रोग-मुक्त पशुधन और मजबूत डेयरी अर्थव्यवस्था की दिशा में देश के अग्रणी राज्यों में स्थापित करेगा।
‘पशु आधार’ से डिजिटल निगरानी
इसके साथ ही संचालनालय पशुपालन एवं डेयरी विभाग की उपसंचालक डॉ. उमा परते का कहना रहा, “इस अभियान की एक महत्वपूर्ण विशेषता पशुधन की डिजिटल पहचान है। लक्षित पशुओं के कान में 12 अंकों का विशिष्ट ईयर-टैग लगाया जा रहा है और संबंधित जानकारी भारत पशुधन पोर्टल पर दर्ज की जा रही है। इससे पशु की पहचान, टीकाकरण और स्वास्थ्य संबंधी जानकारी को डिजिटल रूप से ट्रैक करना संभव हो रहा है।”
उल्लेखनीय है, पहले मध्य प्रदेश को पारंपरिक रूप से ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहे जाने वाले दुधारू पशुओं को खुरपका-मुंहपका रोग (एफएमडी) और ब्रुसेलोसिस जैसी घातक महामारियों से प्रतिवर्ष करोड़ों रुपये का नुकसान उठाना पड़ता था। एफएमडी के कारण दूध उत्पादन में अचानक 80 प्रतिशत तक की गिरावट आ जाती थी, जिससे डेयरी व्यवसाय बुरी तरह प्रभावित होता।
दूसरी ओर, ब्रुसेलोसिस के कारण मादा पशुओं में पहली गर्भावस्था के दौरान गर्भपात हो जाता था, जो पशुपालक के लिए एक बड़ा वित्तीय झटका होता। इस विनाशकारी आर्थिक और रोग चक्र को तोड़ने के लिए मध्य प्रदेश पशुपालन विभाग ने एक ऐसा अभेद्य त्रि-स्तरीय सुरक्षा कवच तैयार किया है, जिसने राज्य में पशु मृत्यु दर और बीमारियों की दर में अच्छी गिरावट दर्ज की है। राज्य 'भारतीय पशुधन के लिए रोग मुक्त भविष्य' के सपने को हकीकत में बदल रहा है।
अब यदि क्रियान्वयन की यही गति जारी रही, तो मप्र वर्ष 2030 तक एफएमडी और ब्रुसेलोसिस के पूर्ण उन्मूलन के राष्ट्रीय लक्ष्य को समय से पहले हासिल कर लेगा, इसके साथ ही वह देश के संपूर्ण डेयरी और कृषि क्षेत्र में आत्मनिर्भरता का एक ऐसा अनुपम मॉडल प्रस्तुत करेगा जिसकी गूंज पूरे देश में सुनाई देगी। फिलहाल देश का हृदय स्थल राज्य इस विजन को जमीन पर उतारने में देश का अग्रणी राज्य बनकर उभरा है, जिसने अपनी विशाल ग्रामीण आबादी के आर्थिक सशक्तिकरण की नई राह खोली है।
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी