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साक्षात्कार : स्वामी गोविंद देव गिरी जी महाराज- ‘राम मंदिर भारतीय जीवन-दृष्टि का वैश्विक केंद्र बने, यही हमारा संकल्प है’

 




- डॉ. मयंक चतुर्वेदी

स्वामी गोविंद देव गिरी जी महाराज की आध्यात्मिक दृष्टि, राम मंदिर आंदोलन का अनुभव, ट्रस्ट की नई प्रशासनिक जिम्मेदारी, वित्तीय पारदर्शिता, सीईओ के साथ समन्वय, राम मंदिर की भविष्य की भूमिका और राष्ट्र-निर्माण जैसे विषय यहां इस साक्षात्कार के माध्यम से आप सभी के सामने प्रस्तुत हैं ।

प्रश्न. श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव के रूप में आपकी नई जिम्मेदारी को आप किस रूप में देखते हैं?

उत्तर: यह मेरे लिए पद या अधिकार का विषय नहीं, हमेशा की तरह ही सेवा का अवसर है। श्रीराम जन्मभूमि का विषय करोड़ों लोगों की आस्था से जुड़ा हुआ है। राम मंदिर का निर्माण एक ऐतिहासिक चरण था, किंतु मंदिर की व्यवस्था, उसकी गरिमा, आने वाले श्रद्धालुओं की सुविधाएं और उससे जुड़ी व्यापक गतिविधियों को सुव्यवस्थित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। मैं इसे प्रभु श्रीराम की सेवा और राष्ट्रसेवा के रूप में देखता हूं।

प्रश्न. आप पहले ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाल रहे थे। अब महासचिव के रूप में आपकी भूमिका किस तरह बदलेगी?

उत्तर: कोषाध्यक्ष के रूप में मुख्य रूप से वित्तीय अनुशासन, संसाधनों और आर्थिक व्यवस्थाओं से संबंधित जिम्मेदारियां थीं। महासचिव के रूप में कार्यक्षेत्र अधिक व्यापक है। ट्रस्ट के निर्णयों का क्रियान्वयन, विभिन्न समितियों और व्यवस्थाओं के बीच समन्वय, प्रशासनिक कार्यों की निगरानी तथा मंदिर से जुड़ी गतिविधियों को गति देना इसमें शामिल होगा। प्रयास रहेगा कि प्रत्येक व्यवस्था में स्पष्टता, अनुशासन और उत्तरदायित्व दिखाई दे।

प्रश्न. ट्रस्ट ने पहली बार एक पेशेवर प्रशासनिक व्यवस्था को मजबूत करते हुए पूर्व एयर मार्शल जितेंद्र मिश्रा को सीईओ बनाया है। आप इसे किस दृष्टि से देखते हैं?

उत्तर: आज के समय में इतने बड़े धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्र का संचालन अत्यंत व्यापक है। यहां श्रद्धालुओं की संख्या, सुरक्षा, तकनीकी व्यवस्था, वित्तीय प्रबंधन, सुविधाएं और अनेक प्रशासनिक आयाम हैं, इसलिए आध्यात्मिक दृष्टि और आधुनिक प्रशासनिक दक्षता का समन्वय आवश्यक है। मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) की नियुक्ति इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। हम सभी अपनी-अपनी जिम्मेदारियों के माध्यम से एक ही उद्देश्य की पूर्ति करेंगे।

प्रश्न. क्या धार्मिक संस्था में आधुनिक प्रबंधन और पेशेवर प्रशासन की आवश्यकता है?

उत्तर: निश्चित रूप से है। भारतीय परंपरा में धर्म और व्यवस्था कभी एक-दूसरे के विरोधी नहीं रहे। रामराज्य की कल्पना में भी सुशासन, अनुशासन, लोककल्याण और उत्तरदायित्व प्रमुख तत्व हैं। आधुनिक तकनीक और प्रबंधन के साधनों का उपयोग यदि मंदिर की सेवा, श्रद्धालुओं की सुविधा और पारदर्शिता के लिए किया जाए तो यह हमारी परंपरा के अनुरूप ही है।

प्रश्न. जुलाई 2026 में चढ़ावे की चोरी के विवाद के बाद ट्रस्ट की वित्तीय और प्रशासनिक व्यवस्था पर प्रश्न उठे। आप इस पूरे प्रकरण को कैसे देखते हैं?

उत्तर: जहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं और बड़ी मात्रा में दान तथा चढ़ावा आता है, वहां व्यवस्था में अत्यंत कठोर अनुशासन और पारदर्शिता आवश्यक है। यदि कहीं कमी सामने आती है तो उसे सुधारना चाहिए। किसी व्यक्ति की नीयत पर बिना तथ्य के प्रश्न उठाना उचित नहीं है, परन्तु व्यवस्था की कमियों को दूर करना हमारा ही दायित्व है। हमारा लक्ष्य ऐसी प्रणाली बनाना होना चाहिए जिसमें प्रत्येक प्रक्रिया स्पष्ट, नियंत्रित और उत्तरदायी हो।

प्रश्न. क्या नई प्रशासनिक व्यवस्था में वित्तीय पारदर्शिता को और मजबूत किया जाएगा?

उत्तर: पारदर्शिता किसी भी सार्वजनिक धार्मिक संस्था के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र से करोड़ों लोगों की भावनाएं जुड़ी हैं, इसलिए धन का उपयोग उचित उद्देश्य के लिए हो, प्रत्येक प्रक्रिया व्यवस्थित हो और संस्थागत स्तर पर उत्तरदायित्व बना रहे, यह हमारी प्राथमिकता होगी।

प्रश्न. आपके जीवन में धर्मग्रंथों का अध्ययन और प्रवचन बहुत पहले शुरू हो गया था। 17 वर्ष की आयु में पहली कथा करने से लेकर आज राम मंदिर ट्रस्ट की जिम्मेदारी तक की यात्रा को आप कैसे देखते हैं?

उत्तर: जब मैंने 17 वर्ष की आयु में पहली बार भगवद्गीता और श्रीमद्भागवत पर बोलना शुरू किया था, तब कल्पना भी नहीं की थी कि जीवन मुझे इस तरह सक प्रभु श्रीराम की सेवा करने का अवसर भी देगा। मेरे लिए यह यात्रा व्यक्तिगत उपलब्धि न होकर यह भारतीय ज्ञान परंपरा की शक्ति और संतों के आशीर्वाद की यात्रा है। मैंने वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत और गीता को जितना समझने का प्रयास किया, उतना ही यह अनुभव हुआ कि भारतीय संस्कृति का मूल संदेश समाज और मानवता के कल्याण से जुड़ा है।

प्रश्न. आपने वेदों के अध्ययन और प्रचार के लिए महर्षि वेदव्यास प्रतिष्ठान की स्थापना भी की। आज नई पीढ़ी के लिए वेद और भारतीय दर्शन की क्या प्रासंगिकता है?

उत्तर: वेद हमारे लिए सिर्फ प्राचीन (आदि, अनादि) ग्रंथ नहीं हैं, वास्तव में उनमें जीवन, प्रकृति, समाज और चेतना को देखने की एक व्यापक दृष्टि है। वर्तमान पीढ़ी आधुनिक विज्ञान और तकनीक के साथ आगे बढ़ रही है। उसे अपनी जड़ों से जोड़ना भी आवश्यक है। वेद, उपनिषद और गीता मनुष्य को अपने जीवन के उद्देश्य, कर्तव्य और आत्मानुशासन को समझने की दृष्टि देते हैं, अत: इनका अध्ययन आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना कि अतीत में रहता रहा है ।

प्रश्न. राम मंदिर आंदोलन से लेकर मंदिर निर्माण तक आपने लंबी यात्रा देखी है। आज जब भव्य मंदिर सामने है, उस यात्रा को किस रूप में याद करते हैं?

उत्तर: यह यात्रा अनेक पीढ़ियों के संकल्प, संघर्ष, साधना और प्रतीक्षा की यात्रा रही है। राम मंदिर का निर्माण उन असंख्य लोगों की भावनाओं का परिणाम है जिन्होंने अपने जीवन में इसे एक संकल्प के रूप में देखा, इसलिए मंदिर की भव्यता से अधिक महत्वपूर्ण उसके पीछे की भावना है। हमें यह स्मरण रखना होगा कि राम का मंदिर बना है तो राम के आदर्श भी हमारे जीवन में स्थापित होने चाहिए।

प्रश्न. 22 जनवरी 2024 को रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आपके हाथों से प्रसाद ग्रहण कर अपना 11 दिन का उपवास समाप्त किया था। उस क्षण को आप कैसे याद करते हैं?

उत्तर: वह अत्यंत भावपूर्ण और ऐतिहासिक क्षण था। प्रधानमंत्रीजी ने प्राण प्रतिष्ठा से पहले जिस प्रकार 11 दिन का व्रत और अनुशासन रखा, वह इस आयोजन के प्रति उनकी श्रद्धा को दर्शाता है। जब उन्होंने प्रसाद ग्रहण कर उपवास समाप्त किया, तब मेरे मन में यही भाव था कि यह किसी एक व्यक्ति का क्षण नहीं, करोड़ों रामभक्तों की आस्था का क्षण है।

प्रश्न. क्या आपको लगता है कि राम मंदिर का प्रभाव अयोध्या से आगे भारत के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन पर भी पड़ेगा?

उत्तर: वास्तव में कहें तो आपका यह प्रश्न ही अनुचित है, क्योंकि सदियों से भारत वर्ष में ही नहीं विश्व के कई देशों में, वस्तुत: कहना चाहिए किसी न किसी रूप में संपूर्ण ब्रह्माण्ड में प्रभू श्रीराम का प्रभाव अयोध्या की सीमाओं को पार कर पहले से ही विद्यमान है। श्रीराम भारतीय समाज के नैतिक और सांस्कृतिक जीवन के आदर्श हैं। राम मंदिर एक ऐसा केंद्र बनता जा रहा है जहां से सेवा, संस्कार, संस्कृति, शिक्षा और समाज के प्रति उत्तरदायित्व की भावना को सतत ऊर्जा मिलती रहे। राम के आदर्श हमारे आचरण में दिखाई देंगे, यही तो संत समाज का प्रयास रहता है।

प्रश्न. अयोध्या में प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। आने वाले समय में सबसे बड़ी प्रशासनिक चुनौती क्या होगी?

उत्तर: श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या निश्चित तौर पर अपने साथ अनेक दायित्व बोध (जिम्मेदारियां) लेकर आती है। दर्शन व्यवस्था, सुरक्षा, स्वच्छता, आवागमन, आवास, प्रसाद, चिकित्सा और अन्य सुविधाओं को लगातार श्रेष्ठतम् करना होगा। साथ ही मंदिर की आध्यात्मिक गरिमा और अयोध्या की सांस्कृतिक पहचान को भी अक्षुण्ण एवं सुरक्षित बनाए रखना भी एक कार्य है। हमारा प्रयास ऐसी व्यवस्था बनाने का है जिसमें श्रद्धालु सुविधा के साथ-साथ आध्यात्मिक अनुभव भी प्राप्त करता रहे।

प्रश्न. क्या राम मंदिर को विश्व के प्रमुख आध्यात्मिक और सांस्कृतिक केंद्र के रूप में विकसित करने की कोई व्यापक दृष्टि है?

उत्तर: जैसा कि मैंने कहा प्रभू श्रीराम भारत की सीमाओं तक सीमित नहीं हैं, वे विष्णु हैं, विश्व के कण’कण में व्याप्त हैं। फिर दुनिया के अनेक देशों में रामकथा और रामायण की परंपरा रही है। अयोध्या को ऐसा केंद्र बनाना चाहिए, जहां विश्व भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि को समझ सके। इसके लिए मंदिर के साथ ज्ञान, शोध, संस्कृति, भारतीय भाषाओं और रामायण की वैश्विक परंपरा को भी सामने लाने की आवश्यकता है।

प्रश्न. आपके अनुसार रामराज्य का आधुनिक अर्थ क्या है?

उत्तर: रामराज्य का अर्थ किसी विशेष राजनीतिक व्यवस्था तक सीमित करना उचित नहीं होगा। रामराज्य का मूल भाव है कि शासन में न्याय हो, समाज में विश्वास हो, व्यक्ति में कर्तव्यबोध हो और सबसे कमजोर व्यक्ति के कल्याण की चिंता हो। राम स्वयं सत्ता के केंद्र में रहते हुए भी लोककल्याण को सर्वोच्च मानते हैं। संत तुलसीदास के शब्दों में कहें तो परहित सरिस धर्म नहिं भाई, पर पीड़ा सम नहीं अधमाई आज यदि हम रामराज्य की बात करते हैं तो हमें इन्हीं मूल्यों को अपने सार्वजनिक और व्यक्तिगत जीवन में उतारना होगा। जहां कि दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा॥सब नर करहिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती, दिखाई दे।

हमें ऐसा समाज चाहिए, जहां चारिउ चरन धर्म जग माहीं। पूरि रहा सपनेहुँ अघ नाहीं॥राम भगति रत नर अरु नारी। सकल परम गति के अधिकारी॥ अर्थात् धर्म अपने चारों चरणों (सत्य, शौच, दया और दान) से जगत् में परिपूर्ण हो रहा है, स्वप्न में भी कहीं पाप नहीं है। पुरुष और स्त्री सभी रामभक्ति के परायण हैं और सभी परम गति (मोक्ष) के अधिकारी हों। जैसा कि वर्णन श्रीराम के राज में आता है, अल्पमृत्यु नहिं कवनिउ पीरा। सब सुंदर सब बिरुज सरीरा॥ नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना। नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना। सब निर्दंभ धर्मरत पुनी। नर अरु नारि चतुर सब गुनी॥ सब गुनग्य पंडित सब ग्यानी। सब कृतग्य नहिं कपट सयानी।

यानी कि छोटी अवस्था में मृत्यु नहीं होती, न किसी को कोई पीड़ा होती है। सभी के शरीर सुंदर और निरोग हैं। न कोई दरिद्र है, न दुःखी है और न दीन ही है। न कोई मूर्ख है और न शुभ लक्षणों से हीन ही है। सभी दम्भरहित हैं, धर्मपरायण हैं और पुण्यात्मा हैं। पुरुष और स्त्री सभी चतुर और गुणवान् हैं। सभी गुणों का आदर करने वाले और पण्डित हैं तथा सभी ज्ञानी हैं। सभी कृतज्ञ (दूसरे के किए हुए उपकार को मानने वाले) हैं, कपट-चतुराई (धूर्तता) किसी में नहीं है।

वस्तुत: आधुनिक अर्थ में भी एवं भविष्य में भी जो समय अपने काल में आधुनिक ही होगा, उस समय में भी रामराज्य का अर्थ यानी एक ऐसे समाज की व्यवस्था ही होगा, जैसा कि वर्णन संत तुलसीदास कृत रामचरित मानस या बाल्मीकि रामायाण में हमें देखने को मिलता है।

प्रश्न. आपने संन्यास का मार्ग चुना। एक संत के लिए इतनी बड़ी प्रशासनिक जिम्मेदारी कितनी चुनौतीपूर्ण है?

उत्तर: संन्यास का अर्थ संसार से पलायन नहीं है। भारतीय परंपरा में संन्यास का अर्थ व्यापक समाज के प्रति समर्पण भी है। जब कोई जिम्मेदारी धर्म और समाज की सेवा के लिए सामने आती है तो उससे विमुख होना संन्यास की भावना नहीं है। चुनौती है, किंतु चुनौती से अधिक यह सेवा का अवसर है। इस संदर्भ में आप श्रेष्ठतम् उदाहरणों में आद्यशंकराचार्य जी के जीवन का अध्ययन भी कर सकते हैं।

प्रश्न. आज के युवाओं के लिए आपका सबसे बड़ा संदेश क्या है?

उत्तर: युवा अपनी आधुनिक शिक्षा, विज्ञान और तकनीक में आगे बढ़ें, परन्तु अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहें। गीता हमें कर्म, अनुशासन और आत्मविश्वास का संदेश देती है। युवा यदि अपने जीवन में ज्ञान, चरित्र, परिश्रम और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व को स्थान देंगे तो भारत की शक्ति कई गुना बढ़ेगी और फिर भारत यानी ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’, भारत यानी ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’, भारत यानी शांति, सह-अस्तित्व और सद्भाव, भारत यानी ‘अहिंसा परमो धर्मः’, भारत यानी करुणा में शक्ति और शक्ति में संयम, भारत यानी ज्ञान, विज्ञान और मानव कल्याण, भारत यानी प्रकृति के साथ संतुलित जीवन, भारत यानी अनेकता में एकता, भारत यानी संस्कृतियों का सम्मान और विचारों की स्वतंत्रता, भारत यानी ‘चरैवेति-चरैवेति’- निरंतर आगे बढ़ते रहने का संकल्प, भारत यानी अपनी जड़ों से जुड़कर आधुनिकता की ओर बढ़ता हुआ राष्ट्र, भारत यानी ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ और भारत यानी पूरी मानवता को अपना परिवार मानने वाली सनातन चेतना है।

प्रश्न. राम मंदिर के निर्माण के बाद अब आपकी दृष्टि में अगला बड़ा लक्ष्य क्या है?

उत्तर: मंदिर का निर्माण एक महान उपलब्धि है, किंतु यात्रा यहीं समाप्त नहीं होती। मंदिर एक जीवंत आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक केंद्र है। श्रद्धालुओं के लिए श्रेष्ठ व्यवस्था, भारतीय ज्ञान परंपरा का संरक्षण, सेवा गतिविधियों का विस्तार और राम के आदर्शों को समाज के जीवन से जोड़ते हुए आगे की बड़ी जिम्मेदारियां वहन करते रहना ही तो निरंतरता है। जहां तक आप लक्ष्य की बात कर रहे हैं, प्रभू हमें जहां तक लेकर आए हैं, आगे भी उन्हें जहां ले जाना है, वहां लेकर जाएंगे ही, हम तो प्रभू के दास हैं, जो इस देह से पूर्ति करवाना है, वह प्रभू करवाते रहें।

प्रश्न. अंत में, महासचिव के रूप में आपकी प्राथमिकता क्या होगी?

उत्तर: मेरी प्राथमिकता स्पष्ट है: राम मंदिर की गरिमा, ट्रस्ट की व्यवस्था में अनुशासन और पारदर्शिता, श्रद्धालुओं की सुविधा तथा श्रीराम के आदर्शों के अनुरूप सेवा। राम मंदिर करोड़ों लोगों के विश्वास का प्रतीक है। इस विश्वास की रक्षा करना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। मंदिर भव्य बना है, अब उसके अनुरूप व्यवस्था और सेवा की उत्कृष्टता स्थापित करना हमारा अगला लक्ष्य होना चाहिए। हमारा प्रयास रहेगा कि अयोध्या आने वाला प्रत्येक व्यक्ति अपने साथ सिर्फ दर्शन की स्मृति लेकर न लौटे, वह प्रभू श्रीराम के जीवन-मूल्यों से प्रेरणा लेकर यहां से वापिस जाए।

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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी