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मिथिला के ऐतिहासिक बलिराजगढ़ में फिर शुरू होगा एएसआई उत्खनन

 


-यह स्थल एएसआई द्वारा राष्ट्रीय महत्व के स्थल के रूप में अधिसूचित किया गया है-इस स्थल पर अब तक चार बार खुदाई का काम किया जा चुका है

पटना, 28 फरवरी (हि.स.)। मिथिला के ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण बलिराजगढ़ में एक बार फिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा उत्खनन कार्य शुरू किए जाने की तैयारी पूरी हो गई है। इस उत्खनन से न केवल मिथिला बल्कि बिहार के प्राचीन इतिहास और सभ्यता के अध्ययन को नया आयाम मिलने की संभावना जताई जा रही है।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पटना सर्किल के अधीक्षण पुरातत्वविद डॉ. हरिओम शरण को इस संबंध में आधिकारिक पत्र सौंपा गया है। एएसआई के महानिदेशक द्वारा उत्खनन की अनुमति प्रदान कर दी गई है और पूरा कार्य पटना सर्किल के निर्देशन में संचालित किया जाएगा।

वर्ष 1884 में हुई थी ऐतिहासिक खोज

इस महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल की खोज वर्ष 1884 में आयरिश मूल के विद्वान एवं तत्कालीन दरभंगा के एसडीओ जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन ने की थी। उन्होंने उस समय ही कहा था कि यदि इस स्थल का पूर्ण उत्खनन किया जाए तो विश्व इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ सकता है। वर्ष 1938 में एएसआई ने इसे राष्ट्रीय महत्व का संरक्षित स्थल घोषित किया। अब तक यहां चार चरणों में उत्खनन कार्य किया जा चुका है, लेकिन हर बार जलभराव बड़ी बाधा बनता रहा।

कई बार रुका उत्खनन कार्य

वर्ष 1962-63 में एएसआई द्वारा शुरू किए गए उत्खनन को जमीन से पानी निकल आने के कारण रोकना पड़ा। बाद में तत्कालीन रेल मंत्री ललित नारायण मिश्रा के प्रयास से बिहार सरकार के पुरातत्व एवं संग्रहालय निदेशालय द्वारा 1972-73 और 1974-75 में दोबारा खुदाई कराई गई, लेकिन उस समय भी जलभराव के कारण कार्य अधूरा रह गया।

पूर्व उत्खनन में मिले महत्वपूर्ण अवशेष

वर्ष 2013-14 में दो चरणों में हुए उत्खनन के दौरान परकोटा, जली ईंटों से निर्मित संरचनाएं, आवासीय भवनों के अवशेष, टेराकोटा सामग्री, मानव एवं पशु मूर्तियां तथा अर्ध-मूल्यवान पत्थरों के अवशेष प्राप्त हुए थे। लगभग 122.3 एकड़ क्षेत्र में फैले इस स्थल को असुर राजा बलि की राजधानी माना जाता है, जबकि कुछ ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार इसे राजा जनक की राजधानी से भी जोड़ा जाता है।

इतिहासकार मनोज कुमार झा के अनुसार, यह वही स्थल माना जाता है जहां जनक वंश के अंतिम शासक कराल के विरुद्ध जनआंदोलन हुआ था, जिसके बाद वैशाली में गणतांत्रिक शासन व्यवस्था के उदय का मार्ग प्रशस्त हुआ।

विकसित नगर सभ्यता के संकेत

पुरातत्वविद डॉ. शिव कुमार मिश्रा के अनुसार, पूर्व उत्खननों में लगभग 700 से 200 ईसा पूर्व की उत्तरी काले पॉलिश वाले बर्तनों (एनबीपी संस्कृति) के प्रमाण मिले हैं, जो किसी विकसित शहरी सभ्यता के अस्तित्व की ओर संकेत करते हैं। उन्होंने इस स्थल के व्यापक और वैज्ञानिक उत्खनन की आवश्यकता पर बल दिया।

संग्रहालय निर्माण की भी उठी मांग

विशेषज्ञों का मानना है कि यहां से प्राप्त पुरावशेषों के संरक्षण के लिए संग्रहालय की स्थापना आवश्यक है। उत्खनन से मिथिला की प्राचीन सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और आर्थिक संरचना से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य सामने आ सकते हैं। जानकारों का कहना है कि भविष्य में यह स्थल नालंदा विश्वविद्यालय अवशेष, विक्रमशिला विश्वविद्यालय अवशेष और वैशाली पुरातात्विक स्थल की तरह अंतरराष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र पर स्थापित हो सकता है, जिससे स्थानीय स्तर पर पर्यटन और रोजगार के नए अवसर भी सृजित होंगे।

उत्खनन कार्य शुरू होने से मिथिला के दबे हुए इतिहास को वैश्विक पहचान मिलने की उम्मीद भी जताई जा रही है।------------------

हिन्दुस्थान समाचार / गोविंद चौधरी