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अग्निवेग से बढ़ी भारतीय सेना की मारक शक्ति, स्वदेशी रक्षा क्रांति के नए युग में भारत

 




- डॉ. मयंक चतुर्वेदी

आज युद्ध का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। कभी युद्धक्षेत्र में सैनिकों की संख्या, टैंकों की ताकत और तोपों की मारक क्षमता विजय का निर्धारण करती थी, लेकिन अब तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), स्वायत्त हथियार प्रणालियां, साइबर युद्ध और ड्रोन आधुनिक सैन्य शक्ति के प्रमुख आधार बन चुके हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया के संघर्षों तथा हाल के विभिन्न सैन्य अभियानों ने यह सिद्ध कर दिया है कि भविष्य के युद्धों में ड्रोन निर्णायक भूमिका निभाने वाले हैं।

इसी बदलते सैन्य परिदृश्य में भारतीय सेना को मिले 106 अत्याधुनिक ‘अग्निवेग’ कामिकेज ड्रोन उसकी मारक क्षमता को कई गुना बढ़ाने वाले हैं। यह उपलब्धि केवल एक नई सैन्य प्रणाली के सेना में शामिल होने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत के तेजी से आत्मनिर्भर बनते रक्षा क्षेत्र और स्वदेशी तकनीकी क्षमता का भी प्रमाण है।

अग्निवेग: भारतीय सैन्य शक्ति का नया आयाम

180 किलोमीटर की स्ट्राइक रेंज, 450 किलोमीटर प्रति घंटे की गति और जैमिंग तथा स्पूफिंग रोधी तकनीक से लैस अग्निवेग ड्रोन इस बात का संकेत हैं कि भारत अब केवल रक्षा उपकरणों का खरीदार नहीं, बल्कि निर्माता और निर्यातक राष्ट्र बनने की दिशा में भी तेजी से आगे बढ़ रहा है।

अग्निवेग जैसे कामिकेज ड्रोन यह भी दर्शाते हैं कि भारतीय सेना भविष्य के नेटवर्क-सेंट्रिक और एआई आधारित युद्ध के लिए स्वयं को तैयार कर रही है। आने वाले वर्षों में ड्रोन, रोबोटिक्स, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और स्वायत्त हथियार प्रणालियां युद्ध की दिशा तय करेंगी। भारत ने इस क्षेत्र में समय रहते निवेश प्रारंभ कर दिया है, जिसका परिणाम अब दिखाई देने लगा है।

पीसकीपर-अग्निवेग की प्रमुख विशेषताएं

भारतीय सेना को स्वदेशी रक्षा कंपनी एसएमपीपी द्वारा सौंपे गए 106 ‘पीसकीपर-अग्निवेग’ कामिकेज ड्रोन आधुनिक युद्ध प्रणाली में भारत की बढ़ती तकनीकी क्षमता का प्रतीक हैं। इनमें 100 ऑपरेशनल तथा 6 प्रशिक्षण ड्रोन शामिल हैं।

इन ड्रोनों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि लक्ष्य निर्धारित होने के बाद ये बिना किसी मानवीय हस्तक्षेप के अपने मिशन को पूरा कर सकते हैं। इन्हें इस प्रकार विकसित किया गया है कि ये शत्रु की वायु रक्षा प्रणालियों को चकमा देते हुए सीधे लक्ष्य पर प्रहार कर सकें।

450 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से उड़ने वाला अग्निवेग दुनिया के सबसे तेज पक्षी पेरेग्रिन फाल्कन से भी अधिक तेज है। इसकी 180 किलोमीटर की स्ट्राइक रेंज सेना को दुश्मन के भीतर गहरे तक स्थित सैन्य प्रतिष्ठानों पर सटीक हमले की क्षमता प्रदान करती है। यह क्षमता विशेष रूप से उन परिस्थितियों में अत्यंत उपयोगी है, जहां सैनिकों को सीधे खतरे में डाले बिना दुश्मन के रडार स्टेशन, कमांड सेंटर, गोला-बारूद भंडार, लॉजिस्टिक्स हब अथवा सैन्य अड्डों को नष्ट करना हो।

आधुनिक युद्ध में कामिकेज ड्रोन का महत्व

कामिकेज ड्रोन, जिन्हें ‘लोइटरिंग म्यूनिशन’ भी कहा जाता है, आधुनिक युद्ध की सबसे प्रभावी प्रणालियों में गिने जा रहे हैं। ये लक्ष्य क्षेत्र के ऊपर कुछ समय तक मंडरा सकते हैं और जैसे ही लक्ष्य की पुष्टि होती है, उस पर आत्मघाती हमला कर देते हैं।

युद्ध कौशल एवं रणनीतिक विशेषज्ञ तथा विशिष्ट सेवामेडल प्राप्त भारतीय सेना से सेवानिवृत्त ब्रिगेडियर आर. विनायक के अनुसार, “रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया के हालिया संघर्षों ने यह सिद्ध कर दिया है कि ड्रोन भविष्य के युद्धों का सबसे प्रभावी हथियार बनते जा रहे हैं। यूक्रेन युद्ध में दोनों पक्षों ने लाखों ड्रोन मिशनों का उपयोग किया है। कम लागत और अधिक प्रभाव के कारण ड्रोन अब पारंपरिक हथियार प्रणालियों के विकल्प के रूप में उभर रहे हैं। हमने ऑपरेशन सिंदूर में भी इसका सफल प्रयोग देखा है। पाकिस्तान भी तुर्की के प्राप्त ड्रोन का उपयोग हमारे खिलाफ कर रहा था, यह सामने आ ही चुका है। ऐसे में भारतीय सेना का कामिकेज ड्रोन बेड़े को मजबूत करना सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण कदम है।”

उन्होंने कहा, “आधुनिक युद्धों में ड्रोन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे अपेक्षाकृत कम लागत में अत्यधिक प्रभाव उत्पन्न करते हैं। जहां एक लड़ाकू विमान या मिसाइल मिशन पर करोड़ों रुपये खर्च हो सकते हैं, वहीं ड्रोन आधारित अभियान अपेक्षाकृत कम लागत में संचालित किए जा सकते हैं। साथ ही इन्हें बहुत छोटे होने की स्थिति, तेज गति के चलते रडार पर पकड़ना भी आसान नहीं होता है।”

आर. विनायक कहते हैं, “जितनी राशि में एक मिसाइल बनेगी, उतने में कई ड्रोन बनाए जा सकते हैं, ऐसे में यह ड्रोन तकनीक व्यवहार एवं सुरक्षा के मायनों में हमारे लिए बहुत उपयोगी हो गई है, जिसके महत्व को स्वभाविक है कि सेना बहुत अच्छे से समझती है, इसलिए ही सेना अब आधुनिक ड्रोन तकनीक का अपने यहां उपयोग कर रही है।”

भारतीय सेना की भविष्य की तैयारी

यहां सेवानिवृत्त ब्रिगेडियर आर. विनायक यह भी जोड़ते हैं, “इस तरह यदि देखें तो आज अग्निवेग जैसे प्लेटफॉर्म इस बात का संकेत हैं कि भारतीय सेना भविष्य के युद्धों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए स्वयं को रूपांतरित कर रही है। भारत की उत्तरी सीमाओं पर चीन तथा पश्चिमी सीमा पर पाकिस्तान जैसी चुनौतियों को देखते हुए ऐसी तकनीकों का महत्व और बढ़ जाता है। सीमा पार आतंकवादी ठिकानों, दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों और संवेदनशील सैन्य लक्ष्यों पर सटीक हमले करने की क्षमता भारतीय सेना को सामरिक बढ़त प्रदान करती है। साथ ही यह सैनिकों के जोखिम को भी कम करती है।”

सटीकता ही आधुनिक युद्ध की कुंजी

इस संबंध में भारतीय वायु सेना से सेवानिवृत्त, रक्षा विशेषज्ञ डॉ. राजेश शर्मा का कहना है कि अग्निवेग की एक बड़ी विशेषता इसका 5 मीटर से कम का सर्कुलर एरर प्रोबेबल है। इसका अर्थ है कि यह ड्रोन लगभग पूर्ण सटीकता के साथ अपने लक्ष्य को भेद सकता है। ऐसी सटीकता आधुनिक युद्ध में अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। इससे सैन्य अभियानों की प्रभावशीलता बढ़ती है तथा आसपास के नागरिक ढांचे और निर्दोष लोगों को होने वाली क्षति भी न्यूनतम रहती है। वर्तमान समय में अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानूनों के तहत युद्ध के दौरान नागरिक क्षति को कम करना भी एक महत्वपूर्ण आवश्यकता बन चुका है।

आत्मनिर्भर भारत अभियान को नई मजबूती

एसएमपीपी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी और निदेशक आशीष कंसल के अनुसार, अग्निवेग में 75 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी तकनीक का उपयोग किया गया है। यह उपलब्धि आत्मनिर्भर भारत अभियान की सफलता को दर्शाती है, जिसके अंतर्गत सरकार ने रक्षा क्षेत्र में घरेलू निर्माण को बढ़ावा देने के लिए अनेक नीतिगत सुधार किए हैं। उन्होंने कहा कि मात्र छह महीने के भीतर भारतीय सेना को इन ड्रोनों की आपूर्ति करना अपने आप में एक उल्लेखनीय उपलब्धि है। यह भारतीय रक्षा उद्योग की बढ़ती उत्पादन क्षमता और दक्षता को भी प्रदर्शित करता है।

फोर्स मल्टीप्लायर के रूप में उभरती तकनीक

आशीष कंसल का मानना है कि आधुनिक युद्ध का स्वरूप तेजी से बदल रहा है, जहां सटीकता, स्वायत्तता और लागत-प्रभावशीलता निर्णायक भूमिका निभा रही हैं। ऐसे अत्याधुनिक सिस्टम युद्धक्षेत्र में ‘फोर्स मल्टीप्लायर’ के रूप में उभर रहे हैं, जो सैनिकों की क्षमता और प्रभावशीलता को कई गुना बढ़ा देते हैं। आज युद्ध केवल सैनिकों के साहस पर नहीं, बल्कि सूचना, डेटा, संचार और तकनीकी श्रेष्ठता पर भी निर्भर करता है। यही कारण है कि दुनिया की प्रमुख सैन्य शक्तियां कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्वायत्त ड्रोन और रोबोटिक प्रणालियों में भारी निवेश कर रही हैं।

रक्षा उत्पादन में ऐतिहासिक वृद्धि

भारतीय सेना को मिले 106 अग्निवेग ड्रोन आत्मनिर्भर भारत की रक्षा क्रांति के प्रतीक हैं। यह उस नए भारत की तस्वीर प्रस्तुत करते हैं जो अपनी सुरक्षा आवश्यकताओं के लिए विदेशी हथियारों पर निर्भर रहने के बजाय स्वयं अत्याधुनिक तकनीक विकसित कर रहा है।

रक्षा मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2014 में भारत का रक्षा उत्पादन लगभग 46 हजार करोड़ रुपये था, जो अब बढ़कर 1.30 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो चुका है। सरकार ने वर्ष 2029 तक इसे 3 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है। जिसे देखकर कहना यही होगा कि यह वृद्धि भारत की तकनीकी क्षमता, औद्योगिक आधार और अनुसंधान क्षमता में हुए विस्तार का भी संकेत है।

निजी क्षेत्र की बढ़ती भूमिका

आज भारत का रक्षा उद्योग केवल सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों तक सीमित नहीं है। निजी क्षेत्र भी तेजी से नई तकनीक विकसित कर रहा है और राष्ट्रीय सुरक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है। भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड सेना के लिए अत्याधुनिक रडार, संचार प्रणाली और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध उपकरण विकसित कर रही है। भारत डायनेमिक्स लिमिटेड आकाश, अस्त्र और अन्य मिसाइल प्रणालियों के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। लार्सन एंड टुब्रो (एल एंड टी) नौसेना के युद्धपोतों और मिसाइल लॉन्चिंग सिस्टम के निर्माण में अग्रणी है।

इसी प्रकार टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स ड्रोन, एयरक्राफ्ट स्ट्रक्चर और रक्षा इलेक्ट्रॉनिक्स के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रही है। अदाणी डिफेंस एंड एयरोस्पेस ड्रोन, निगरानी प्रणालियों और गोला-बारूद निर्माण में निवेश कर रही है। इकोनॉमिक एक्सप्लोसिव्स लिमिटेड (सोलर ग्रुप) द्वारा विकसित नागास्त्र ड्रोन भी सेना के लिए महत्वपूर्ण सिद्ध हो रहे हैं। वहीं न्यूस्पेस रिसर्च एंड टेक्नोलॉजीज द्वारा विकसित स्वॉर्म ड्रोन तकनीक भारतीय सेना को एक साथ अनेक ड्रोन संचालित करने की क्षमता प्रदान कर रही है।

रक्षा क्षेत्र से रोजगार और निर्यात को बढ़ावा

भारतीय रक्षा क्षेत्र की यह प्रगति केवल सैन्य आवश्यकताओं तक सीमित नहीं है। इससे रोजगार, तकनीकी नवाचार, अनुसंधान और निर्यात के नए अवसर भी उत्पन्न हो रहे हैं। देश में रक्षा गलियारों, स्टार्टअप इकोसिस्टम और निजी निवेश के विस्तार से हजारों युवाओं को उच्च तकनीकी क्षेत्रों में रोजगार मिल रहा है। रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता विदेशी मुद्रा की बचत के साथ-साथ आर्थिक विकास को भी गति प्रदान कर रही है।

भारत के सामने एक समय ऐसा भी रहा है कि रक्षा जरूरतों के लिए विदेशी हथियारों पर निर्भर था, लेकिन पिछले 12 वर्षों में तस्वीर बदल गई है। 2013-14 में 686 करोड़ रुपये के रक्षा निर्यात ने वित्त वर्ष 2025-26 में नया रिकॉर्ड बनाया है। देश का वार्षिक रक्षा उत्पादन बढ़कर 1.78 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया, जो पिछले वित्त वर्ष 2024-25 के 1.54 लाख करोड़ रुपये के मुकाबले 15.6 प्रतिशत अधिक पहुंच गया है। हमारे स्वदेशी रक्षा उत्पाद ब्रह्मोस, आकाश और तेजस आज दुनिया में भारत की पहचान बन रहे हैं। आज भारतीय रक्षा उत्पाद 100 से अधिक देशों तक पहुंच रहे हैं। यह उपलब्धि भारत की बढ़ती वैश्विक विश्वसनीयता और तकनीकी क्षमता का प्रमाण है।

रक्षा क्रांति के नए दौर की शुरुआत

इसमें यदि अब हम अग्निवेग ड्रोन की इस डील को और इसके सेना को दिए जाने को देखें तो यह सिर्फ सैन्य प्लेटफॉर्म न होकर भारत की रक्षा आत्मनिर्भरता, तकनीकी नवाचार और सामरिक आत्मविश्वास का प्रतीक है। भारतीय सेना की बढ़ती मारक क्षमता, स्वदेशी उद्योगों की उभरती ताकत और रक्षा क्षेत्र में निरंतर बढ़ते नवाचार यह संकेत देते हैं कि भारत वैश्विक सैन्य शक्ति के रूप में अपनी स्थिति को और अधिक मजबूत करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।

निस्संदेह, आने वाले वर्षों में ड्रोन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और स्वायत्त युद्ध प्रणालियां सैन्य शक्ति की नई परिभाषा लिखेंगी। ऐसे समय में अग्निवेग जैसे स्वदेशी प्लेटफॉर्म यह विश्वास दिलाते हैं कि भारत भविष्य के युद्धों के लिए तैयार होने के साथ ही रक्षा तकनीक के क्षेत्र में विश्व के अग्रणी देशों की पंक्ति में भी अपना स्थान सुनिश्चित कर रहा है।

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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी