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आधी शताब्दी से फलाहार पर चल रहा था जीवन; नारायण नाम संकीर्तन के बीच एक कर्मयोगी का देह त्याग

 




उमेश चंद्र शर्मा

झाबुआ: मध्य प्रदेश, 09 मई (हि.स.)।

भगवान् श्री हरि नारायण के पावन नाम संकीर्तन के बीच देहत्याग करते हुए एक ऐसे कर्मयोगी, गौसेवक एवं आध्यात्म परायण सेवा निवृत्त शिक्षक ने अपनी लंबी कर्मयोगी साधना का अंतिम पड़ाव तय किया, जिन्होंने पिछले 55 वर्षों से अन्नाहार का पूरी तरह त्याग कर दिया था। अपने त्याग, संयम और आध्यात्मिक जीवन के बल पर वे अपने गृह ग्राम उंटवास सहित संपूर्ण क्षैत्र में विभिन्न समाजजनों द्वारा “गृहस्थ संत” की उपमा पा गए थे, और उन्हें सम्मान पूर्वक “वेणीरामजी माड़साब”के रुप में ही संबोधित किया जाता था। उनके निधन के बाद उनके प्रति अपने सर्वोच्च सम्मान को प्रदर्शित करते हुए जहां समूचे गांव के निवासी उन्हें श्रद्धांजलि समर्पित करने पहुंचे, वहीं विभिन्न राजनीतिक दलों के विधायक गण सहित अन्य जनप्रतिनिधि भी उनके निवास पर पहुंचे।

मध्य प्रदेश के उज्जैन जिले की बड़नगर तहसील के अंतर्गत आने वाले ग्राम उंटवास (जिसे राघवपुर भी कहा जाता है) के निवासी सेवा निवृत्त शिक्षक वेणी प्रसाद पटेल का समग्र जीवन अध्यात्म प्रेरित होते हुए गौसेवा एवं एक शिक्षक के रूप में कर्तव्य परायणता को समर्पित रहा, गृहस्थ संत वेणीराम माड़साब अपने गुरुदेव, नेष्टिक ब्रह्मचारी ब्रह्मलीन स्वामी श्री राघवानंदजी महाराज से अत्यंत प्रभावित थे और उनके आदर्शों को उन्होंने अपने जीवन में पूर्ण रूप से आत्मसात किया था, इसलिए उनके व्यक्तित्व में भक्ति और विनम्रता का अद्भुत समायोजन था, और अपने जीवन में संपूर्ण वैभव होते हुए भी वे परम अकिंचन भाव में ही स्थित रहा करते थे। इसीलिए ग्राम उंटवास सहित संपूर्ण क्षैत्र में विभिन्न समाजजनों द्वारा “गृहस्थ संत” की उपमा देते हुए उन्हें सम्मान पूर्वक “वेणीरामजी माड़साब”के रुप में संबोधित किया जाता था।

बड़नगर तहसील के ग्राम ऊंटवास (राघवपुर) में एक ब्राह्मण परिवार में जन्मे वेणी प्रसाद शर्मा पटेल ने प्रारंभिक शिक्षा पूर्ण कर खेती-किसानी का दायित्व संभाला, किंतु सांसारिक कार्य कभी भी उनके भजन, साधना और आध्यात्मिक जीवन में बाधक नहीं बन सके। उन्होंने शिक्षा को केवल आजीविका का साधन ही नहीं, बल्कि सेवा का माध्यम माना और एक शिक्षक के रूप में अपने कर्तव्यों का निर्वहन पूर्ण ईमानदारी, निष्ठा और समर्पण के साथ किया।

वेणीराम माड़साब का संपूर्ण जीवन ब्राह्मण धर्म की मर्यादाओं का अनुपालन करते हुए व्यतीत हुआ। उन्होंने कभी किसी से कुछ याचना नहीं की और सदैव तीनों समय संध्या-वंदन करते हुए एवं भजन साधन में रत रहकर अपने जीवन को संयमित एवं कठौर अनुशासन से आबद्ध कर लिया। उनकी द्रढ़ संकल्प शीलता अद्भुत संयम और तपस्या का इससे बड़ा उदाहरण क्या हो सकता है कि सन 1971 के आसपास ग्राम ऊंटवास राघवपुर में आयोजित एक यज्ञ के अवसर पर अपने आध्यात्मिक गुरु नेष्टिक ब्रह्मचारी ब्रह्मलीन स्वामी श्री राघवानंदजी महाराज की प्रेरणा से उन्होंने अपने शेष जीवन में अन्नाहार के त्याग का संकल्प लेकर फलाहार को अपनाया, और उस दिन से लेकर जीवन के अंतिम समय तक—लगभग 55 वर्षों से भी अधिक समय से उन्होंने अन्न का एक भी दाना ग्रहण नहीं किया और केवल फलाहार को ही अपने शेष जीवन का आधार बना लिया, किंतु इस त्याग को उन्होंने कभी भी वर्णन का विषय नहीं बनाया और अपने शिक्षक धर्म का बखूबी निर्वहन करते रहे।

दिवंगत शिक्षक वेणी प्रसाद ने एक तरफ जहां भगवान् श्री कृष्ण के गुणगान को समर्पित होकर अध्यात्म का मार्ग अपनाया, वहीं दूसरी तरफ गौसेवा के माध्यम से कर्मयोग की साधना को नया आयाम दिया और एक श्रेष्ठ शिक्षक का धर्म निभाते हुए अपने छात्रों को संस्कार युक्त शिक्षा प्रदान करते रहे। शिक्षक के रूप में अपने सेवाकाल में उन्होंने छात्रों को कर्तव्य निष्ठा, सेवा भावना, अनुशासित जीवन एवं शुचिता का पाठ पढ़ाया। यही नहीं बल्कि उन्होंने अपने सामाजिक दायित्व का निर्वाह करते हुए अपनी 5400 वर्ग फीट कीमती भूमि को नागदाह अग्निहोत्री ब्राह्मण समाज हेतु दान कर दी, जहां समाज द्वारा विभिन्न धार्मिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों को आकार दिया जा रहा है।

उन्होंने नेष्टिक ब्रह्मचारी ब्रह्मलीन संत स्वामी श्री राघवानंद जी महाराज का शिष्यत्व स्वीकार किया और आजीवन उनके बताए मार्ग का अनुसरण करते रहे। उनके व्यक्तित्व में भक्ति और विनम्रता का ऐसा संगम था कि संपूर्ण वैभव होते हुए भी वे परम अकिंचन भाव में ही स्थित रहा करते थे। इसी कारण गांव और समाज के सभी लोग उन्हें “गृहस्थ संत” के रूप में मानते और आदरपूर्वक “वेणी राम जी माड़साब” कहकर संबोधित करते थे।

अपने 95 वर्षीय लंबे जीवन काल को उन्होंने अपने त्याग और तपस्या से नया आयाम दिया। यही वजह रही कि उनके निधन के बाद ग्राम उंटवास सहित अन्य समीपस्थ गांवों के ग्रामीण जन ही नहीं बल्कि वर्तमान एवं पूर्व विधायक गण सहित विभिन्न राजनीतिक दलों के जनप्रतिनिधियों ने उनके निवास स्थान पहुंचकर उन्हें श्रद्धांजलि समर्पित करते हुए उनके समग्र जीवन को आदर्श एवं प्रेरणादायक बताया।

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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. उमेश चंद्र शर्मा