बिहार के भागलपुर में जीविका दीदी पारंपरिक व्यंजनों के साथ परोस रही 50 रुपये में भरपेट भोजन
भागलपुर, 09 मई (हि.स.)। गंगा के पावन तट बरारी घाट पर इन दिनों एक नई हलचल देखने को मिल रही है। यह हलचल किसी धार्मिक आयोजन की नहीं, बल्कि सेवा और स्वावलंबन की एक नई इबारत लिखने वाली 'जीविका' की दीदियों द्वारा संचालित रसोई की है।
बिहार की महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने और उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ने के उद्देश्य से शुरू किया गया 'जीविका' मिशन अब धरातल पर अपनी उपस्थिति मजबूती से दर्ज करा रहा है। इसी कड़ी में बरारी घाट पर श्रद्धालुओं, राहगीरों और स्थानीय लोगों के लिए बेहद किफायती दरों पर शुद्ध और स्वच्छ भोजन की व्यवस्था की गई है।
बरारी घाट पर अक्सर बड़ी संख्या में लोग गंगा स्नान और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों के लिए आते हैं। ऐसे में दूर-दराज से आने वाले लोगों के लिए सबसे बड़ी चुनौती उचित दर पर पौष्टिक भोजन प्राप्त करने की होती है। इस समस्या को समझते हुए जीविका दीदियों ने मिलकर यहाँ एक सार्वजनिक रसोई की शुरुआत की है।
इस रसोई की बागडोर 'गंगा जीविका स्वयं सहायता समूह' की सदस्य लक्ष्मी देवी और उनके साथियों के हाथों में है। लक्ष्मी देवी बताती हैं कि इस पहल का मुख्य उद्देश्य न केवल लोगों को कम दाम में भोजन उपलब्ध कराना है, बल्कि समूह की महिलाओं को रोजगार से जोड़कर उन्हें आत्मनिर्भर बनाना भी है।
इस रसोई की सबसे बड़ी खासियत यहाँ का मेनू और उसकी दरें हैं। आज के महंगाई के दौर में जहाँ सामान्य होटलों में एक थाली की कीमत सौ रुपये से ऊपर चली गई है, वहीं जीविका की यह रसोई मात्र 50 रुपये में भरपेट शुद्ध शाकाहारी भोजन उपलब्ध करा रही है। इस भोजन की थाली में चावल, दाल, सब्जी, पापड़ और सलाद शामिल है। यह भोजन पूरी तरह से घरेलू स्वाद और स्वच्छता के मानकों को ध्यान में रखकर तैयार किया जाता है, जो बाहर से आने वाले लोगों के लिए घर की कमी को पूरा करता है।
भोजन के अलावा, यहाँ पारंपरिक बिहार के पसंदीदा नाश्ते और व्यंजनों की भी लंबी फेहरिस्त है। बिहार की पहचान माना जाने वाला लिट्टी-चोखा यहाँ विशेष रूप से उपलब्ध है। मात्र 20 रुपये में दो पीस लिट्टी और चटनी के साथ लोग अपनी भूख मिटा सकते हैं। इसके साथ ही, स्थानीय लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय चूड़ा फ्राई और घुघनी की व्यवस्था भी यहाँ की गई है। 30 रुपये प्रति प्लेट की दर से मिलने वाला यह नाश्ता न केवल सस्ता है, बल्कि स्वास्थ्य के लिहाज से भी बेहतर विकल्प माना जाता है।
शाम के समय गंगा घाट की ठंडक के बीच गरमा-गरम पकौड़ों की चाहत रखने वालों के लिए भी यहाँ पुख्ता इंतजाम हैं। प्याज पकौड़ा की एक प्लेट, जिसमें पांच पीस होते हैं, उसकी कीमत महज 25 रुपये रखी गई है। चाय प्रेमियों के लिए 10 रुपये में एक कप ताजी चाय और सेहत का ध्यान रखने वालों के लिए 20 रुपये प्रति गिलास सत्तू का शरबत भी उपलब्ध है। सत्तू, जिसे बिहार का 'पावर ड्रिंक' कहा जाता है, गर्मियों के मौसम में राहगीरों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। इसके अलावा बिस्किट, भुजिया और पानी की बोतल जैसी छोटी जरूरतें एमआरपी पर ही उपलब्ध कराई जा रही हैं।
लक्ष्मी देवी के अनुसार, यह रसोई कल से ही शुरू हुई है और पहले ही दिन से लोगों का काफी अच्छा रिस्पॉन्स मिल रहा है। घाट पर आने वाले श्रद्धालु इस बात से खुश हैं कि उन्हें गंगा किनारे ही इतना सस्ता और साफ-सुथरा भोजन मिल जा रहा है। समूह की दीदियाँ सुबह से ही रसोई की तैयारियों में जुट जाती हैं। साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखा जाता है, ताकि भोजन की गुणवत्ता से कोई समझौता न हो जीविका के माध्यम से हो रहा यह बदलाव केवल भोजन परोसने तक सीमित नहीं है। यह उन महिलाओं के आत्मविश्वास का प्रतीक है, जो कभी अपने घर की चारदीवारी तक सीमित थीं। आज वे न केवल अपना व्यवसाय संभाल रही हैं, बल्कि शहर के महत्वपूर्ण स्थलों पर सार्वजनिक सेवाएं भी प्रदान कर रही हैं।
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हिन्दुस्थान समाचार / बिजय शंकर