कुदाल की चोट में दिखा राजधर्म : संदर्भ- डॉ. मोहन यादव
-डॉ. मयंक चतुर्वेदी
घर ईंट, पत्थर और दीवारों से बनता जरूर है, किंतु घर में बचपन की हंसी होती है, माता-पिता की स्मृतियां होती हैं, संघर्षों की कहानी होती है और जीवन के अनगिनत ऐसे क्षण होते हैं, जिन्हें मनुष्य उम्र भर अपने भीतर संजोकर रखता है, इसलिए अपने पैतृक घर की दीवार पर कुदाल चलाना किसी निर्माण को तोड़ना भर नहीं है। वस्तुत: यह अपनी स्मृतियों के एक हिस्से से गुजरना भी होता है। उज्जैन में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने जब सिंहस्थ-2028 के लिए सड़क चौड़ीकरण की जद में आए अपने पैतृक मकान के हिस्से पर स्वयं कुदाल चलाई तो दृश्य में विकास की आवश्यकता के साथ निजी भावनाओं का संघर्ष भी दिखाई दिया।
डॉ. यादव ने इसी घर में उनका बचपन बीता। इसी घर ने उनके राजनीतिक जीवन के अनेक पड़ाव देखे। यही कारण है कि प्रभावित हिस्सा हटाने से पहले उन्होंने पूजा की, घर के भीतर गए और पुरानी स्मृतियों को देखा। इसके बाद स्वयं कुदाल उठाई। यहां घटना का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यही है कि जिस निर्णय का असर मुख्यमंत्री की अपनी संपत्ति पर पड़ रहा था, उसके क्रियान्वयन की शुरुआत उन्होंने स्वयं की।
यहां उल्लेखित है कि इस वक्त सिंहस्थ के लिए उज्जैन में सड़कें चौड़ी की जा रही हैं। इस काम से 272 भवन प्रभावित हो रहे हैं। इन भवनों में मुख्यमंत्री का पैतृक मकान भी शामिल है। यानी जिस विकास के लिए दूसरे परिवारों से सहयोग अपेक्षित है, उसी प्रक्रिया का प्रभाव मुख्यमंत्री के परिवार पर भी पड़ा है। यहीं से यह प्रसंग प्रशासनिक कार्रवाई से निकलकर सार्वजनिक जीवन में पहुंच जाता है। प्रश्न उठता है, क्या जनप्रतिनिधि उन नियमों के सामने स्वयं को भी उसी तरह रखता है, जैसे सामान्य नागरिक को रखा जाता है?
डॉ. यादव ने अपने व्यवहार से इसका एक उदाहरण प्रस्तुत किया है। उन्होंने कहा भी कि नियम सभी के लिए समान होने चाहिए और जनकल्याण के विकास कार्यों में जनप्रतिनिधियों को स्वयं उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए। लोकतंत्र में ऐसे कथन का महत्व तभी बढ़ता है, जब उसके साथ आचरण भी खड़ा दिखाई दे। वैसे संत तुलसीदास ने राजधर्म की चर्चा करते हुए शासन को प्रजा के सुख से जोड़ा है। रामचरितमानस की पंक्तियां हैं-
बरषहिं जलद बिचारि बिचारी। कोपि न गरर्जहिं जलनिधि भारी॥
कृषि करहिं मानुष सब नाना। जेहि बिधि भूप धरइ निज ध्याना॥
इन पंक्तियों का मूल भाव यही है कि शासक का ध्यान यदि प्रजा के कल्याण पर हो तो लोकजीवन में व्यवस्था और सुख का मार्ग प्रशस्त होता है। यहां राजा का अर्थ आज के लोकतंत्र में मुख्यमंत्री या कोई शासक मात्र समेत हर जनप्रतिनिधि है जिसे जनता ने अपने हितों की जिम्मेदारी सौंपी है। वस्तु: तुलसी का राजधर्म सिर्फ शासन करने का अधिकार नहीं है। वह आचरण की जिम्मेदारी भी है, इसीलिए तुलसीदास कहते हैं-
मुखिआ मुखु सो चाहिऐ खान पान कहुँ एक। पालइ पोषइ सकल अँग तुलसी सहित बिबेक॥
मुखिया मुख के समान हो, जो स्वयं एक स्थान से ग्रहण करे और उसका लाभ पूरे शरीर तक पहुंचाए। इस चौपाई में शासन की एक ऐसी अवधारणा दिखाई देती है जिसमें सत्ता का केंद्र स्वयं के लिए नहीं, समूचे समाज के लिए काम करता है। आज लोकतंत्र में कर जनता देती है, संसाधन जनता के हैं और विकास का अंतिम उद्देश्य भी जनता का जीवन सुगम बनाना है, इसलिए किसी भी बड़े सार्वजनिक आयोजन के लिए सड़क, यातायात और आधारभूत सुविधाओं का विस्तार हो तो उसके केंद्र में नागरिक सुविधा ही होनी चाहिए।
सिंहस्थ-2028 इसी दृष्टि से उज्जैन के लिए बड़ा अवसर और बड़ी चुनौती दोनों है। देश-दुनिया से करोड़ों श्रद्धालुओं के आने की संभावना वाले इस आयोजन के लिए शहर की यातायात व्यवस्था और अधोसंरचना को तैयार करना आवश्यक है। इस प्रक्रिया में अनेक परिवारों की संपत्तियां प्रभावित हो रही हैं। ऐसे में मुख्यमंत्री का अपना मकान भी उसी प्रक्रिया से गुजरना एक प्रतीकात्मक संदेश अवश्य देता है कि विकास की प्रक्रिया में जनप्रतिनिधि स्वयं को अलग श्रेणी में रखने के बजाय उसी व्यवस्था का हिस्सा मानता है। चाहते तो मुख्यमंत्री के एक संकेत पर रास्ता बदला जा सकता था, चौड़ीकरण की जद से वह मौहल्ला या सड़क छोड़ी जा सकती थी, जिस पर डॉ. मोहन यादव एवं उनके परिवारजनों के अन्य मकान बने हुए हैं, किंतु उन्होंने ऐसा नहीं किया। वास्तव में यही लोकतांत्रिक नेतृत्व का वह पक्ष है, जिसे भाषणों से अधिक व्यवहार समझाता है।
अपने घर की दीवार पर कुदाल चलाते हुए डॉ. यादव भावुक हुए। होना भी स्वाभाविक था। राजनीति मनुष्य से उसकी संवेदनाएं नहीं छीनती। मुख्यमंत्री बनने के बाद भी घर, घर ही रहता है और बचपन बचपन ही रहता है। फर्क सिर्फ इतना है कि सार्वजनिक जीवन में आने के बाद निजी भावनाओं के ऊपर सार्वजनिक दायित्व का प्रश्न खड़ा हो जाता है। यहीं संत तुलसी का एक और बिंब प्रासंगिक हो उठता है-
नीर खीर बिबरन करइ हंस कहइ सब कोइ।
हंस का रूपक विवेक का प्रतीक है। शासन में भी विवेक का अर्थ यही है कि निजी हित और सार्वजनिक हित के बीच अंतर स्पष्ट रखा जाए। जहां सार्वजनिक आवश्यकता हो, वहां निर्णय व्यापक समाज को ध्यान में रखकर हो। उज्जैन में हुआ यह प्रसंग आज इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहां विकास और विस्थापन, भावना और दायित्व, निजी संपत्ति और सार्वजनिक सुविधा तीनों एक साथ दिखाई देते हैं। सड़क चौड़ी होगी तो यातायात सुगम होगा। सिंहस्थ के दौरान श्रद्धालुओं की आवाजाही को सुविधा मिलेगी। शहर की आधारभूत संरचना मजबूत होगी। पर इन सुविधाओं की राह में जिन परिवारों की संपत्तियां प्रभावित हो रही हैं, उनके लिए यह सहज प्रक्रिया नहीं है। स्वभाविक है डॉ. मोहन यादव के लिए भी यह सहज अवसर नहीं है!
राजनीति में अक्सर त्याग की बातें कही जाती हैं। सार्वजनिक जीवन में आदर्शों की चर्चा भी खूब होती है, पर आदर्श की असली परीक्षा तब होती है जब उसका असर स्वयं पर पड़े। अपने लिए अलग नियम और दूसरों के लिए अलग नियम रखने की प्रवृत्ति लोकतांत्रिक विश्वास को कमजोर करती है। इसके विपरीत, समान नियमों को स्वयं पर लागू करने का व्यवहार सार्वजनिक विश्वास को मजबूत करने वाला संदेश दे सकता है।उज्जैन की इस घटना को आज हमें इसी रूप में देखने की आवश्यकता है।
संत तुलसी की पंक्तियों में राजधर्म का अर्थ प्रजा के सुख से जुड़ा है। आधुनिक लोकतंत्र में उसका रूप बदल गया है, पर मूल प्रश्न आज भी वही है- सत्ता जनता के लिए कितनी उत्तरदायी है और जनप्रतिनिधि अपने आचरण से उस उत्तरदायित्व को कितना विश्वसनीय बनाता है, यह महत्व रखता है। उज्जैन में कुदाल मुख्यमंत्री के हाथ में थी, पर उसके पीछे सवाल बहुत बड़ा था। एक ओर वह घर था, जिसमें बचपन बीता, दूसरी ओर वह शहर था, जिसे सिंहस्थ के लिए तैयार होना है। एक ओर निजी स्मृतियां थीं, दूसरी ओर लाखों-करोड़ों श्रद्धालुओं की सुविधा का प्रश्न!
डॉ. मोहन यादव का अपने ही पैतृक घर के प्रभावित हिस्से को हटाने के लिए स्वयं आगे आना इसी द्वंद्व में जनहित को प्राथमिकता देने का सार्वजनिक संदेश है। निश्चित ही यह घटना सार्वजनिक जीवन में आचरण की एक मिसाल प्रस्तुत करने का अनुपम उदाहरण भी है।
(लेखक, राष्ट्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड एडवाइजरी के पूर्व सदस्य एवं पत्रकार हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी