मध्य प्रदेश में श्वेत क्रांति : दूध की धार से बदलेगी गांव की अर्थव्यवस्था, देश के अग्रणी राज्यों में शामिल
भोपाल, 05 अक्टूबर (हि.स.)। मध्य प्रदेश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में अब एक ऐसा बदलाव देखने को मिल रहा है, जिसकी सबसे बड़ी ताकत खेत नहीं, बल्कि गांव-गांव खड़े पशु और उनसे मिलने वाला दूध है। पशुपालक अब सिर्फ घर की जरूरत पूरी करने के लिए दूध नहीं बेच रहा, बल्कि उसके लिए दूध खेती के साथ नियमित आमदनी का जरिया बन रहा है।
मध्य प्रदेश में इसी बदलाव को बड़े पैमाने पर आगे बढ़ाने की तैयारी है। राज्य सरकार की कोशिश दूध उत्पादन को केवल पशुपालन की गतिविधि न रखकर ग्रामीण आय का मजबूत आधार बनाने की है। सहकारिता, नस्ल सुधार, पशु स्वास्थ्य, बेहतर पोषण और दूध के संग्रहण से लेकर प्रसंस्करण तक की व्यवस्था को विस्तार देकर प्रदेश में श्वेत क्रांति का नया अध्याय शुरू हो रहा है।
मध्य प्रदेश पहले ही दूध उत्पादन में देश के अग्रणी राज्यों में शामिल है। वर्ष 2024-25 में प्रदेश में 225.95 लाख टन दूध का उत्पादन हुआ, जो वर्ष 2023-24 के 213.26 लाख टन की तुलना में करीब 5.95 प्रतिशत अधिक है। देश के कुल दूध उत्पादन में मध्य प्रदेश की हिस्सेदारी 9.12 प्रतिशत रही और प्रदेश उत्तर प्रदेश तथा राजस्थान के बाद तीसरे स्थान पर रहा।
प्रदेश में दूध उत्पादन का ग्राफ लगातार ऊपर गया है। पशुपालन विभाग से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, 2020-21 में यह करीब 179.99 लाख टन था, जो 2021-22 में 190.04 लाख टन, 2022-23 में 201.22 लाख टन, 2023-24 में 213.26 लाख टन और 2024-25 में 225.95 लाख टन तक पहुंच गया। यानी चार वर्षों में उत्पादन में करीब 45.96 लाख टन की बढ़ोतरी हुई। दूध की उपलब्धता के लिहाज से भी मध्य प्रदेश की स्थिति मजबूत है। वर्ष 2024-25 में प्रदेश में प्रति व्यक्ति प्रतिदिन दूध की उपलब्धता 707 ग्राम रही, जबकि राष्ट्रीय औसत 485 ग्राम था। 2018-19 में प्रदेश में यह उपलब्धता 538 ग्राम थी। यानी छह वर्षों में इसमें 169 ग्राम प्रतिदिन की बढ़ोतरी हुई।
यह आंकड़ा इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि मध्य प्रदेश की पहचान लंबे समय तक मुख्य रूप से कृषि प्रधान राज्य के रूप में रही है। अब खेती के साथ पशुपालन ग्रामीण आय के दूसरे मजबूत आधार के रूप में उभर रहा है। श्वेत क्रांति का असली आधार केवल अधिक दूध पैदा करना नहीं, बल्कि किसान के दूध को संगठित बाजार तक पहुंचाना है। मध्य प्रदेश में इसी दिशा में सहकारी दुग्ध समितियों का नेटवर्क लगातार बढ़ाया जा रहा है। मध्य प्रदेश में वर्तमान में सहकारी समितियों के माध्यम से प्रतिदिन लगभग 12 लाख लीटर दूध का संग्रहण किया जा रहा है, जिसे बढ़ाकर 50 लाख लीटर प्रतिदिन करने का लक्ष्य रखा गया है।
असली चुनौती : उत्पादन से संग्रहण तक
यहां एक आंकड़ा खास तौर पर ध्यान देने वाला है। प्रदेश में रोजाना दो करोड़ लीटर से अधिक दूध का उत्पादन होता है, लेकिन सहकारी समितियों के माध्यम से वर्तमान में करीब 12 लाख लीटर दूध प्रतिदिन खरीदा जा रहा है। अब इसी संगठित खरीद को बढ़ाकर 50 लाख लीटर प्रतिदिन करने का लक्ष्य रखा गया है। यानी चुनौती दूध पैदा करने से ज्यादा उसे संगठित बाजार तक पहुंचाने की है।
इसी अंतर को कम करने के लिए सहकारी नेटवर्क का विस्तार किया जा रहा है। मध्य प्रदेश स्टेट को-ऑपरेटिव डेयरी फेडरेशन के पास वर्तमान में 7,145 कार्यरत दुग्ध सहकारी समितियां हैं, जिनसे 3,38,156 सदस्य जुड़े हैं। दूध को गांव से डेयरी तक पहुंचाने के लिए 603 बल्क मिल्क कूलर, 59 दुग्ध शीत केंद्र, छह मुख्य डेयरी संयंत्र और 10 लघु डेयरी संयंत्र उपलब्ध हैं। यही व्यवस्था किसान और बाजार के बीच की दूरी कम करती है। गांव में उत्पादित दूध स्थानीय स्तर पर संग्रहित होकर जांच और शीतकरण के बाद डेयरी नेटवर्क में पहुंचता है। इससे किसान को खुले बाजार में दूध बेचने की मजबूरी कम होती है और संगठित बाजार से जुड़ने का रास्ता बनता है।
डेयरी की सबसे बड़ी सामाजिक ताकत यह है कि इसमें परिवार के दूसरे सदस्यों, खासकर महिलाओं की भागीदारी सीधे आय में बदल सकती है। पशुओं को चारा देना, दूध निकालना, पशु की देखभाल और दूध को संग्रहण केंद्र तक पहुंचाना ग्रामीण परिवार की रोजमर्रा की गतिविधियों का हिस्सा है।
यदि दूध का भुगतान पारदर्शी तरीके से सीधे उत्पादक तक पहुंचे तो पशुपालन की आय परिवार के नियमित खर्चों को संभालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। यही कारण है कि सहकारी डेयरी मॉडल को ग्रामीण विकास और महिला सशक्तीकरण से भी जोड़ा जा रहा है। केंद्र की श्वेत क्रांति 2.0 पहल का भी उद्देश्य डेयरी सहकारिता के माध्यम से दूध उत्पादन और उत्पादकता बढ़ाना तथा ग्रामीण दुग्ध उत्पादकों को संगठित बाजार से जोड़ना है।
2026 में गांव-गांव पहुंच रहा 'दुग्ध समृद्धि' अभियान
प्रदेश सरकार ने वर्ष 2026 को कृषक कल्याण वर्ष के रूप में मनाते हुए दुग्ध उत्पादन बढ़ाने के लिए गांव स्तर पर अभियान भी शुरू किया है। दुग्ध समृद्धि संपर्क अभियान के जरिए पशुपालकों को नस्ल सुधार, पशु स्वास्थ्य और पोषण की जानकारी देने पर जोर है। इसके साथ ही प्रदेश में क्षीरधारा ग्राम योजना शुरू की गई है। पहले चरण में पांच हजार से अधिक गांवों को चुना गया है। गांवों को पशुपालन की स्थिति, उन्नत पशुपालकों की उपलब्धता, नस्ल सुधार, पशु स्वास्थ्य, टीकाकरण और टैगिंग जैसे मानकों के आधार पर वर्गीकृत कर दुग्ध उत्पादन बढ़ाने की कोशिश की जा रही है।
मप्र के सहकारिता मंत्री विश्वास सारंग का कहना है कि पिछले साल एनडीडीबी के साथ हुए समझौते के बाद प्रदेश में दुग्ध उत्पादन और दूध संग्रहण में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। दूध उत्पादकों को समयबद्ध भुगतान सुनिश्चित करने के साथ उनकी आय बढ़ाने पर भी जोर दिया जा रहा है। नए डेयरी प्लांट की स्थापना से दूध संग्रहण की क्षमता बढ़ रही है।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का कहना है कि मध्य प्रदेश नई दुग्ध क्रांति की ओर बढ़ रहा है। हमारा लक्ष्य बिल्कुल स्पष्ट है कि देश का अधिकतम दुग्ध उत्पादन मप्र की धरती पर हो। प्रदेश में 80 लाख से अधिक गौपालकों का विशाल समृद्ध परिवार है। किसानों की समृद्धि और उनकी आय बढ़ाने के लिए हमारी सरकार ने सभी तरह के प्रयास शुरू किए हैं। किसानों की सबसे अधिक आय दूध उत्पादन से होती है। हम प्रदेश के हर गांव-कस्बे की सभी दुग्ध सहकारी समितियों को और भी सशक्त करने के लिए सभी जरूरी कदम उठा रहे हैं।
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हिन्दुस्थान समाचार / मुकेश तोमर