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इस बार पितृपक्ष की अवधि 16 दिन के स्थान पर 15 दिन की, सप्तमी व अष्टमी का श्राद्ध 03 अक्टूबर को होगा

 




- 26 सितंबर को पूर्णिमा से शुरू होंगे श्राद्ध, 10 अक्टूबर को सर्व पितृ अमावस्या पर होंगे समाप्त

मुरादाबाद, 24 सितम्बर (हि.स.)। श्री हरि ज्योतिष संस्थान लाइनपार के संचालक ज्योतिषाचार्य पंडित सुरेंद्र शर्मा ने गुरुवार को बताया कि पितृ पक्ष का शुभारंभ 26 सितंबर शनिवार को भाद्र मास की पूर्णिमा तिथि से प्रारंभ होगा और 10 अक्टूबर को सर्वप्रथम अमावस्या पर पितृपक्ष का समापन होगा।

ज्योतिषाचार्य ने बताया कि इन 16 दिनों की अवधि में लोग अपने पूर्वजों यानी पितरों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करते हुए तर्पण, पिंडदान और दान-पुण्य करते हैं। ऐसा करने पितरों की आत्मा को शांति मिलती है और तृप्त होती है। इस बार पितृपक्ष की अवधि 16 दिन के स्थान पर 15 दिन की होगी, क्योंकि सप्तमी और अष्टमी का श्राद्ध 3 अक्टूबर (शनिवार) को होगा।

ज्योतिषाचार्य पंडित सुरेंद्र शर्मा ने कहा कि पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, पितृ पक्ष के दौरान पितृ देव भू-लोक (पृथ्वी) पर आते हैं और अपने वंशजों को सुख-समृद्धि और खुशहाली का आशीर्वाद प्रदान करते हैं।

श्राद्ध कर्म की प्रक्रिया बताते हुए पंडित सुरेंद्र शर्मा ने कहा कि जिस दिन पितरों का श्राद्ध होता है उसे दिन सुबह स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण कर संकल्प लिया जाता है, जिसमें पूर्वज का नाम व गोत्र लेकर श्राद्ध करने का प्रण किया जाता है। इसके बाद पितरों का आह्वान कर तर्पण, पिंडदान और ब्राह्मण भोजन कराया जाता है। अंत में गाय, कौआ, कुत्ते और चींटी के लिए भोजन निकाला जाता है, क्योंकि इन्हें पितरों का प्रतीक माना गया है। पूरी प्रक्रिया शांत और श्रद्धामय वातावरण में संपन्न होनी चाहिए। तर्पण के लिए दक्षिण दिशा की ओर मुख करके बैठें, हाथ में कुशा घास, काले तिल और जल लेकर पितरों का नाम-गोत्र स्मरण करते हुए जल अर्पित करें। पितरों को जल देते समय हाथ की अंगुलियों के बीच से जल गिराया जाता है, जिसे “पितृ तीर्थ” कहा जाता है। तर्पण तीन पीढ़ियों – पिता, दादा और परदादा के निमित्त किया जाता है, और प्रत्येक के लिए अलग-अलग जल अर्पित किया जाता है।

हिन्दुस्थान समाचार / निमित कुमार जायसवाल