बंगाल में सियासी जंग : चुनाव आयोग की नई कवायद भाजपा के लिए बनी चुनौती
कोलकाता, 29 अगस्त (हि.स.) । पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले बूथ लेवल की राजनीति सबसे अहम रही है। चुनाव आयोग ने विशेष गहन पुनरीक्षण के तहत राज्य में करीब चौदह हजार नए मतदान केंद्र जोड़ने की योजना बनाई है। इसके बाद बूथों की संख्या 80 हजार 611 से बढ़कर लगभग चौरानबे हजार तक पहुंच जाएगी। इस फैसले ने राजनीतिक दलों की जमीनी ताकत की असली परीक्षा शुरू कर दी है। खासतौर पर भारतीय जनता पार्टी के लिए यह एक बड़ी चुनौती साबित हो सकती है।
राज्य की सत्तारूढ तृणमूल कांग्रेस के लिए यह विस्तार बूथ स्तर पर अपनी पकड़ और मजबूत करने का अवसर है। पार्टी नेताओं का कहना है कि वे हर बूथ पर एजेंट बैठाने में सक्षम हैं और पंचायत चुनावों में तो वे डमी उम्मीदवारों तक के लिए भी एजेंट तैनात कर देते हैं ताकि एक भी बूथ खाली न रहे। इसके उलट भारतीय जनता पार्टी के सामने बूथ स्तर के एजेंटों की भारी कमी सबसे बड़ी समस्या बन गई है। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि वे पूरे राज्य में केवल 70 प्रतिशत बूथों पर ही एजेंट बैठा पाएंगे, जबकि लोकसभा चुनाव के दौरान पार्टी 80 हजार 611 बूथों में से केवल पचास से पचपन हजार तक ही कवर कर सकी थी। इस बार का लक्ष्य 65 से 70 हजार बूथ तक पहुंचने का है लेकिन अंदरूनी तौर पर नेताओं को इस पर संदेह है।
प्रदेश अध्यक्ष शमिक भट्टाचार्य का दावा है कि पार्टी अधिकतम बूथ कवर करने की रणनीति बना रही है और जिन जगहों पर कठिनाई है वहां अलग योजना अपनाई जाएगी लेकिन पार्टी के भीतर स्वीकार किया जा रहा है कि एजेंटों की कमी को पूरा करने के लिए बूथ अध्यक्षों को ही उतारना पड़ सकता है, जिससे असली चुनाव के दौरान संगठन कमजोर पड़ जाएगा।
बीजेपी की सबसे बड़ी चुनौती अल्पसंख्यक बहुल जिलों—मालदा, मुर्शिदाबाद, उत्तर दिनाजपुर और दक्षिण दिनाजपुर—में है। इन चार जिलों में लगभग उन्नीस हजार बूथ आते हैं और यहां पार्टी को कार्यकर्ताओं की सुरक्षा और उपलब्धता दोनों ही समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।
विश्लेषकों का कहना है कि बूथ स्तर की राजनीति महज़ संख्या की नहीं बल्कि धैर्य, पड़ोस में पैठ और स्थानीय स्वीकार्यता की होती है।
राजनीतिक विश्लेषक विश्वनाथ चक्रवर्ती का कहना है कि तृणमूल कांग्रेस ने यह कला साध ली है जबकि भारतीय जनता पार्टी अभी भी काफी पीछे है। दूसरी और राजनीतिक विश्लेषक मैदुल इस्लाम का मानना है कि यह प्रक्रिया पार्टियों की वास्तविक ताकत का आईना साबित होगी और बीजेपी के पास चुनाव से पहले खामियों को भरने के लिए तीन से चार महीने का समय होगा।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अधीर रंजन चौधरी ने साफ कहा कि जनता का गुस्सा बैलट बॉक्स में पूरी तरह दिखाई नहीं देता क्योंकि तृणमूल कांग्रेस हर बूथ पर मौजूद रहती है और नए बूथों के आने से विपक्ष पर दबाव और बढ़ जाएगा। वहीं सीपीएम के नेता सुजन चक्रवर्ती ने आरोप लगाया कि जहां भी उनकी पार्टी एजेंट बैठाने में सफल हुई, वहां गिनती के दौरान तृणमूल कांग्रेस ने सरकारी तंत्र का इस्तेमाल कर कब्जा कर लिया।
पूर्व मुख्य चुनाव अधिकारी और पूर्व तृणमूल सांसद जवाहर सरकार ने भी माना कि जिस राज्य में सत्ताधारी पार्टी का नियंत्रण होता है वहां बूथ स्तर के अधिकारी और एजेंट उसी पार्टी को स्वाभाविक बढ़त दिलाते हैं। उन्होंने हालांकि यह भी कहा कि बंगाल में कई सरकारी कर्मचारी महंगाई भत्ते को लेकर नाराज हैं और वे निष्पक्षता बरत सकते हैं।
बंगाल की राजनीतिक इतिहास गवाही देता है कि बूथ प्रबंधन से ही चुनावी तस्वीर बदल सकती है। अस्सी के दशक में सीपीएम ने पंचायत से बूथ तक का नेटवर्क खड़ा कर अपना दबदबा कायम किया था और दो हजार ग्यारह में सत्ता में आने के बाद तृणमूल कांग्रेस ने उसी मॉडल को और मजबूत किया। भारतीय जनता पार्टी अब उसी राह पर चलने की कोशिश कर रही है, लेकिन बूथ स्तर की लड़ाई में अभी वह तृणमूल कांग्रेस से काफी पीछे नज़र आ रही है।
हिन्दुस्थान समाचार / ओम पराशर