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ऋग्वेद की ब्रह्मवादिनी परंपरा को सहेज रहीं बक्सर की तीन बेटियां, दिल्ली में साध रहीं देववाणी संस्कृत की तपस्या

 




बक्सर, 11 जुलाई (हि.स.)।

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः—भारतीय संस्कृति का यह उद्घोष केवल शास्त्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि आज भी अपनी जीवंतता का प्रमाण दे रहा है। महर्षि विश्वामित्र, वेदों और ऋषि परंपरा की पावन भूमि बक्सर से निकली तीन सगी बहनें आज इंद्रप्रस्थ (नई दिल्ली) में देववाणी संस्कृत का गंभीर अध्ययन कर ऋग्वेद की ब्रह्मवादिनी परंपरा को नए युग में आगे बढ़ाने का संकल्प लिए हुए हैं।

ऋग्वेद में घोषा, लोपामुद्रा, अपाला, विश्ववारा, गार्गी और मैत्रेयी जैसी विदुषी नारियों ने अपने ज्ञान, तप और वैदिक चिंतन से भारतीय ज्ञान परंपरा को समृद्ध किया था। आज उसी परंपरा की एक प्रेरक झलक बक्सर की इन तीन प्रतिभाशाली बेटियों में दिखाई देती है, जो संस्कृत को केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, दर्शन और ज्ञान-विज्ञान की आत्मा मानकर अध्ययनरत हैं।

आपको बता दे कि नगर के सिविल लाइंस निवासी अधिवक्ता विनोद उपाध्याय की ज्येष्ठ पुत्री सौम्या उपाध्याय दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रतिष्ठित मिरांडा हाउस में संस्कृत स्नातक की छात्रा हैं। उन्होंने बक्सर के सरस्वती विद्या मंदिर से दसवीं की परीक्षा 93 प्रतिशत अंकों के साथ उत्तीर्ण की थी। विद्यालय से लेकर विश्वविद्यालय तक संस्कृत वाद-विवाद, शास्त्रार्थ एवं भाषण प्रतियोगिताओं में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है। उत्कृष्ट प्रदर्शन के आधार पर उन्हें दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रवृत्ति भी प्राप्त हुई है।

दूसरी पुत्री तनया उपाध्याय दिल्ली विश्वविद्यालय के इंद्रप्रस्थ कॉलेज में संस्कृत स्नातक की छात्रा हैं। उन्होंने भी सरस्वती विद्या मंदिर से दसवीं की परीक्षा 94 प्रतिशत अंकों के साथ उत्तीर्ण की। तनया का सपना है कि वे ऋषिकाओं घोषा, लोपामुद्रा, अपाला और दार्शनिक विदुषियों गार्गी-मैत्रेयी की परंपरा में भारतीय ज्ञान-संस्कृति की संवाहक बनें।

सबसे छोटी बहन अपूर्वा उपाध्याय दिल्ली विश्वविद्यालय के लक्ष्मीबाई कॉलेज में समाज विज्ञान की छात्रा हैं। यद्यपि उनका विषय संस्कृत नहीं है, फिर भी भारतीय संस्कृति और ज्ञान परंपरा के प्रति उनकी गहरी रुचि उन्हें अपनी बहनों के समान अध्ययनशील बनाती है।

दरअसल तीनों बहनें बक्सर जिले के डुमरांव अनुमंडल स्थित एकौनी गांव निवासी स्वर्गीय अधिवक्ता सिद्धेश्वर उपाध्याय की पौत्रियां हैं। छोटे शहर से निकलकर देश के शीर्ष विश्वविद्यालय में तीन सगी बहनों का अध्ययनरत होना स्वयं में एक प्रेरक उपलब्धि है।

पिता विनोद उपाध्याय कहते हैं कि बेटियों की पढ़ाई के प्रति समर्पण और ज्ञान-पिपासा के आगे वे स्वयं नतमस्तक हैं। आर्थिक चुनौतियां होने के बावजूद उन्होंने बेटियों की शिक्षा में कभी कोई कमी नहीं आने दी। उनका मानना है कि धन से बड़ी विरासत शिक्षा होती है।

माता रेखा देवी, जो राजपुर प्रखंड के जारीगांवा गांव की निवासी हैं, ने भी बेटियों के संस्कार, अनुशासन और अध्ययनशीलता की मजबूत नींव रखी है। श्री उपाध्याय बताते हैं कि बेटियों को संस्कृत के प्रति प्रेरित करने में उनके मामा गोविंदजी दुबे, गोपाल कृष्ण दुबे और सत्यम दुबे का अमूल्य योगदान रहा है। तीनों स्वयं संस्कृत के विद्वान हैं और समय-समय पर उन्होंने बेटियों का मार्गदर्शन किया है।

परिवार की स्पष्ट योजना है कि तीनों बेटियां आगे चलकर संस्कृत में उच्च शोध, अध्यापन और भारतीय ज्ञान परंपरा के पुनर्जागरण में योगदान दें। ऐसे समय में जब देववाणी संस्कृत का गंभीर अध्ययन करने वाले युवाओं की संख्या लगातार घट रही है, बक्सर की ये तीन बेटियां आशा की नई किरण बनकर उभरी हैं।

वास्तव में, यह केवल तीन बेटियों की सफलता की कहानी नहीं, बल्कि उस सनातन परंपरा का पुनर्जागरण है JN जिसने वेदों के स्वर, उपनिषदों का चिंतन और भारतीय दर्शन का आलोक पूरी दुनिया तक पहुंचाया। महर्षि विश्वामित्र की भूमि बक्सर की ये बेटियां सिद्ध कर रही हैं कि यदि संकल्प, संस्कार और साधना साथ हों तो ऋग्वेद की ब्रह्मवादिनी परंपरा आज भी जीवित है।

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हिन्दुस्थान समाचार / Jitendra Mishra