संघ प्रमुख भागवत का दूसरे दिन का पाथेय और भारत के हित में सार्वभौमिक सत्य
- डॉ मयंक चतुर्वेदी
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने शताब्दी वर्ष की ओर अग्रसर है। इस अवसर पर दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित व्याख्यानमाला ‘100 वर्ष की संघ यात्रा: नए क्षितिज’ के संदर्भ में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने जो विचार रखे, वे आज सिर्फ संघ की दिशा और दशा को ही नहीं, बल्कि भारत के भविष्य के स्वरूप को भी रेखांकित करते हैं। उनका कहना, “शुद्ध सात्विक प्रेम ही संघ है। यही अपने कार्य का आधार है।” यह वाक्य इस संगठन के वास्तविक चरित्र को स्पष्ट करता है कि संघ शक्ति के प्रदर्शन या सत्ता की प्राप्ति का साधन नहीं, बल्कि नागरिक और समाज को भीतर से मजबूत बनाने का प्रयास है।
डॉ. भागवत ने आत्मनिर्भरता को नागरिक और राष्ट्र दोनों की सबसे बड़ी शक्ति बताया है। उनके अनुसार, आत्मनिर्भरता का अर्थ केवल आर्थिक उत्पादन नहीं है, यह मानसिक स्वतंत्रता और निर्णय की स्वतंत्रता भी है। जैसा कि हम सभी देख रहे हैं, वर्तमान भारत आर्थिक वैश्वीकरण के दौर में है, लेकिन इस वैश्विक प्रतिस्पर्धा में टिके रहने के लिए केवल तकनीक या पूँजी काफी नहीं।
स्व नीति के लिए आत्मनिर्भरता जरूरी
यहां सरसंघचालक कहते हैं- “हमारी नीति ऐसी होनी चाहिए कि हम अपनी मर्जी से दूसरे देशों के साथ संबंध बनाएं, किसी के दबाव में नहीं।” स्वभाविक है कि यही बात एक नागरिक के स्तर पर भी उतनी ही लागू होती है। वस्तुत: जब व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं के लिए आत्मनिर्भर होगा, तभी वह परनिर्भरता से मुक्त होकर सशक्त नागरिक बनेगा। फिर हमारे सामने शक्तिशाली देशों के तमाम उदाहरण भी हैं, जो यही बता रहे हैं कि उनके शक्ति सम्पन्न होने के पीछे यदि कोई बड़ा तत्व जिम्मेदार है तो वह है उनका अधिकतम स्थिति में आत्मनिर्भर होना। इस संदर्भ में संघ का दृष्टिकोण यह है कि हर व्यक्ति अपने छोटे-छोटे कामों से आत्मनिर्भरता की राह पर चले। घर-परिवार में भारतीय उत्पादों का उपयोग, बच्चों को श्रम का संस्कार, और स्थानीय स्तर पर उत्पादन-उपभोग को बढ़ावा देना ये सब नागरिक सशक्तिकरण के वास्तविक उपकरण हैं।
सशक्त भारत के लिए यहां डॉ. भागवत अपने उद्बोधन में बच्चों को संघर्ष का अनुभव कराने पर बल देते हुए भी दिखे हैं, उन्होंने कहा, “बच्चों को जिंदगी की असली बातें समझानी हैं तो उन्हें झुग्गी-बस्तियों, कारगिल या गाँवों में ले जाइए।” यह संदेश केवल पर्यटन का नहीं, बल्कि शिक्षा और चेतना के स्तर का भी है। वस्तुत: जब बच्चे संघर्ष देखेंगे, तब उनमें सहानुभूति और जिम्मेदारी दोनों विकसित होंगे। यही भाव उन्हें भविष्य में सशक्त नागरिक बनाता है। संघ की दृष्टि में यह शिक्षा केवल किताबों से नहीं, बल्कि अनुभव से आती है। नागरिक चेतना का वास्तविक अर्थ है; समाज की वास्तविकताओं को समझना और उनके प्रति सक्रिय जिम्मेदारी निभाना।
राष्ट्रहित में छोटे प्रयासों से होते हैं बड़े परिवर्तन
संघ का मानना है कि राष्ट्र निर्माण केवल बड़े-बड़े प्रोजेक्ट या योजनाओं से नहीं होता। नागरिक के छोटे-छोटे प्रयास भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। इसलिए ही “देश और समाज की मदद के लिए छोटा काम भी बड़ा होता है।” उदाहरण के लिए, एक पौधा लगाना भी पर्यावरण रक्षा का बड़ा कदम है। किसी वंचित बच्चे को पढ़ाना भविष्य निर्माण की नींव है। परिवार के भीतर देश सेवा पर चर्चा करना भी नागरिक जिम्मेदारी की शुरुआत है। इन छोटे प्रयासों से नागरिक में सेवा का भाव उत्पन्न होता है और धीरे-धीरे यह सामूहिक शक्ति बन जाती है। यही संघ की कार्यप्रणाली का मूल है। अंतत: ये छोटे-छोटे प्रयासों का संगठित रूप ही एक समय के बाद भविष्य में बड़े परिवर्तन का आधार बनता है।
इसलिए है हिंदू समाज के संगठन की आवश्यकता
कहना होगा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना से लेकर आज तक उसका सबसे बड़ा उद्देश्य यदि कोई रहा है तो वह हिंदू समाज का सशक्त संगठन है। क्योंकि जब हम देखते और अनुभूत करते हैं कि भारतीय समाज जाति, पंथ, क्षेत्र और भाषा के आधार पर बंटा रहा है और अब भी कई बार यह बंटता हुआ दिखता है तब यह स्पष्ट है कि ये विखंडन हमारी सामूहिक शक्ति को कमजोर करता है। इसलिए रास्वसंघ अनेक वर्षों से इस बात पर जोर दे रहा है, जैसा कि स्वयं भागवतजी भी कई अवसरों पर कह चुके हैं कि “मंदिर, पानी और श्मशान में कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए।” इसका अर्थ है कि जीवन और मृत्यु दोनों में समानता ही समाज संगठन की आधारशिला है।
सेवा और करुणा ही है संगठन का आधार
यहां ‘100 वर्ष की संघ यात्रा: नए क्षितिज’ शीर्षक केंद्रित इस व्याखान माला में फिर पहले ही दिन कही बात दोहराई गई है, वह यह कि संघ संगठन किसी सत्ता या क्रेडिट की इच्छा से प्रेरित नहीं है। भागवत कहते हैं कि “संघ में आकर तुम्हें कुछ नहीं मिलेगा, बल्कि जो है वो भी चला जाएगा।” इसका आशय यह है कि संघ व्यक्ति से त्याग और सेवा की अपेक्षा करता है, न कि व्यक्तिगत लाभ की। सज्जनों से मैत्री और दुर्जनों के प्रति करुणा, यही संगठन का मूल है। यहां वे धर्म की परिभाषा को भी व्यापक अर्थ में समझाते हैं, उनके अनुसार “धर्म का अर्थ रिलिजन नहीं, बल्कि संतुलन है। धर्म हमें किसी एक्स्ट्रीमिटी पर नहीं जाने देता।” संघ की दृष्टि में धर्म का अर्थ पूजा-पाठ से कहीं व्यापक है। यह जीवन का ऐसा संतुलन है, जिसमें व्यक्ति और समाज दोनों का कल्याण निहित है। यदि धर्म का पालन केवल संकीर्ण परंपराओं तक सीमित रह जाएगा तो वह समाज को विभाजित करेगा। किंतु यदि धर्म को संतुलन और समरसता के रूप में देखा जाएगा तो वह समाज को एकजुट करेगा।
भागवतजी ने परिवार और समाज को परंपरा से जुड़े रहने पर जोर दिया है। “भाषा, भजन, भोजन, भूषण और भ्रमण अपने घर की परंपरा के अनुसार होना चाहिए।” इसका आशय है कि आधुनिकता अपनाते हुए भी हमें अपनी जड़ों से जुड़े रहना चाहिए। संघ मानता है कि यदि परिवार परंपरा से कट जाएगा तो समाज अपनी पहचान खो देगा। इसलिए परंपरा और आधुनिकता का संतुलन ही भारतीय संस्कृति की आत्मा है।
विश्वशांति के लिए हिंदू धर्म का सार्वभौमिक संदेश
इसके साथ ही डॉ. भागवत जोर देकर समझाते हैं कि “जैसे गुरुत्वाकर्षण का नियम सबके लिए है, वैसे ही सार्वभौमिक धर्म हिन्दू धर्म है।” यह कथन भारतीय संस्कृति की उस वैश्विक दृष्टि को दर्शाता है, जिसमें किसी एक समुदाय का नहीं, बल्कि पूरे मानव समाज का कल्याण निहित है। हिंदू धर्म की अवधारणा वसुधैव कुटुंबकम् पर आधारित है। संघ की दृष्टि में यही विचारधारा विश्व में बढ़ते संघर्ष, युद्ध और प्रतिस्पर्धा का समाधान दे सकती है। संघ का मूल दर्शन है; “सभी का भला होना चाहिए।” भागवत ने चेताया कि यदि हर कोई केवल उपभोग और प्रतिस्पर्धा के पीछे भागेगा तो समाज में संघर्ष बढ़ेगा और दुनिया विनाश की ओर जाएगी। इसके विपरीत, यदि जीवन में संतुलन और समता हो तो सबका कल्याण संभव है।
कुल मिलाकर कहना होगा कि डॉ. भागवत का ये संबोधन संघ की उस दीर्घकालिक दृष्टि को सामने लाता है, जिसमें नागरिक का सशक्तिकरण, आत्मनिर्भरता, शिक्षा और संघर्ष से सीखने की प्रक्रिया से होता है। हिंदू समाज का संगठन सामाजिक समरसता, सेवा और करुणा के आधार पर ही हो सकता है। भारतीय संस्कृति का पुनर्जागरण धर्म को संतुलन और समरसता के रूप में स्थापित कर विश्व शांति का संदेश देने के लिए है। सरसंघचालक डॉ. भागवत के शब्दों में कहें तो “हमारा मूल दर्शन है सभी का कल्याण।” यही वह दृष्टि है जो संघ को अन्य संगठनों से अलग करती है।
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी