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एक शिक्षिका के भरोसे पहली से आठवीं तक की पढ़ाई, जर्जर भवन में चल रहा जोजोहातू का स्कूल

 






खूंटी, 08 अगस्त (हि.स.)। झारखंड सरकार और जिला प्रशासन शिक्षा व्यवस्था में सुधार तथा सरकारी विद्यालयों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने के लगातार दावे करते हैं। समय-समय पर शिक्षा के विकास को लेकर कार्यशालाएं, जागरूकता कार्यक्रम और अन्य गतिविधियां भी आयोजित की जाती हैं, लेकिन ग्रामीण इलाकों के कई विद्यालयों की स्थिति इन दावों की जमीनी हकीकत पर सवाल खड़े करती है। खूंटी जिले के लांदुप पंचायत अंतर्गत जोजोहातू गांव स्थित राजकीयकृत मध्य विद्यालय इसका उदाहरण है, जहां पहली से आठवीं कक्षा तक के विद्यार्थियों की पढ़ाई फिलहाल महज एक सहायक शिक्षिका के भरोसे चल रही है।

विद्यालय में पहली से आठवीं कक्षा तक के विद्यार्थियों को पढ़ाने के लिए वर्तमान में केवल सहायक शिक्षिका जशोमनी सलोनी पदस्थापित हैं। आठ कक्षाओं के विद्यार्थियों को अकेले पढ़ाने के अलावा उन्हें मध्याह्न भोजन और विद्यालय से जुड़े अन्य सरकारी कार्यों का भी दायित्व संभालना पड़ता है। ऐसे में सभी कक्षाओं के विद्यार्थियों को पर्याप्त समय देना और उन्हें अपेक्षित स्तर की गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना उनके लिए बड़ी चुनौती है।

विद्यालय में पहली से आठवीं कक्षा तक के विद्यार्थियों के लिए कुल चार कमरे हैं, लेकिन इनमें से अधिकांश काफी पुराने और जर्जर हो चुके हैं। बरसात के मौसम में स्थिति और खराब हो जाती है। कमरों की छत से पानी टपकता रहता है और कई बार छत का मलबा भी झड़कर नीचे गिर चुका है। इससे विद्यार्थियों और शिक्षिका की सुरक्षा को लेकर खतरा बना हुआ है।

विद्यालय में एक कमरा अपेक्षाकृत ठीक स्थिति में है। इसी कमरे में पहली से आठवीं कक्षा तक के विद्यार्थियों को एक साथ बैठाकर पढ़ाया जाता है। एक ही कमरे में अलग-अलग कक्षाओं के बच्चों को पढ़ाना शिक्षिका के लिए बड़ी चुनौती है। पहली कक्षा के छोटे बच्चों से लेकर आठवीं कक्षा के विद्यार्थियों तक की शैक्षणिक जरूरतें अलग-अलग हैं। ऐसे में सभी विद्यार्थियों पर समान रूप से ध्यान देना संभव नहीं हो पाता और उनकी पढ़ाई प्रभावित होती है।

सहायक शिक्षिका जशोमनी सलोनी ने बताया कि पहले विद्यालय में दो शिक्षिकाएं थीं, लेकिन अप्रैल में एक शिक्षिका के सेवानिवृत्त होने के बाद अब वह अकेली रह गई हैं। उन्होंने कहा कि पहली से आठवीं कक्षा तक के विद्यार्थियों को एक साथ पढ़ाना काफी कठिन है। विद्यार्थियों की संख्या और कक्षाओं को देखते हुए विद्यालय में अतिरिक्त शिक्षक या शिक्षिकाओं की आवश्यकता है। पर्याप्त शिक्षक उपलब्ध होने पर बच्चों को बेहतर तरीके से पढ़ाने के साथ उनकी शैक्षणिक गतिविधियों पर भी ध्यान दिया जा सकेगा।

उन्होंने बताया कि विद्यालय भवन भी काफी पुराना और जर्जर है। बरसात के दौरान छत से पानी टपकता है, जिससे बच्चों को सुरक्षित वातावरण में पढ़ाना चुनौतीपूर्ण हो जाता है।

वास्तव में जोजोहातू का यह विद्यालय अपने ऐतिहासिक महत्व के लिए भी जाना जाता है। इसका संबंध स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े सिंगराज सिंह मानकी से रहा है। बताया जाता है कि सिंगराज सिंह महात्मा गांधी के निकट सहयोगियों में थे और स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए उन्होंने अपना घर-बार तक छोड़ दिया था। विद्यालय के संचालन के लिए उन्होंने अपनी जमीन भी दान में दी थी।

जिस विद्यालय के लिए एक स्वतंत्रता सेनानी ने शिक्षा के उद्देश्य से भूमि दान की थी, वहां आज शिक्षकों की कमी और जर्जर भवन जैसी समस्याएं सामने आना व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है। ग्रामीणों का कहना है कि विद्यालय के ऐतिहासिक महत्व को देखते हुए प्रशासन को इसकी स्थिति सुधारने के लिए विशेष पहल करनी चाहिए।

ग्रामीणों के मुताबिक, बरसात के दिनों में विद्यालय की छत से पानी टपकने के कारण कक्षाओं का संचालन प्रभावित होता है। वहीं छत का मलबा गिरने की घटनाओं से विद्यार्थियों और शिक्षिका के लिए दुर्घटना का खतरा बना रहता है। यदि समय रहते भवन की मरम्मत या नए भवन की व्यवस्था नहीं की गई तो कभी भी बड़ी दुर्घटना हो सकती है। बच्चों को सुरक्षित माहौल उपलब्ध कराना विद्यालय की प्राथमिक जरूरत है।

विद्यालय की स्थिति पर सेवानिवृत्त शिक्षक पंचम साहू ने भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि सरकारी विद्यालयों की बदहाली के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में निजी विद्यालयों का चलन बढ़ रहा है और उनकी मनमानी भी बढ़ती जा रही है। उन्होंने कहा कि यदि ग्रामीण क्षेत्रों के सरकारी विद्यालयों में पर्याप्त शिक्षक और बेहतर आधारभूत संरचना उपलब्ध हो, तो बच्चों को अच्छी शिक्षा अपने गांव में ही मिल सकती है। लेकिन शिक्षकों की कमी, जर्जर भवन और अन्य समस्याओं के कारण अभिभावकों का भरोसा सरकारी विद्यालयों से कम होता जा रहा है।

पंचम साहू के अनुसार, इसका सबसे अधिक असर ग्रामीण और जनजातीय क्षेत्र के बच्चों पर पड़ता है। शहरों के विद्यार्थियों की तुलना में ग्रामीण बच्चे पहले से ही कई शैक्षणिक चुनौतियों का सामना करते हैं। ऐसे में यदि उन्हें विद्यालय में पर्याप्त शिक्षक और बेहतर शैक्षणिक माहौल भी नहीं मिले, तो उनके पिछड़ने का खतरा और बढ़ जाता है।

विद्यालय के विद्यार्थियों ने भी शिक्षकों की कमी और भवन की समस्या को लेकर अपनी परेशानी बताई। उनका कहना है कि केवल एक शिक्षिका होने के कारण सभी कक्षाओं की पढ़ाई प्रभावित होती है। उन्होंने विद्यालय में अतिरिक्त शिक्षक या शिक्षिका की पदस्थापना की मांग की, ताकि प्रत्येक कक्षा के विद्यार्थियों को अलग-अलग और बेहतर तरीके से पढ़ाया जा सके। विद्यार्थियों ने विद्यालय भवन की जल्द मरम्मत कराने की भी मांग की है, ताकि उन्हें सुरक्षित वातावरण में पढ़ने का अवसर मिल सके।

मामले में जिला शिक्षा अधीक्षक सुरेश महतो ने कहा कि उन्हें जोजोहातू मध्य विद्यालय में शिक्षकों की कमी और विद्यालय की स्थिति की जानकारी है। उन्होंने कहा कि केवल जोजोहातू विद्यालय ही नहीं, बल्कि जिले के कई अन्य विद्यालयों में भी शिक्षकों की कमी है, जिसे दूर करने की दिशा में ठोस पहल की जा रही है और जल्द ही विद्यालय में शिक्षक की पदस्थापना की जाएगी।

बहरहाल, ग्रामीणों और अभिभावकों की उम्मीद अब प्रशासन की पहल पर टिकी है। यदि विद्यालय में जल्द अतिरिक्त शिक्षकों की पदस्थापना के साथ भवन की मरम्मत या जीर्णोद्धार कराया जाता है, तो यहां पढ़ने वाले बच्चों को बेहतर और सुरक्षित शैक्षणिक माहौल मिल सकता है। स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े इतिहास वाले इस विद्यालय को आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराना बच्चों के भविष्य के साथ-साथ उस उद्देश्य के प्रति भी सम्मान होगा, जिसके लिए सिंगराज सिंह मानकी ने विद्यालय के लिए अपनी जमीन दान की थी।

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हिन्दुस्थान समाचार / अनिल मिश्रा