आधुनिक खेती की पहचान बनीं सुकमा की बेटी सोढ़ी तिरपो
-जब हल-बैल छूटे और हाथों में थमा पावर टिलर
रायपुर 10 जुलाई (हि.स.)। कभी खेत की मेड़ों पर हल-बैल के सहारे मेहनत करने वाली एक ग्रामीण महिला आज आधुनिक कृषि मशीन का आत्मविश्वास से संचालन कर रही है। यह बदलाव केवल खेती के तरीके का नहीं, बल्कि सोच, साहस और आत्मनिर्भरता का भी है। सुकमा जिले के कोंटा विकासखंड के ढोढरा गांव की सोढ़ी तिरपो ने यह साबित कर दिया है कि अवसर, प्रशिक्षण और विश्वास मिले तो ग्रामीण महिलाएं विकास की नई दिशा तय कर सकती हैं।
सोढ़ी तिरपो की कहानी संघर्ष से सफलता तक की ऐसी यात्रा है, जिसने पूरे गांव में नई उम्मीद जगाई है। कभी खेत की जुताई के लिए दूसरों पर निर्भर रहने वाली सोढ़ी आज स्वयं पावर टिलर चलाकर न केवल अपनी खेती कर रही हैं, बल्कि अन्य किसानों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन गई हैं।
हल-बैल से मशीन तक का सफर
एक समय था जब खेती का हर काम पारंपरिक तरीकों से होता था। हल-बैल के भरोसे खेत तैयार करना कठिन, समय लेने वाला और श्रमसाध्य था। आधुनिक कृषि यंत्रों को चलाना तो दूर, उन्हें छूने तक का आत्मविश्वास नहीं था।
लेकिन बिहान योजना ने उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी। जिला प्रशासन के मार्गदर्शन में तुलसी महिला ग्राम संगठन द्वारा संचालित कस्टम हायरिंग सेंटर से उन्हें पावर टिलर संचालन का प्रशिक्षण मिला। क्लस्टर पीआरपी श्रीमती पूजा कोड़ी के सतत मार्गदर्शन और अपनी मेहनत के बल पर उन्होंने वह कर दिखाया, जिसे कभी असंभव समझा जाता था।
आज सोढ़ी तिरपो पूरी दक्षता और आत्मविश्वास के साथ पावर टिलर चलाती हैं। मशीन की हर बारीकी समझती हैं और उसका रख-रखाव भी स्वयं करती हैं।
आधुनिक खेती से बढ़ी रफ्तार, घटी लागत
सोढ़ी तिरपो अपने 30 डिसमिल खेत में मक्का और मिर्च की खेती आधुनिक तकनीकों से कर रही हैं। पावर टिलर के उपयोग से खेती का काम पहले की तुलना में कहीं अधिक तेज, आसान और कम खर्चीला हो गया है। समय की बचत के साथ उत्पादन और फसल की गुणवत्ता में भी उल्लेखनीय सुधार देखने को मिला है।
एक महिला नहीं, पूरे गांव के बदलाव की कहानी
सोढ़ी तिरपो की सफलता केवल उनकी व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है। कस्टम हायरिंग सेंटर के माध्यम से आसपास के छोटे और सीमांत किसान भी उचित किराए पर कृषि यंत्र प्राप्त कर समय पर खेती कर रहे हैं। इससे खेती की लागत कम हुई है और आधुनिक तकनीक गांव-गांव तक पहुंच रही है।
आज सोढ़ी केवल मशीन नहीं चलातीं, बल्कि किसानों को समय पर कृषि यंत्र उपलब्ध कराने, उनके रख-रखाव और संचालन की जिम्मेदारी भी निभाती हैं। उनकी सफलता ने गांव की अनेक महिलाओं के मन से संकोच और झिझक को दूर कर दिया है। अब वे भी आधुनिक कृषि तकनीकों को अपनाने के लिए आगे आ रही हैं।
बदलाव की मिसाल बनी बिहान योजना
सोढ़ी तिरपो की कहानी इस बात का सशक्त प्रमाण है कि जब सरकारी योजनाएं सही लोगों तक पहुंचती हैं और उन्हें प्रशिक्षण व मार्गदर्शन का साथ मिलता है, तब परिवर्तन केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे समाज को नई दिशा देता है।
बिहान योजना और कस्टम हायरिंग सेंटर ने सोढ़ी तिरपो को केवल एक आधुनिक किसान ही नहीं बनाया, बल्कि उन्हें महिला सशक्तीकरण, आत्मनिर्भरता और तकनीकी कृषि की ऐसी पहचान दी है, जो आज सुकमा ही नहीं, पूरे छत्तीसगढ़ की ग्रामीण महिलाओं के लिए प्रेरणा बन गई है।
सोढ़ी तिरपो का यह सफर बताता है कि बदलाव की शुरुआत किसी बड़े शहर से नहीं, बल्कि गांव की उस महिला से भी हो सकती है, जो अवसर मिलने पर अपने हाथों से भविष्य की नई तस्वीर गढ़ने का साहस रखती है।
हिन्दुस्थान समाचार / गेवेन्द्र प्रसाद पटेल