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(विशेष) दुर्घटना या असामयिक मृत्यु के बाद आत्मा की शांति के लिए नारायणबलि का विधान, नागबलि और त्रिपिंडी श्राद्ध का भी विशेष महत्व

 




वाराणसी, 01 अक्टूबर (हि.स.)। सनातन धर्म की मान्यताओं में दुर्घटना, असामयिक मृत्यु अथवा आत्महत्या से मृत व्यक्ति की आत्मा की शांति के लिए विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों का विधान बताया गया है। ऐसी मान्यता है कि मृतक का विधिवत क्रियाकर्म न होने पर उसकी आत्मा को सद्गति नहीं मिलती और इसका प्रभाव परिवार तथा वंशजों पर भी पड़ सकता है। इसी उद्देश्य से नारायणबलि, नागबलि और त्रिपिंडी श्राद्ध जैसे अनुष्ठान किए जाते हैं।

सनातन संस्था से जुड़े संजय कुमार सिंह ने गुरूवार को बताया कि इन अनुष्ठानों का उद्देश्य पितरों को सद्गति और उच्च लोकों की प्राप्ति के लिए गति प्रदान करना है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इन विधियों के माध्यम से पितृदोष के निवारण और मृत आत्माओं की शांति की कामना की जाती है।

तीनों अनुष्ठानों का अलग-अलग है महत्व

संजय कुमार सिंह ने बताया कि नारायणबलि, नागबलि और त्रिपिंडी श्राद्ध तीन अलग-अलग धार्मिक अनुष्ठान हैं। नारायण-नागबलि सामान्यतः तीन दिनों में संपन्न होती है, जबकि त्रिपिंडी श्राद्ध एक दिन में किया जा सकता है। तीनों अनुष्ठान एक साथ करने पर भी तीन दिन में प्रक्रिया पूरी की जा सकती है।

धार्मिक मान्यता के अनुसार, इन अनुष्ठानों को पुरुष और महिलाएं दोनों कर सकते हैं। अविवाहित व्यक्ति अकेले तथा विवाहित दंपति साथ बैठकर अनुष्ठान कर सकते हैं। हालांकि, अलग-अलग परंपराओं में विधि-विधान और पात्रता संबंधी नियमों में अंतर हो सकता है।

क्या है नारायणबलि?

धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं में नारायणबलि को विशेष रूप से दुर्घटना, असामयिक मृत्यु अथवा आत्महत्या से हुई मृत्यु के मामलों से जोड़ा जाता है। मान्यता है कि ऐसे मृतकों का विधिवत क्रियाकर्म न होने पर उनका सूक्ष्म शरीर प्रेतयोनि में भटक सकता है और परिवार को कष्ट का सामना करना पड़ सकता है।

ऐसी मान्यताओं के अनुसार, मृत आत्मा को प्रेतयोनि से मुक्ति तथा सद्गति दिलाने के उद्देश्य से नारायणबलि की जाती है। इसके लिए शुक्ल पक्ष की एकादशी और द्वादशी को उपयुक्त माना गया है। संतान प्राप्ति की कामना से यह अनुष्ठान करने वालों के लिए श्रवण नक्षत्र, पंचमी अथवा पुत्रदा एकादशी को भी विशेष माना गया है।

कैसे होता है नारायणबलि का अनुष्ठान?

परंपरागत विधि के अनुसार, सबसे पहले तीर्थ स्थान पर स्नान कर नारायणबलि का संकल्प लिया जाता है। इसके बाद दो कलशों पर भगवान विष्णु और वैवस्वत यम की स्वर्ण प्रतिमाएं स्थापित कर षोडशोपचार विधि से पूजा की जाती है। इसके बाद कुश बिछाकर मंत्रोच्चार के साथ जल अर्पित किया जाता है। विष्णुरूपी प्रेत का ध्यान कर मधु, घी और तिल से युक्त दस पिंड अर्पित किए जाते हैं। पूजा के बाद इन पिंडों को नदी अथवा जलाशय में प्रवाहित करने की परंपरा है।

दूसरे दिन भगवान विष्णु की पूजा के बाद ब्राह्मणों को आमंत्रित कर एकोद्दिष्ट श्राद्ध किया जाता है। धार्मिक विधान के अनुसार भगवान विष्णु, ब्रह्मा, शिव और यम के लिए पिंड अर्पित किए जाते हैं तथा विष्णुरूपी प्रेत के लिए भी पिंड दिया जाता है। इसके बाद ब्राह्मणों को दक्षिणा एवं अन्य दान देकर तिलांजलि की प्रक्रिया पूरी की जाती है। धर्मशास्त्रीय मान्यता के अनुसार, इस अनुष्ठान से मृत आत्मा को सद्गति प्राप्त होती है।

नारायणबलि और नागबलि साथ करने की परंपरा

स्मृतिग्रंथों में नारायणबलि और नागबलि को समान उद्देश्य से जुड़ा बताया गया है। इसी कारण दोनों अनुष्ठानों को एक साथ करने की परंपरा प्रचलित है और इसे ‘नारायण-नागबलि’ कहा जाता है।

क्या है नागबलि?

नागबलि को धार्मिक परंपरा में नागहत्या से जुड़े दोष के निवारण का अनुष्ठान माना गया है। मान्यता है कि पूर्वजों द्वारा नाग की हत्या होने पर उससे संबंधित दोष वंश में संतति प्राप्ति में बाधा उत्पन्न कर सकता है अथवा परिवार को अन्य प्रकार के कष्ट हो सकते हैं।

ऐसे दोष के निवारण और संतान प्राप्ति की कामना से नागबलि करने का विधान बताया गया है। संतान की कामना से यह अनुष्ठान करने वाले दंपति द्वारा स्वयं विधि करने की परंपरा भी बताई गई है।

त्रिपिंडी श्राद्ध से तीन पीढ़ियों से आगे के पितरों का भी तर्पण

तीर्थस्थल पर पितरों को संबोधित कर किया जाने वाला श्राद्ध त्रिपिंडी श्राद्ध कहलाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, अज्ञात, सद्गति प्राप्त न कर सके अथवा पितृदोष से जुड़े पितरों की शांति और सद्गति के लिए यह अनुष्ठान किया जाता है। सामान्य श्राद्ध में पिता, पितामह और प्रपितामह अर्थात तीन पीढ़ियों के पितरों को प्रमुखता दी जाती है, जबकि त्रिपिंडी श्राद्ध में पूर्व की पीढ़ियों के पितरों के लिए भी तर्पण और पिंडदान का विधान बताया गया है।

धार्मिक परंपरा के अनुसार, इसे बारह वर्ष में एक बार किया जा सकता है। वहीं, पितृदोष अथवा पितरों से संबंधित कष्ट की मान्यता वाले परिवारों में दोष निवारण के उद्देश्य से भी यह विधि की जाती है।

किन तिथियों को किया जाता है त्रिपिंडी श्राद्ध?

त्रिपिंडी श्राद्ध के लिए अष्टमी, एकादशी, चतुर्दशी, अमावस्या और पूर्णिमा जैसी तिथियों को उपयुक्त माना गया है। इसके अलावा संपूर्ण पितृपक्ष को भी इस अनुष्ठान के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। परंपरागत मान्यता के अनुसार गुरु-शुक्रास्त, गणेशोत्सव और शारदीय नवरात्र के दौरान यह विधि नहीं की जाती। परिवार में विवाह जैसे मांगलिक आयोजन अथवा किसी अशुभ घटना के बाद भी एक वर्ष तक त्रिपिंडी श्राद्ध न करने की परंपरा बताई गई है।

इन तीर्थस्थलों पर किया जाता है त्रिपिंडी श्राद्ध

धार्मिक परंपरा में त्र्यंबकेश्वर, गोकर्ण, महाबलेश्वर, गरुड़ेश्वर, हरिहरेश्वर (दक्षिण काशी) और काशी (वाराणसी) को त्रिपिंडी श्राद्ध के लिए प्रमुख तीर्थस्थलों में माना गया है।

विधि के अनुसार तीर्थ में स्नान के बाद श्राद्ध का संकल्प लिया जाता है। इसके बाद महाविष्णु और श्राद्ध के लिए आमंत्रित ब्राह्मणों की पूजा की जाती है। यव (जौ), चावल और तिल से तीन पिंड बनाए जाते हैं और दर्भ पर तिलोदक अर्पित करते हुए पिंडदान किया जाता है।

तीन पिंडों का अलग-अलग धार्मिक विधान

परंपरा के अनुसार, यव से बने पिंड को धर्म पिंड कहा जाता है। इसे उन पितरों के लिए अर्पित किया जाता है जिनकी उत्तरक्रिया नहीं हो सकी या जिनका विधिवत पिंडदान नहीं हुआ।

पिंड पर चीनी, मधु और घी का मिश्रण अर्पित करने की भी परंपरा है, जिसे मधुरत्रय कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इसका संबंध अंतरिक्ष में स्थित पितरों की सद्गति से जोड़ा गया है। इसी प्रकार तिल से बने पिंड को पृथ्वी पर स्थित तथा विभिन्न योनियों में माने गए पितरों की सद्गति के उद्देश्य से अर्पित किया जाता है। तीनों पिंडों पर तिलोदक अर्पित करने के बाद पूजा और अर्घ्य की प्रक्रिया पूरी की जाती है।

कौन कर सकता है ये अनुष्ठान?

संजय कुमार सिंह के अनुसार, इन अनुष्ठानों को लेकर विभिन्न धार्मिक परंपराओं में अलग-अलग नियम मिलते हैं। उनके अनुसार माता-पिता के जीवित रहते हुए भी कुछ परिस्थितियों में संतान द्वारा त्रिपिंडी श्राद्ध किए जाने का विधान बताया गया है। धार्मिक परंपरा में महिलाओं के लिए मासिक धर्म की अवधि तथा गर्भावस्था के दौरान कुछ प्रतिबंध बताए गए हैं। इसी प्रकार घर में विवाह, यज्ञोपवीत अथवा मृत्यु जैसी घटनाओं के बाद अनुष्ठान के समय को लेकर भी अलग-अलग परंपरागत नियम बताए जाते हैं।

अनुष्ठान में वस्त्र और दान का विधान

नारायण-नागबलि जैसे अनुष्ठानों में नए वस्त्र धारण करने और बाद में उन्हें दान करने की परंपरा बताई गई है। पुरुषों के लिए धोती, उपरना और बनियान तथा महिलाओं के लिए साड़ी आदि वस्त्रों का उल्लेख मिलता है। परंपरा के अनुसार काले अथवा हरे रंग के वस्त्रों का प्रयोग नहीं किया जाता। नागबलि की प्रक्रिया में तीसरे दिन सोने के नाग की प्रतिमा की पूजा कर उसे दान करने का भी विधान बताया गया है।

पितृशांति से जुड़ी धार्मिक परंपरा

नारायणबलि, नागबलि और त्रिपिंडी श्राद्ध सनातन धर्म की विभिन्न श्राद्ध एवं पितृ-संबंधी परंपराओं का हिस्सा हैं। इनके माध्यम से मृतकों की शांति, पितरों की सद्गति और परिवार के कल्याण की कामना की जाती है। इन अनुष्ठानों की विधि, तिथि और नियम संबंधित संप्रदाय तथा क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं।

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हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी