×

मेदिनीपुर में ऐतिहासिक ‘तुलसी चारा’ उत्सव की धूम

 












मेदिनीपुर, 15 जनवरी (हि.स.)। मकर संक्रांति के पावन अवसर पर गुरुवार तड़के को पश्चिम और पूर्व मेदिनीपुर के सबंग–पोटाशपुर इलाके में ऐतिहासिक तुलसीचारा मेले का गुरुवार को आगाज हो गया।

इस ऐतिहासिक मेले को लेकर स्थानीय लोगों में जबर्दस्त उत्साह देखने को मिला। सुबह की पहली रोशनी के साथ ही तुलसी मंदिर परिसर और मेला क्षेत्र में श्रद्धालुओं, व्यापारियों और दर्शकों की भीड़ उमड़ने लगी। करीब 530 वर्षों से भी अधिक पुरानी परंपरा को अपने भीतर समेटे यह लोकमेला आज से शुरू होकर लगातार दस दिनों तक चलेगा।

पोटाशपुर ब्लॉक के गोकुलपुर गांव में नदी किनारे स्थित प्राचीन तुलसी मंदिर को केंद्र बनाकर हर वर्ष पौष संक्रांति के दिन इस मेले का शुभारंभ होता है। मंदिर के नाम पर ही इस मेले को तुलसीचारा मेला कहा जाता है। लगभग 12 बीघा जमीन में फैला यह मेला अविभाजित मेदिनीपुर जिले की सामाजिक, सांस्कृतिक और भावनात्मक पहचान बन चुका है।

एक समय शत्रु आक्रमण और सुरक्षा कारणों से यह ऐतिहासिक मेला महज एक दिन तक सीमित रह गया था। लेकिन समय के साथ हालात बदले और प्रशासनिक पहल से स्थिति सामान्य हुई। नतीजतन, तुलसीचारा मेला फिर से अपने पुराने स्वरूप में लौट आया है। इस बार भी मेले का आयोजन पूरे 10 दिनों के लिए किया गया है, जिससे साल भर इंतजार करने वाले लोगों में खासा उत्साह देखने को मिल रहा है।

तुलसीचारा मेले की सबसे बड़ी पहचान है तुलो (कपास) का पारंपरिक कारोबार। दशकों से दूर-दराज़ के व्यापारी यहां विभिन्न किस्मों की कपास बेचने आते हैं। इसके साथ-साथ ढोल, कांसार, खोल, करताल जैसे लोक और भावसंगीत में इस्तेमाल होने वाले वाद्ययंत्र, मिट्टी के बर्तन—हांडी, घड़ा, सिल-लोढ़ा, झाड़ू, कूड़ा—मेले की रौनक बढ़ा रहे हैं। सर्दियों की सब्जियां, ताजा मछली, सबंग–पोटाशपुर की हस्तनिर्मित चटाइयां, बागमारी का शंखशिल्प, तरह-तरह की मिठाइयां और कदमा भी लोगों को खूब आकर्षित कर रहे हैं।

यह मेला सिर्फ खरीदारी या मनोरंजन तक सीमित नहीं है, बल्कि आदिवासी ग्रामीण लोगों की भावनाओं से गहराई से जुड़ा हुआ है। जो लोग साल भर दूसरे राज्यों या जिलों में काम के सिलसिले में रहते हैं, वे इसी मेले के समय घर लौटते हैं। परिवार, रिश्तेदार और दोस्तों के साथ मिलन का यह खास अवसर बन जाता है।

स्थानीय निवासी हरिपद मंडल कहते हैं—

“तुलसी माता की कृपा से ही यह मेला सैकड़ों सालों से चला आ रहा है। गुरुवार सुबह पूजा के साथ मेला शुरू होते ही मन को एक अलग ही शांति मिलती है।”

वहीं हर साल कोलकाता से गांव लौटने वाले शांतनु मैती का कहना है—

“जहां आस्था होती है, वहां दूरी मायने नहीं रखती। तुलसीचारा मेला हमें हमारी जड़ों से जोड़ता है।”

स्थानीय पुजारी नारायण पंडित आध्यात्मिक संदेश देते हुए कहते हैं—

“तुलसी भक्ति और पवित्रता का प्रतीक है। गुरुवार को मकर संक्रांति के दिन इस मेले की शुरुआत होना अपने आप में शुभ संकेत है।”

मेला मतलब नए कपड़े, सजना-संवरना, दोस्तों के साथ घूमना और दिनभर की मस्ती। कौन सा दिन क्या पहनना है, कैसी हेयरकट होगी—इन सबकी तैयारी कई दिन पहले से शुरू हो जाती है। कामकाज से छुट्टी लेकर लोग पूरे मन से इन दस दिनों का आनंद उठाते हैं। इसलिए इलाके में “तुलसीचारा मेला शुरू होने की खबर ही सबसे बड़ी खुशी बन जाती है।

कुल मिलाकर, पांच शताब्दियों की विरासत को अपने भीतर संजोए तुलसीचारा मेला आज भी यह साबित करता है कि आधुनिकता की भीड़ में लोकसंस्कृति और परंपराएं लोगों को एक सूत्र में बांधे रखने की ताकत रखती हैं—और गुरुवार से शुरू हुआ यह उत्सव अगले दस दिनों तक सबंग–पोटाशपुर को उत्सवमय बनाए रखेगा।

---------------

हिन्दुस्थान समाचार / अभिमन्यु गुप्ता