कुमाउनी होली में रंगों से अधिक रागों में भी उड़ते हैं होली के विविध ‘रंग’
नैनीताल, 28 फ़रवरी (हि.स.)। देवभूमि उत्तराखंड प्रदेश के कुमाऊं अंचल में रामलीलाओं की तरह राग व फाग का त्योहार होली भी अलग वैशिष्ट्य के साथ मनाई जाती हैं। इसमें ग्रह-नक्षत्रों की गणना का भी अत्यधिक ध्यान रखा जाता है। यही कारण है कि यहां कई वर्षों मे पूरे देश इतर होलिका दहन तो साथ होता है, किंतु अगले दिन विशेष परिस्थितियों के कारण ‘खल्लड़’ यानी होली में ‘खलल’ माना जाता है और होली एक दिन बाद मनायी जाती है। होली में भद्रा का भी ध्यान रखा जाता है। इसी तरह कुमाउंनी होली की और भी कई विशेषताएं हैं।
ब्रज की होली की तरह ही प्रसिद्ध कुमाऊं में होली के यूं दो प्रमुख रूप मिलते हैं, बैठकी व खड़ी होली, परन्तु अब दोनों के मिश्रण के रूप में तीसरा रूप भी उभर कर आ रहा है। इसे धूम की होली कहा जाता है। इनके साथ ही महिला होलियां भी अपना अलग स्वरूप बनाऐ हुऐ हैं। इन सब के बीच परंपरागत कुमाउंनी होली में रंगों से अधिक, रागों में भी होली के विविध ‘रंग’ उड़ते हैं। माना जाता है कि प्राचीनकाल में यहां के राजदरबारों में बाहर के गायकों के आने से राग-रागिनियों पर आधारित यह होली गीत यहां आऐ हैं। इनमें शास्त्रीयता का अधिक महत्व होने के कारण इन्हें शास्त्रीय होली भी कहा जाता है।
अलग-अलग समयों पर अलग-अलग तरह की व अलग रागों में होलियों को गाये जाने की परंपरा
पूरे देश में जहां होली सामान्यता एक दिन मनायी जाती है, वहीं कुमाऊं में बैठकी होली की शुरुआत होली के पूर्वाभ्यास के रूप में पौष माह के पहले रविवार से विष्णुपदी होली गीतों से होती है। इसके अन्तर्गत विभिन्न प्रहरों में अलग अलग शास्त्रीय रागों पर आधारित होलियां गाई जाती हैं। इसकी शुरुआत बहुधा धमार राग से होती है, और फिर सर्वाधिक काफी व पीलू राग में तथा जंगला काफी, सहाना, बिहाग, जैजैवन्ती, जोगिया, झिंझोटी, भीमपलासी, खमाज व बागेश्वरी सहित अनेक रागों में भी बैठकी होलियां विभिन्न पारंपरिक वाद्य यंत्रो के साथ गाई जाती हैं।
बैठकी होली के अंतर्गत आगे बसंत पंचमी से शिवरात्रि तक अर्ध श्रृंगारिक और उसके बाद श्रृंगार रस में डूबी होलियाँ गाई जाती हैं। इनमें भक्ति, वैराग्य, विरह, कृष्ण-गोपियों की हंसी-ठिठोली, प्रेमी प्रेमिका की अनबन, देवर-भाभी की छेड़छाड़ के साथ ही वात्सल्य, श्रृंगार, भक्ति जैसे सभी रस मिलते हैं।
होली के विविध रूप
अपने समृद्ध लोक संगीत के कारण बैठकी होली कुमाऊं की लोक संस्कृति में रच बस गई है, खास बात यह भी है कि कुछ को छोड़कर अधिकांश होलियों की भाषा कुमाऊंनी न होकर ब्रज व कुछ की अवधी है। सभी बंदिशें राग-रागनियों में गाई जाती है, और यह काफी हद तक शास्त्रीय गायन है। इनमें एकल और समूह गायन का भी निराला अंदाज दिखाई देता है। लेकिन यह न तो सामूहिक गायन है, और न ही शास्त्रीय होली की तरह एकल गायन। महफिल में मौजूद कोई भी व्यक्ति बंदिश का मुखड़ा गा सकता है, जिसे स्थानीय भाषा में ‘भाग लगाना’ कहते हैं। वहीं खड़ी होली में होल्यार दिन में ढोल-मंजीरों के साथ गोल घेरे में पग संचालन और भाव प्रदर्शन के साथ होली गाते हैं, और रात में यही होली बैठकर गाई जाती है। होली गायन के दौरार होल्यारों को परंपरागत तौर पर गुड़ और बीडी-सिगरेट जबकि अब आलू के गुटके, चिप्स व फल खिलाने की परंपरा भी रहती है।
स्वांग विधा के तहत महिलाएं करती हैं पुरुषों के स्वांग
कुमाउनी होली की एक विशिष्टता अनूठी-स्वांग विधा भी है, जिसके तहत खासकर महिलाएं महिलाओं के साथ ही पुरुषों का रूप-वेषभूषा धारण कर उनका स्वांग करती हैं। इस विधा में वर्ष की महत्वपूर्ण गतिविधियों को शामिल करने की परंपरा भी रही है। ‘स्वांग’ विधा के तहत, जिसमें खासकर महिला होल्यार अपने आसपास के अथवा चर्चित व्यक्तित्वों के भेष बदलकर आते हैं। हाल के वर्षों में महिलाओं के स्वांग में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, डोनाल्ड ट्रंप, मेलोनिया ट्रंप भी नजर आये।
हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. नवीन चन्द्र जोशी