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पितृ पक्ष में उत्तराखंड के नारायणी शिला का विशेष महत्व, पूजा करने से मिलता है पितरों को मोक्ष

 




हरिद्वार, 28 सितंबर (हि.स.)। गंगा किनारे बसी धर्मनगरी हरिद्वार के मायापुर स्थित नारायणी शिला मंदिर में पितृ पक्ष के साथ ही देशभर से श्रद्धालुओं के पहुंचने का सिलसिला तेज हो गया है। सुबह से ही मंदिर परिसर में अपने पूर्वजों की आत्मिक शांति और मोक्ष की कामना लेकर श्रद्धालु श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करा रहे हैं। पुरोहितों के सानिध्य में विभिन्न पितृ कर्मकांड संपन्न कराए जा रहे हैं। पूर्वजों की मृत्यु तिथि के अनुसार श्रद्धालु यहां धार्मिक अनुष्ठान कराते हैं। सर्व पितृ अमावस्या के दिन नारायणी शिला पर सबसे अधिक श्रद्धालुओं के उमड़ने की मान्यता है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नारायणी शिला को पितृ कर्म के प्रमुख तीर्थों में माना जाता है। इसके अलावा नारायणी शिला की धार्मिक महत्ता को लेकर एक विशेष मान्यता प्रचलित है। इसके अनुसार भगवान विष्णु के श्रीविग्रह के अलग-अलग हिस्सों का संबंध देश के तीन प्रमुख तीर्थों से माना जाता है। बिहार के गया में भगवान विष्णु के चरण, बदरीनाथ के ब्रह्मकपाल में मस्तक और हरिद्वार की नारायणी शिला में भगवान विष्णु का हृदय तथा कंठ से नाभि तक का हिस्सा विराजमान होने की मान्यता है।

इसी धार्मिक परंपरा के कारण गया, हरिद्वार और बदरीनाथ को पितृ कर्म के महत्वपूर्ण तीर्थों में माना जाता है। श्रद्धालु इन स्थानों पर अपने पूर्वजों की आत्मिक शांति और मोक्ष की कामना से विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान करते हैं।

पितृ पक्ष में सुबह से पहुंच रहे श्रद्धालुपितृ पक्ष शुरू होते ही नारायणी शिला मंदिर में सुबह से श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ गई है। लोग अपनी पारिवारिक परंपरा और पूर्वजों की मृत्यु तिथि के अनुसार श्राद्ध और तर्पण करा रहे हैं। मंदिर परिसर में पुरोहितों के सानिध्य में पिंडदान समेत विभिन्न पितृ कर्मकांड कराए जा रहे हैं।

मुख्य पुजारी पंडित मनोज त्रिपाठी बताते हैं कि पितृ पक्ष में दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालु कई बार परिवार के अन्य सदस्यों के साथ सामूहिक रूप से पितृ कर्म कराते हैं। जिन लोगों को अपने पूर्वजों की मृत्यु तिथि ज्ञात होती है, वे संबंधित तिथि पर श्राद्ध और तर्पण कराते हैं।

गयासुर की कथा से जुड़ी है नारायणी शिला की मान्यता

नारायणी शिला मंदिर के मुख्य पुजारी पंडित मनोज कुमार त्रिपाठी के अनुसार, मंदिर से जुड़ी पौराणिक मान्यता गयासुर और भगवान विष्णु की कथा से संबंधित है। धार्मिक कथा के अनुसार गयासुर भगवान विष्णु के श्रीविग्रह को लेकर भागा था। भगवान विष्णु ने उसके केश पकड़कर उसे पटक दिया। इस दौरान श्रीविग्रह के अलग-अलग हिस्से तीन प्रमुख स्थानों पर गिर गए।

मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु का मस्तक बदरीनाथ के ब्रह्मकपाल, हृदय और कंठ से नाभि तक का हिस्सा हरिद्वार की नारायणी शिला और चरण गया में गिरे। कहा जाता है कि भगवान विष्णु के चरणों में पहुंचने के बाद गयासुर को मोक्ष की प्राप्ति हुई। इसके बाद भगवान विष्णु ने इन तीनों स्थानों पर अपने वास का आशीर्वाद दिया। तभी से इन स्थानों पर पितरों के निमित्त पूजा-अर्चना और कर्मकांड की परंपरा जुड़ी होने की मान्यता बताई जाती है।

नारायण बलि का भी विशेष महत्वनारायणी शिला पर पितृ पक्ष के दौरान श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान के साथ नारायण बलि पूजा भी कराई जाती है। धार्मिक मान्यताओं में भगवान विष्णु के हृदय में माता लक्ष्मी का निवास माना जाता है। इसी वजह से नारायणी शिला पर किए जाने वाले पितृ कर्म को श्रद्धालु भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की आराधना से भी जोड़कर देखते हैं।

एक लोटा जल से पितरों का स्मरणनारायणी शिला पर पितरों के निमित्त जल अर्पित करने की भी परंपरा है। श्रद्धालु अपने पूर्वजों का स्मरण करते हुए जल अर्पित करते हैं और उनकी आत्मिक शांति की कामना करते हैं। पितृ पक्ष के दौरान मंदिर परिसर में सुबह से ही मंत्रोच्चार और धार्मिक अनुष्ठानों का सिलसिला चलता रहता है।

पितरों की स्मृति में बने स्थानों की अलग पहचाननारायणी शिला मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं के पितरों की स्मृति से जुड़े कई मंदिरनुमा स्थान भी दिखाई देते हैं। मंदिर से जुड़े लोगों के अनुसार, पहले यहां श्रद्धालुओं के पितरों के नाम से ऐसे स्थान बनाए जाते थे। समय के साथ इनकी संख्या बढ़ती गई और अब जगह की कमी के कारण नए स्थान उपलब्ध नहीं कराए जाते।

कई परिवार वर्षों से अपने पूर्वजों की स्मृति में यहां आते रहे हैं और पितृ पक्ष के दौरान धार्मिक अनुष्ठान कराते हैं।

सर्व पितृ अमावस्या पर उमड़ता है सैलाबपितृ पक्ष के शुरुआती दिनों से ही श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ने लगती है, लेकिन सर्व पितृ अमावस्या पर नारायणी शिला में विशेष भीड़ रहती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, जिन पितरों की मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं होती, उनके निमित्त इस दिन श्राद्ध और तर्पण किया जा सकता है। यही वजह है कि इस अवसर पर देश के अलग-अलग हिस्सों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु हरिद्वार पहुंचते हैं।

गंगा के निकट आध्यात्मिक वातावरणनारायणी शिला मंदिर का आध्यात्मिक वातावरण हरिद्वार की पवित्र गंगा और प्राचीन तीर्थ परंपरा से जुड़ा हुआ है। वैदिक मंत्रों का उच्चारण, पिंडदान और तर्पण की धार्मिक विधियां तथा गंगा का शांत वातावरण श्रद्धालुओं को अपने पूर्वजों के साथ आध्यात्मिक रूप से जुड़ने का अवसर प्रदान करता है। यहां किया गया पितृ स्मरण अनेक भक्तों के लिए भावनात्मक और आध्यात्मिक अनुभव बन जाता है।

पितृ पक्ष ने बढ़ाई धर्मनगरी की रौनकपितृ पक्ष के 16 दिनों के दौरान नारायणी शिला में श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान और अन्य पितृ कर्मकांड का सिलसिला जारी रहेगा। आस्था के इस पर्व ने धर्मनगरी हरिद्वार में श्रद्धालुओं की आवाजाही भी बढ़ा दी है। नारायणी शिला की खासियत यह है कि यहां धार्मिक अनुष्ठान केवल एक परंपरा भर नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही पारिवारिक आस्था और पूर्वजों के प्रति श्रद्धा से जुड़े हुए हैं।

यहां पहुंचे एक श्रद्धालु ने बताया कि वे हर साल पितृ पक्ष में यहां आते हैं। परिवार के सभी सदस्य मिलकर पिंडदान और तर्पण करते हैं।

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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ.रजनीकांत शुक्ला