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बागपत के गर्भ से निकल रहा प्राचीन समृद्ध संस्कृति का इतिहास

 














रामानुज शर्मा

नई दिल्ली, 31 मार्च (हि.स.)। उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के सादिकपुर सिनौली और चंदायन आदि गांवाें के गर्भ में प्राचीन भारत की समृद्ध संस्कृति और शौर्य के इतिहास का मिलना किसी महत्वपूर्ण घटना से कम नहीं है। इतिहासकार और पुरातत्वविद इसे दुर्लभ घटना बता रहे हैं। भारतीय पुरातत्व विभाग ने इस पूरे क्षेत्र में उत्खनन की कुल 29 एकड़

भूमि को संरक्षित कर लिया है।

महाभारत काल और इसके सामान्तर समृद्ध और

कुलीन संस्कृति के विविध प्रमाण और वस्तुएं इसका जीता जागता साक्ष्य प्रस्तुत करती हैं। यहां पुरातात्विक खुदाई में मिले शूरवीरों के युद्ध रथ, शाही ताबूतों के बाद रथ और धनुष का मिलना सिनौली साइट की तीसरी महत्वपूर्ण उपलब्धि है। यहां से मिले सामान्य रथ, युद्ध रथ और काष्ठ के धनुष बहुत ही अहम हैं। इसे भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास के लिए दुर्लभतम घटना कहना अतिशयोक्ति न होगा।

इस बाबत भारतीय पुरातत्व और धराेहर विभाग, नई दिल्ली के अपर निदेशक डॉ. संजय मंजुल वर्मा ने हिन्दुस्थान समाचार से बातचीत में बताया

कि भारतीय पुरातत्व विभाग ने अब तक के अध्ययन में पाया है कि यह जो पूरा क्षेत्र है, वह पुरातत्व की दृष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण है। यह इसलिए भी अहम है कि एक तरफ जो इंडस वैली और सरस्वती सभ्यता चल रही थी, तो दूसरी तरफ गंगा-यमुना के दोआब में उसके समानान्तर जो संस्कृति चल रही थी, वह महाभारत काल के आस पास की ही थी। इसकी जानकारी और सामनता हमको इन पुरास्थलों की खुदाई में प्रमाणों से मिलती है।

सिनौली की इस साइट का ग्लोबल पॉजीशिनिंग सिस्टम यानि की जीपीएस सर्वे का कार्य हो चुका है। इसके लिए दरहम यूनिवर्सिटी, लंदन की टीम सिनौली आयी थी। इसमें दरहम यूनिवर्सिटी के डंकन, मार्क और एडम समेत तीन सदस्य शामिल थे। यह टीम भारतीय पुरातत्व विभाग (एएसआई) की टीम के साथ मिलकर कार्य कर रही है। हड़प्पा कालीन संस्कृति और इसके सामानान्तर सभ्यताओं की पड़ताल में कई अहम बातें सामने

आयी हैं।

हमारे वेदों, पुराणों और साहित्य में जो लिखा, वह प्रमाणित है

डॉ. वर्मा का कहना है कि पुरातत्व की चंदायन और सादिकपुर सिनौली गांव में साइट या अन्य साइटाें की खुदाई से एक बात तो स्पष्ट होती है कि महाभारत, वेद और अन्य साहित्य में जाे लिखा गया है, उससे यहां मिले साक्ष्यों, प्रमाणों और वस्तुओं, सामग्रियों आदि से इसकी पुष्टि होती है। उन्होंने बताया कि सबसे महत्वपूर्ण चीज है, इसकी पुष्टि सिर्फ इसलिए नहीं की गई है कि यहां से चीजें मिल रही हैं, बल्कि इसलिए कि इसकी जो तिथि क्रम है, वह एक-दूसरे सरस्वती, इंडस सभ्यता के साथ समानता रखती है। यहां की जो सांस्कृतिक परम्पराएं हैं, जैसे मृत्यु के बाद नेक्स्ट लाइफ यानी आगे के जीवन की जो अवधारणा है। जैसे अंतिम संस्कार के समय शव के साथ रखी जाने वाली वस्तुएं या जो कलात्मकता और सामाजिक पृष्ठभूमि है, वो सब कुछ समानता खाती है। कहने का मतलब कि भारतीय संस्कृति को समग्र रूप से समझना चाहें तो इस इलाके के पुरातात्विक साक्ष्यों को अनदेखा नहीं किया जा सकता है।

डॉ. वर्मा ने कहा कि अभी तक यह कहा जाता रहा है कि वैदिक परंपरा या जो वेद, पुराण आदि जाे साहित्य हैं, ऐसी भारत में कोई संस्कृति नहीं थी, यह सब कुछ बाहर से यहां आया, यह बात पूरी तरह से गलत और कपोल कल्पित है। उन्होंने कहा कि हमारे यहां 1800-2000 बीसी में योद्धाओं के प्रमाण मिले। अस्त्र शास्त्र, जो सम सामयिक दूसरी संस्कृतियों में नहीं था, वह यही दिखाता है कि हमारी संस्कृति कितनी समृद्ध और सशक्त थी।

उन्होंने कहा कि कुल मिलकर यह इस बात को साबित करता कि यह जो समानांतर संस्कृति उस समय थी, जो विश्व में बहुत ही उन्नत थी। यानी जो हम भारतीय संस्कृति देखते हैं जैसे वेद हों, पुराण हों, या इनमें सब जगह वॉरियर हैं, हमारे देवता भी वॉरियर ही हैं। चाहे देवियां हों या देवता हों। हमारे यहां दोनों में पहले से ही संतुलन रहा था।

उन्हाेंने कहा कि

इस काल के लोगों का शारीरिक सौष्ठव बहुत अच्छा था।

तीन चार जगह उत्खनन कार्य हुए हैं। वहां पर जो कंकाल मिले, जिनकी लम्बाई ग्यारह फुट है, इसका मतलब यह कतई नहीं है कि सभी लोग ऐसे होते थे। यह एक मिथ है। अधिकांशत: छह फीट ऊंचाई के लोग हुआ करते थे। इस कालावधि में कोई असामान्य ऊंचाई के लोग नहीं थे, लेकिन उनका शारीरिक सौष्ठव बहुत ही अच्छा था। यानी वे बलशाली हाेते थे। इनमें महिलाओं के अभी जो कंकाल मिले हैं, वह इसी बात को पुष्ट करता है। उनका दाहिना हाथ काफी बलशाली दिखता है। इन कंकालों के साथ जो समग्री मिली है, वह इस बात को दिखाता है कि वह युद्ध कला में बहुत ही पारंगत रही होंगी। यही नहीं, ये वैभवशाली लोग थे। क्योंकि जिस तरह का रथ मिला है उसमें तांबे से डिजाइन किया गया था। इसके साथ जो सोने की चूड़ियां और उनका जो दंड और जो टॉप है, वो इलेक्ट्रम का है। यह एक ऐसी धातु है, जिसमें सोना और चांदी का मिश्रण होता है, तो यह बहुत ही महत्वपूर्ण धातु है। ये सभी चीजें उनके वैभव और संपन्नता को बताती व दर्शाती हैं।

सबसे बड़ा शवाधान केंद्र के रूप में मिली पहचान

बागपत का यह सिनौली उत्खनन क्षेत्र वही साइट है, जिसे 2005 में दुनिया के सबसे बड़ा शवाधान केंद्र के रूप में पहचान मिली थी। इस प्राचीनतम उत्खनन क्षेत्र से शाही ताबूत, युद्ध रथ, मनके, सोने के कंगन, कीमती मृदभांड, ताम्र युक्त म्यान, तांबे की तलवारें, सिराश्र और सैकड़ों कंकाल आदि प्राप्त हो चुके हैं।

भारतीय पुरातत्व विभाग ने सिनौली की महत्वपूर्ण साइट में 15 जनवरी 2019 को तीसरे चरण का उत्खनन कार्य किया था। इससे पूर्व 15 जनवरी 2018 में हुए दूसरे चरण के उत्खनन कार्य में सिनौली से आठ मानव कंकाल और दैनिक उपभोग की खाद्य सामग्री से भरे हुए मद्भांड, औजार, बहुमूल्य मनकों के साथ अस्त्र व शस्त्रों के अलावा युद्ध रथ, योद्धाओं के शाही ताबूत, ताम्र निर्मित तलवारें, ढाल व योद्धा का कवच, वाणाग्र-तीर के आगे का हिस्सा, हेलमेट, सिराश्र आदि कीमती वस्तुएं यहां मिली थीं। सिनौली गांव में हुए उत्खनन में महाभारत कालीन राजकुमारी का कंकाल मिला। यह एक ट्रेंच में मिला। यह कंकाल ताबूत की ऊपरी सतह पर मौजूद था। इस ताबूत के समीप ही ताम्र निर्मित छोटी तलवार, दुर्लभ मिट्टी और तांबे के बर्तन मिले हैं।

काष्ठ का धनुष है अर्जुन के शौर्य का प्रतीक

पुरातत्व खुदाई से जुड़े मुल्तानी मल मोदी कॉलेज मोदीनगर के इतिहासकार डॉ. केके शर्मा ने बताया कि उत्खनन कार्य से महाभारत कालीन अनेक दुर्लभ वस्तुएं प्राप्त हुई हैं। इन्हीं में से एक है काष्ठ का धनुष, जिसे अर्जुन के शौर्य का प्रतीक माना जा सकता है। लकड़ी से निर्मित यह धनुष सैकड़ों वर्षों से जमीन में दफन होने के कारण मिट्टी का हो चुका था, लेकिन मिट्टी में इस धनुष की आकृति अभी भी उसी प्रकार से मौजूद रही। इस प्राचीन धनुष की आंतरिक और बाहरी मिट्टी को अलग करने के लिए उसे रासायनिक प्रक्रियाओं से सुरक्षित कर लिया गया है। इसके लिये दक्षिण भारत के एक प्रसिद्ध विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों की भी सहायता ली गयी। इसे दिल्ली ले जाया गया है।

डा. शर्मा का कहना है कि बागपत का उल्लेख महाभारत में मिलता है। पांडवों ने जो पांच गांव मांगे थे, उनमें एक बागपत भी था। कौरवों से संधि के लिए रथ से जाते समय श्री कृष्ण यहां पर रुके थे। यह हमारी वैदिक और महाभारत कालीन परंपरा का हिस्सा है। इससे इंकार नहीं किसा जा सकता है। सबसे बड़ी बात यह है कि सिनौली के पास यमुना नदी के किनारे अनेक पुरातात्विक टीले हैं, जहां सर्वेक्षण के दौरान चित्रित धूसर मृद्भांड प्राप्त हुए हैं, जो महाभारत काल के माने जाते हैं।

सिनौली को बनाया जाए पर्यटन गांव

पुरातत्व विभाग को उत्खनन के लिए अपना खेत देने वाले सादिकपुर सिनौली गांव के किसान सतेंदर सिंह मान ने कहा कि उन्हें इस बात की बहुत प्रसन्नता है कि उनके खेत में महाभारत कालीन बहुमूल्य पुरातात्विक अवशेष मिले हैं। इससे पहले भी गांव में हुए उत्खनन में बहुत से पुरातात्विक अवशेष मिल चुके हैं। उन्होंने कहा कि उनके गांव में म्यूजियम बने और गांव में मिले अब तक के सभी पुरा अवशेषों को लाकर इसमें रखा जाए, ताकि लोग आकर इसे देख सकें। सिनौली गांव को एक पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित किया जाए ताकि यहां रोजगार के अवसर उत्पन्न हो सकें।

बागपत शहर का प्राचीन इतिहास

बागपत शहर मूलरूप से व्यागप्रस्थ बाघों की भूमि के रूप में जाना जाता था। क्योंकि सदियों पहले यहां बाघों की आबादी पायी जाती थी। बागपत के नामकरण की इतिहास में कई किवदंतियां प्रचलित हैं। इनमें से एक किवदंती के अनुसार शहर का मूल नाम व्यागप्रस्थ था। महाभारत के पांडव भाइयों ने इसे स्थापित किया था। पांडवों को मारने के लिए दुर्योधन के कहने पर उसके मंत्री पुरोचना द्वारा बरनावा में मोम का महल लाक्षागृह बनवाया गया। यह स्थान बिनौली के पास बरनावा नामक स्थान पर स्थित है। दूसरी किवदंती के अनुसार इस शहर का नाम वाक्यप्रस्थ था, जिसका मतलब भाषण देने की जगह से है। इस तरह के शब्दों से प्रभावित होकर मुगलकाल में इस शहर का नाम बागपत रखा गया।

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हिन्दुस्थान समाचार / रामानुज शर्मा