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पांडेश्वर महादेव: जहां पांडवों ने अज्ञातवास में की थी स्वयंभू शिवलिंग की पूजा

 












द्वापर युग से जुड़ी है पड़िला महादेव की मान्यता, पंचकोशी परिक्रमा का प्रमुख पड़ाव है यह प्राचीन सिद्धपीठ

प्रयागराज, 24 अगस्त (हि.स.)।

तीर्थराज प्रयाग की धार्मिक और आध्यात्मिक परंपरा में पांडेश्वर महादेव, जिन्हें पड़िला महादेव के नाम से भी जाना जाता है, का विशेष महत्व है। फाफामऊ के पास थरवई क्षेत्र में स्थित यह प्राचीन मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। मान्यता है कि द्वापर युग में अज्ञातवास के दौरान पांडव यहां पहुंचे थे और उन्होंने स्वयंभू शिवलिंग की पूजा-अर्चना की थी। यही कारण है कि मंदिर का संबंध पांडवों से जुड़ा होने के कारण इसे पांडेश्वर महादेव के नाम से जाना जाता है।

मंदिर के पुजारी स्वामी गिरीशचन्द्रदास महाराज बताते हैं कि यह स्थान अत्यंत प्राचीन है। द्वापर युग से पहले यह क्षेत्र माधव मनोहर के नाम से जाना जाता था। मान्यता है कि इस पवित्र स्थल की स्थापना ब्रह्मा जी ने की थी। समय के साथ यहां परिवर्तन होते गए और एक समय यह क्षेत्र घने जंगल में बदल गया।

स्वामी गिरीशचन्द्र दास महाराज के अनुसार, द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण की सलाह पर पांडव अज्ञातवास के दौरान इस क्षेत्र में पहुंचे। रात्रि विश्राम के लिए स्थान की सफाई करते समय उन्हें स्वयंभू शिवलिंग और सिद्धपीठ के बारे में जानकारी हुई। इसके बाद पांचों पांडवों ने यहां पूजा-अर्चना की और कुछ समय यहां व्यतीत करने के बाद आगे चले गए। इसी धार्मिक मान्यता ने इस स्थान की महत्ता को और बढ़ा दिया।

पंचकोशी परिक्रमा का प्रमुख केंद्र

पांडेश्वर महादेव को प्रयाग की पंचकोशी परिक्रमा के उत्तर दिशा का प्रमुख केंद्र माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, यहां दर्शन और पूजन के बिना पंचकोशी परिक्रमा पूर्ण नहीं मानी जाती। महादेव के दर्शन के लिए प्रयागराज ही नहीं, बल्कि आसपास के जिलों और दूर-दराज के क्षेत्रों से भी श्रद्धालु पहुंचते हैं।

मंदिर परिसर में पहुंचने पर प्राचीन धार्मिक वातावरण और श्रद्धालुओं की आस्था सहज ही दिखाई देती है। यहां आने वाले भक्त भगवान शिव की पूजा-अर्चना कर अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति की प्रार्थना करते हैं।

राजा मानसिंह ने कराया था मंदिर का निर्माण

मंदिर के पुजारी स्वामी गिरीशादास

महाराज बताते हैं कि वर्तमान मंदिर का निर्माण राजस्थान के राजा मानसिंह ने कराया था। मंदिर के साथ ही तालाब का निर्माण भी उसी समय कराया गया था। सिद्धपीठ के रूप में इसकी मान्यता होने के कारण यहां श्रद्धालुओं की आस्था लगातार बढ़ती गई।

उन्होंने बताया कि कभी मंदिर की भूमि लगभग 51 बीघा में फैली हुई थी। वर्तमान में मुख्य मंदिर परिसर ही सुरक्षित है। मंदिर के आसपास समाज के विभिन्न वर्गों के लिए अलग-अलग धर्मशालाएं भी बनी हुई हैं, जिससे यहां आने वाले श्रद्धालुओं को ठहरने की सुविधा मिलती है।

विकास कार्यों से बढ़ी सुविधाएं, संरक्षण की भी जरूरत

मंदिर के पुजारी के अनुसार, प्रदेश सरकार की ओर से मंदिर के विकास के लिए धन उपलब्ध कराया गया और कुछ विकास कार्य भी हुए हैं। हालांकि, मंदिर के मूल एवं प्राचीन परिसर के संरक्षण और मरम्मत की अभी आवश्यकता है। उनका कहना है कि यदि प्राचीन स्वरूप को सुरक्षित रखते हुए मंदिर का व्यवस्थित विकास कराया जाए तो यह तीर्थस्थल और अधिक आकर्षण का केंद्र बन सकता है।

पांडेश्वर महादेव केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि प्रयाग की प्राचीन धार्मिक परंपरा, पांडवों से जुड़ी मान्यताओं और शिवभक्ति की समृद्ध विरासत का प्रतीक है। आधुनिक समय में भी यहां पहुंचने वाले श्रद्धालु इसी आस्था के साथ भगवान पांडेश्वर महादेव के दर्शन करते हैं और तीर्थराज प्रयाग की आध्यात्मिक परंपरा से जुड़ते हैं।

द्वादश माधव परंपरा से भी जुड़ा प्रयाग

तीर्थराज प्रयाग में भगवान विष्णु के द्वादश माधव स्वरूपों की भी प्राचीन धार्मिक परंपरा रही है। धार्मिक ग्रंथों में प्रयाग क्षेत्र की पवित्रता और तीर्थों की रक्षा के लिए भगवान विष्णु के विभिन्न माधव स्वरूपों की मान्यता मिलती है। दारागंज स्थित वेणी माधव को प्रयाग के प्रमुख आराध्य और नगर देवता के रूप में विशेष श्रद्धा प्राप्त है।

पांडेश्वर महादेव और द्वादश माधव की परंपरा प्रयाग की उस आध्यात्मिक विरासत को दर्शाती है, जिसमें भगवान शिव और भगवान विष्णु की आराधना एक-दूसरे के पूरक रूप में दिखाई देती है। यही धार्मिक समन्वय प्रयाग को सनातन आस्था की दृष्टि से विशिष्ट बनाता है।

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हिन्दुस्थान समाचार / रामबहादुर पाल