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बीएचयू की बड़ी उपलब्धि: बच्चों में होने वाली 47 दुर्लभ आनुवंशिक बीमारियों की पहचान

 




—अधिकांश रोग न्यूरोलॉजिकल विकार, 10 नए जीन वैरिएंट्स की भी खोज

वाराणसी, 16 जून (हि.स.)। काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के सेंटर फॉर जेनेटिक डिसऑर्डर्स की शोध टीम ने बच्चों में होने वाली 47 दुर्लभ आनुवंशिक बीमारियों की पहचान कर एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। इन बीमारियों में अधिकांश न्यूरोलॉजिकल विकार हैं, जबकि अन्य में न्यूरोमस्कुलर, नेत्र संबंधी, स्केलेटल तथा कार्डियक विकार शामिल हैं।

प्रोफेसर परिमल दास के नेतृत्व में संचालित “मिशन प्रोग्राम ऑन पीडियाट्रिक रेयर डिसऑर्डर्स” के तहत वाराणसी एवं आसपास के जिलों से 300 से अधिक दुर्लभ आनुवंशिक रोगों से पीड़ित बच्चों का पंजीकरण किया गया। अध्ययन के दौरान 47 दुर्लभ आनुवंशिक विकारों की पुष्टि की गई और 47 मरीजों को उनकी आनुवंशिक जांच रिपोर्ट उपलब्ध कराई गई। शोध के दौरान 10 नए जीन वैरिएंट्स की भी खोज की गई है।

यह परियोजना भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के जैव प्रौद्योगिकी विभाग (डीबीटी) द्वारा समर्थित एक अखिल भारतीय अनुसंधान कार्यक्रम का हिस्सा है। मंगलवार को प्रो. परिमल दास ने यह जानकारी दी। उन्होंने बताया कि परियोजना से जुड़े परिवारों को निःशुल्क आनुवंशिक परीक्षण, परामर्श तथा निदान के बाद विशेषज्ञ चिकित्सकीय सलाह उपलब्ध कराई गई। साथ ही, कई परिवारों को आनुवंशिक रोगों से जुड़ी सामाजिक, सांस्कृतिक और भावनात्मक चुनौतियों के समाधान के लिए विशेष परामर्श भी प्रदान किया गया।

उन्होंने बताया कि शोध कार्यक्रम ने सामुदायिक जागरूकता को भी प्राथमिकता दी है। वर्ष 2023 से अब तक वाराणसी और आसपास के क्षेत्रों में दुर्लभ आनुवंशिक रोगों पर पांच जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जा चुके हैं। इन कार्यक्रमों का उद्देश्य आमजन को आनुवंशिक विकारों के प्रति जागरूक करना और उनसे जुड़ी भ्रांतियों को दूर करना रहा है। इसके अतिरिक्त, 100 से अधिक चिकित्सकों, रेजिडेंट डॉक्टरों और नर्सिंग कर्मियों को विशेष प्रशिक्षण भी दिया गया है। शोधकर्ता डॉ. ऋतु दीक्षित और सुश्री दीपिका मारू वर्ष 2024 से मरीजों के पंजीकरण, आनुवंशिक परामर्श, जेनेटिक डेटा विश्लेषण और जनजागरूकता अभियानों में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।

परियोजना के सह-प्रधान अन्वेषक डॉ. अशोक कुमार ने कहा कि किसी दुर्लभ रोग के आनुवंशिक कारण की पुष्टि होने से अभिभावकों की अनिश्चितता दूर होती है और उन्हें बीमारी के वास्तविक कारण की जानकारी मिलती है। सही निदान के अभाव में परिवारों को कई चिकित्सकों के पास जाना पड़ता है, जिससे समय और धन दोनों की हानि होती है। उन्होंने कहा कि सटीक आनुवंशिक निदान भविष्य में परिवार नियोजन और गर्भधारण संबंधी निर्णय लेने में भी सहायक सिद्ध होता है।

डॉ. अशोक कुमार के अनुसार, यह परियोजना दुर्लभ बाल्यकालीन रोगों के आनुवंशिक कारणों संबंधी महत्वपूर्ण आंकड़े उपलब्ध करा रही है, जो नीति-निर्माताओं को समुदाय स्तर पर आनुवंशिक विकारों की रोकथाम और प्रबंधन के लिए प्रभावी रणनीति तैयार करने में मदद करेंगे।

शोधकर्ताओं का मानना है कि यह पहल देश के उपेक्षित क्षेत्रों तक जीनोमिक चिकित्सा की पहुंच बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। साथ ही, यह भारत में दुर्लभ रोगों के निदान और उपचार व्यवस्था को नई दिशा देने की क्षमता रखती है।

हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी