बीएचयू के वैज्ञानिकों की बड़ी उपलब्धि : मल्टी-ओमिक्स तकनीक से जन्मजात दंत-अभाव के आनुवंशिक रहस्यों का खुलासा
वाराणसी, 29 जून (हि.स.)। उत्तर प्रदेश के वाराणसी स्थित काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस स्थित सेंटर फॉर जेनेटिक डिसऑर्डर्स के वैज्ञानिकों ने जन्मजात दंत-अभाव (कनजेनिटल टूथ एजुनीसिस सीटीए) के आनुवंशिक एवं आणविक आधार को समझने की दिशा में महत्वपूर्ण सफलता हासिल की है। इस शोध के निष्कर्ष अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका में प्रकाशित हुए हैं, जिससे दंत रोगों की प्रारंभिक पहचान, जोखिम मूल्यांकन और सटीक उपचार (प्रिसिजन मेडिसिन) के नए रास्ते खुलने की उम्मीद है।
यह शोध कार्य डॉ. प्रशांत रंजन ने बीएचयू में पीएचडी के दौरान प्रोफेसर परिमल दास के निर्देशन में किया। वर्तमान में डॉ. रंजन अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), नई दिल्ली में प्रोजेक्ट रिसर्च साइंटिस्ट-II के पद पर कार्यरत हैं।
शोधकर्ताओं ने होल एक्सोम सीक्वेंसिंग, ट्रांसक्रिप्टोमिक्स, प्रोटीन संरचना विश्लेषण और बायोइन्फॉर्मेटिक्स जैसी अत्याधुनिक इंटीग्रेटिव मल्टी-ओमिक्स तकनीकों का उपयोग कर जन्मजात दंत-अभाव से जुड़े जटिल आणविक तंत्रों का गहन अध्ययन किया। इस दौरान कई नए तथा पहले से ज्ञात आनुवंशिक परिवर्तनों (जेनेटिक वेरिएंट्स) की पहचान की गई।
अध्ययन की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि OR4F21 (ऑल-फ़ैक-टरी रिसेप्टर फ़ैमिली फ़ोर, सब-फ़ैमिली एफ, मेंबर 21) जीन को पहली बार जन्मजात दंत-अभाव से संभावित रूप से जोड़ना है। यह जीन गुणसूत्र-15 के 15q11.2 क्षेत्र में स्थित है और इसकी पहचान दंत आनुवंशिकी के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण खोज मानी जा रही है। इसके अलावा EDA, WNT10A, PAX9 और TSPEAR जैसे दंत-विकास से जुड़े प्रमुख जीनों में भी रोग-संबंधित परिवर्तनों की पुष्टि और विस्तृत विश्लेषण किया गया।
शोध में यह भी सामने आया कि जन्मजात दंत-अभाव केवल दांतों तक सीमित विकार नहीं है, बल्कि इसका संबंध कई अन्य सिस्टमिक बीमारियों से भी हो सकता है। इंटीग्रेटिव मल्टी-ओमिक्स विश्लेषण के माध्यम से शोधकर्ताओं ने दंत-अभाव से जुड़े जीनों और अन्य रोगों के बीच महत्वपूर्ण आणविक संबंधों की पहचान की है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह खोज भविष्य में रोगों की शीघ्र पहचान, जोखिम आकलन और व्यक्तिगत उपचार रणनीतियों के विकास में सहायक सिद्ध हो सकती है।
अध्ययन के दौरान यह भी पाया गया कि कई आनुवंशिक परिवर्तन जीन अभिव्यक्ति के साथ-साथ प्रोटीन की स्थिरता और कार्यक्षमता को भी प्रभावित करते हैं। विशेष रूप से OR4F21 p.(Lys310Arg) तथा MRTFB p.(Ala135=) वेरिएंट अध्ययन में शामिल सभी जन्मजात दंत-अभाव रोगियों में पाए गए, जिससे इनके रोगजनन में संभावित योगदान के महत्वपूर्ण संकेत मिले हैं।
प्रोफेसर परिमल दास ने बताया कि उन्होंने अमेरिका में पोस्टडॉक्टोरल शोध के दौरान प्रोफेसर प्रग्ना आई. पटेल के साथ मिलकर वर्ष 2000 में प्रकाशित ऐतिहासिक शोध में PAX9 जीन और जन्मजात दंत-अभाव के बीच संबंध स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका नेचर जेनेटिक्स में प्रकाशित उस अध्ययन ने मानव दंत-विकास की आनुवंशिकी को समझने की दिशा में नई राह खोली थी। वर्तमान शोध उसी वैज्ञानिक विरासत को आधुनिक मल्टी-ओमिक्स तकनीकों के माध्यम से आगे बढ़ाता है।
इस शोध की सफलता में बीएचयू के इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज के चिकित्सकों डॉ. नेहा वर्मा, डॉ. राजेश बंसल और डॉ. विनय कुमार श्रीवास्तव का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा। उन्होंने रोगियों की पहचान, नैदानिक मूल्यांकन, दंत-लक्षणों के विश्लेषण तथा जीन-फेनोटाइप संबंधों की स्थापना में अहम भूमिका निभाई। वहीं, डॉ. चंद्रा देवी ने प्रयोगात्मक कार्य, डेटा विश्लेषण, परिणामों की व्याख्या और मल्टी-ओमिक्स डेटा के एकीकरण में उल्लेखनीय योगदान दिया। शोधार्थी रिमझिम कुमारी भी इस अध्ययन को आगे बढ़ाने में सक्रिय रूप से जुड़ी हुई हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह शोध जन्मजात दंत-अभाव की बेहतर समझ विकसित करने के साथ-साथ भविष्य में आनुवंशिक जांच, शीघ्र निदान और व्यक्तिगत उपचार पद्धतियों के विकास की दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकता है।
हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी