सौभाग्यवती स्त्रियों के लिए होता है वटसावित्री व्रत : आचार्य धर्मेंद्रनाथ
सुपौल, 10 मई (हि.स.)। गोसपुर निवासी पंडित आचार्य धर्मेंद्रनाथ मिश्र ने बताया कि इस वर्ष वट सावित्री व्रत 16 मई, शनिवार को मनाया जाएगा।
इस बार यह पर्व शनैश्चरी अमावस्या के दुर्लभ संयोग में पड़ रहा है, जिसे अत्यंत शुभ और फलदायी माना जा रहा है। उन्होंने कहा कि इस दिन विधि-विधान से पूजन करने पर सौभाग्यवती स्त्रियों एवं नव दंपतियों को समस्त मनोरथों की प्राप्ति होती है।
आचार्य मिश्र ने बताया कि व्रत, पर्व और त्योहारों की परंपरा हमारे प्राचीन ऋषि-महर्षियों एवं विद्वानों द्वारा स्थापित की गई है। ज्येष्ठ मास की कृष्ण पक्ष अमावस्या को मनाया जाने वाला वट सावित्री व्रत विशेष रूप से सुहागिन महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। देशभर में महिलाएं पूरी श्रद्धा और निष्ठा के साथ यह व्रत करती हैं।
मान्यता है कि इस व्रत को विधिपूर्वक करने से पति की दीर्घायु, सुख-समृद्धि और संतान सुख की प्राप्ति होती है।उन्होंने वट सावित्री व्रत की कथा का उल्लेख करते हुए बताया कि भद्र देश के निःसंतान राजा अश्वपति ने अपनी पत्नी के साथ सावित्री देवी का व्रत और पूजन किया, जिसके फलस्वरूप उन्हें एक तेजस्वी कन्या की प्राप्ति हुई।कन्या आगे चलकर सावित्री कहलायी।
युवावस्था में सावित्री ने महाराज द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान को अपने पति के रूप में चुना। देवर्षि नारद ने सावित्री को बताया कि सत्यवान की आयु केवल एक वर्ष शेष है, लेकिन सावित्री अपने निर्णय पर अडिग रहीं और सत्यवान से विवाह किया। विवाह के बाद एक दिन सत्यवान जंगल में लकड़ी काटने गए, जहां अचानक उनकी तबीयत बिगड़ गई। सावित्री उन्हें गोद में लेकर बैठी थीं, तभी यमराज उनके प्राण लेकर चल पड़े।
सावित्री भी यमराज के पीछे-पीछे चलने लगीं। कई बार समझाने के बावजूद जब सावित्री नहीं रुकीं, तो उनकी पतिव्रता निष्ठा और धर्मपरायणता से प्रसन्न होकर यमराज ने सत्यवान को पुनः जीवनदान और दीर्घायु का वरदान दिया।
आचार्य धर्मेंद्रनाथ मिश्र ने कहा कि तभी से यह व्रत वट सावित्री के रूप में पूरे देश में मनाया जाता है और इसे अखंड सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है।
उन्होंने बताया कि इस वर्ष पूजन का शुभ मुहूर्त प्रातः 7 बजकर 5 मिनट से दोपहर 1 बजकर 40 मिनट तक रहेगा। इसमें प्रथम मुहूर्त को अत्यंत विशेष और शुभ माना गया है।
हिन्दुस्थान समाचार / विनय कुमार मिश्र