कम बरसात से घटा राजस्थान के बांधों का जलस्तर, अगले वर्ष पेयजल और सिंचाई पर बढ़ी चिंता
जयपुर, 07 अक्टूबर (हि.स.)। इस वर्ष मानसून के दौरान सामान्य से कम वर्षा का असर अब राजस्थान के बांधों में स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। प्रदेश के जल संसाधन विभाग की ओर से इस सप्ताह जारी नवीनतम आंकडाें के अनुसार प्रदेश के 693 बड़े, मध्यम और छोटे बांधों में कुल जल भंडारण क्षमता का केवल 61.90 प्रतिशत पानी ही उपलब्ध है, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह आंकड़ा 90.69 प्रतिशत था। यानी एक वर्ष में जल भंडारण में लगभग उनतीस प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। जल संसाधन विभाग के ताजा आंकड़े बताते हैं कि राज्य के प्रमुख जलाशयों में पानी की उपलब्धता कम होने से अगले वर्ष पेयजल और सिंचाई व्यवस्था को लेकर चिंता बढ़ सकती है, हालांकि राज्य सरकार का दावा है कि जल प्रबंधन और संरक्षण के प्रयासों के कारण किसी प्रकार का संकट उत्पन्न नहीं होने दिया जाएगा।
राज्य के कुल 693 बांधों की कुल क्षमता 13,029.09 मिलियन घन मीटर (एमक्यूम) है, जिसके मुकाबले वर्तमान में 8,064.59 एमक्यूम पानी उपलब्ध है। पिछले वर्ष 6 अक्टूबर 2025 को यही भंडारण 11,815.83 एमक्यूम था। हालांकि मानसून शुरू होने से पहले 15 जून 2026 को बांधों में केवल 44.46 प्रतिशत पानी था, जो अब बढ़कर 61.90 प्रतिशत तक पहुंचा है, लेकिन यह वृद्धि सामान्य वर्षों की तुलना में कम मानी जा रही है।
प्रदेश के 23 बड़े बांधों की स्थिति भी चिंता बढ़ाने वाली है। इन प्रमुख बांधों की कुल क्षमता 8,196.75 एमक्यूम है, जबकि इनमें वर्तमान में 5,583.35 एमक्यूम पानी यानी 68.12 प्रतिशत भंडारण है। पिछले वर्ष इसी अवधि में इन बांधों में लगभग 96 प्रतिशत के आसपास जल उपलब्ध था।
राजस्थान के कई बड़े जलाशयों में जल स्तर सामान्य से काफी नीचे है। प्रदेश के सबसे बड़े जलाशयों में शामिल काेटा के राणा प्रताप सागर में 72.21 प्रतिशत, बांसवाड़ा के माही बजाज सागर में 65.95 प्रतिशत और तीन जिलाें राजधानी जयपुर, अजमेर और टाेंक की लाइफ लाइन और गत वर्ष ओवरफ्लाे हुए बीसलपुर बांध में 71.84 प्रतिशत पानी उपलब्ध है। वहीं, पाली के जवाई बांध में केवल 19.27 प्रतिशत, भीलवाड़ा के मेजा बांध में 29.98 प्रतिशत और जयपुर के रामगढ़ बांध में पानी शून्य है। जयपुर क्षेत्र का छापरवाड़ा बांध भी मात्र 10.92 प्रतिशत और कालाख सागर केवल 2.98 प्र तिशत क्षमता तक भरा हुआ है। वहीं पूर्वी राजस्थान में अच्छी बरसात का असर बांधाें की भराव क्षमता पर दिखाई दिया है। दाैसा का मोरेल बांध पूरी क्षमता के साथ 100 प्रतिशत भरा हुआ है, जबकि धाैलपुर का पार्वती बांध 97.56 प्रतिशत और कोटा बैराज 98.41 प्रतिशत क्षमता पर है।
क्षेत्रवार आंकड़े भी जल संकट की आशंका को दर्शाते हैं। कोटा संभाग में सबसे अधिक 77.33 प्रतिशत जल भंडारण है, जबकि बांसवाड़ा क्षेत्र में 67.28 प्रतिशत और जयपुर क्षेत्र में 59.31 प्रतिशत पानी उपलब्ध है। उदयपुर क्षेत्र में यह 47.09 प्रतिशत तथा भरतपुर क्षेत्र में 52.75 प्रतिशत है। सबसे चिंताजनक स्थिति जोधपुर क्षेत्र की है, जहां बांधों में केवल 15.67 प्रतिशत पानी बचा है। पश्चिमी राजस्थान में कम वर्षा और सीमित जल स्रोतों के कारण यह स्थिति भविष्य में पेयजल और सिंचाई के लिए चुनौती बन सकती है।
आंकड़ों के अनुसार, प्रदेश के 693 बांधों में से 215 बांध पूरी तरह खाली हैं, जबकि 379 बांध आंशिक रूप से भरे हुए हैं। केवल 99 बांध ही पूरी क्षमता तक भर पाए हैं। इससे स्पष्ट है कि इस वर्ष मानसून राज्य के अधिकांश जलाशयों को पूरी तरह नहीं भर सका।
उधर राज्य सरकार का कहना है कि जल संरक्षण, पारंपरिक जल स्रोतों के पुनर्जीवन, तालाबों के गहरीकरण और वर्षा जल संचयन जैसे उपायों से स्थिति को नियंत्रित किया जाएगा। जल संसाधन मंत्री सुरेश रावत के अनुसार इस बार प्रदेश में मानसून वर्षा का वितरण समान नहीं रहा है। राजस्थान की भौगोलिक एवं प्राकृतिक परिस्थितियों के कारण कहीं अधिक वर्षा हुई, तो कहीं अपेक्षाकृत कम वर्षा हुई, जिसके कारण कुछ क्षेत्रों में बांधों में जलभराव कम रहा। यह एक प्राकृतिक एवं भौगोलिक परिस्थिति है, जिसमें वर्ष-दर-वर्ष बदलाव होता रहता है।
लेकिन राजस्थान सरकार इस चुनौती को केवल वर्तमान की समस्या के रूप में नहीं देख रही, बल्कि लॉन्ग टर्म विज़न के साथ काम कर रही है, ताकि आज ही नहीं, भविष्य में भी ऐसी परिस्थितियों का बेहतर समाधान सुनिश्चित किया जा सके।
इसी सोच के तहत राजस्थान में वृहद स्तर पर जल प्रबंधन और जल संरक्षण के कई महत्वपूर्ण कार्य किए जा रहे हैं।
उन्हाेंने बताया कि राजस्थान वॉटर ग्रिड की परिकल्पना इसी दिशा में एक बड़ा कदम है। रामजल सेतु परियोजना, यमुना जल समझौता और पार्वती-कालीसिंध-चंबल (पीकेसी) लिंक जैसे महत्वपूर्ण प्रयास इसी व्यापक विज़न का हिस्सा हैं।
इसके साथ ही, लंबे समय से लंबित अंतर्राज्यीय जल समझौतों को आगे बढ़ाने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कार्य हुए हैं। हमारा लक्ष्य केवल आज की समस्या का समाधान करना नहीं है, बल्कि ऐसा मजबूत और दीर्घकालिक जल प्रबंधन तंत्र विकसित करना है, जिससे राजस्थान में आने वाली पीढ़ियों के लिए भी पानी की उपलब्धता सुनिश्चित हो और वर्षा की अनिश्चितता का प्रभाव कम से कम हो।
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हिन्दुस्थान समाचार / संदीप