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वंदे मातरम् को 'हिन्दू सांप्रदायिक रुदन' माना मुस्लिम लीग ने, 1909 से हाेने लगा था विराेध

 


नई दिल्ली, 21 अगस्त (हि.स.)। बंगाल के महाकवि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने ब्रिटिश शासन की महारानी के सम्मान में गाये जाने वाले गीत से क्षुब्ध होकर देश के राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् की रचना की थी और इससे सबसे पहले सार्वजनिक रूप से गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर ने स्वरों से सजाया था और अपनी जादुई आवाज़ एवं विशेष धुन के साथ गाकर देशभर के नेताओं एवं स्वतंत्रता सेनानियों को अंदर तक झकझोर दिया था, लेकिन मुस्लिम लीग ने इसे हिन्दू सांप्रदायिेक रुदन करार दिया और इसके बाद पंडित जवाहरलाल नेहरू भी दबाव में आकर इसका अंगभंग करने पर सहमत हो गये।

दरअसल 'वंदे मातरम्' की रचना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 7 नवंबर 1875 को की थी। उस समय वह ब्रिटिश शासन के अधीन हुगली में जिला मजिस्ट्रेट के पद पर कार्यरत थे। सरकारी कार्यालयों में गाए जाने वाले ब्रिटिश राष्ट्रगान 'गॉड सेव द क्वीन' (ईश्वर ब्रिटिश महारानी की रक्षा करे) की अनिवार्यता से उनके मन में गहरा क्षोभ था। इसी के जवाब में उन्होंने एक ऐसे गीत की रचना की जो भारतीयों में अपनी मातृभूमि के प्रति अगाध प्रेम और स्वाभिमान जगा सके। उन्होंने बंगाल की प्राकृतिक सुंदरता, जैसे कि हरे-भरे खेतों, मीठे जल और शीतल हवाओं को एक ममतामयी मां के रूप में देखा और संस्कृत एवं बांग्ला भाषा के अद्भुत मिश्रण से इस गीत के शुरुआती दो पदों को कागज़ पर उकेरा। शुरुआत में उनके अपने करीबियों ने भी इस गीत को बहुत लंबा और कठिन मानकर पसंद नहीं किया था। बंकिम चंद्र ने तब दृढ़ता से कहा था कि भले ही आज इसे कोई न समझे, लेकिन एक समय ऐसा आएगा जब पूरा देश इस गीत के आगे शीश झुकाएगा। उनकी यह भविष्यवाणी सच साबित हुई जब साल 1882 में उन्होंने इस गीत को अपने क्रांतिकारी उपन्यास 'आनंदमठ' में शामिल किया। इस उपन्यास के माध्यम से यह गीत जन-जन तक पहुंचा और आगे चलकर देश की आजादी का मुख्य जयघोष बन गया।

'वंदे मातरम्' का पहला सार्वजनिक और राजनीतिक गायन दिसंबर 1896 में कलकत्ता (अब कोलकाता) के बीड़न स्क्वायर पर आयोजित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 12वें अधिवेशन में हुआ था। इस ऐतिहासिक सत्र की अध्यक्षता रहमतुल्लाह एम. सयानी ने की थी। इस गरिमामयी अवसर पर गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने स्वयं इस पूरे गीत को अपनी जादुई आवाज में स्वरबद्ध करके गाया था। टैगोर ने इस गीत के लिए एक विशेष और गंभीर धुन तैयार की थी, जिसने वहां उपस्थित देश के कोने-कोने से आए प्रबुद्ध नेताओं और स्वतंत्रता सेनानियों को गहरे तक झकझोर दिया। यह भारत के इतिहास में पहला ऐसा राजनीतिक अवसर था, जब इस गीत को सामूहिक चेतना जगाने के लिए सार्वजनिक मंच से प्रस्तुत किया गया।

टैगोर के इस प्रतिष्ठित गायन ने 'वंदे मातरम्' को रातों-रात एक राष्ट्रीय पहचान दे दी और इसे कांग्रेस के सांस्कृतिक एवं राजनीतिक आंदोलनों के मुख्य स्तंभ के रूप में स्थापित कर दिया। इस ऐतिहासिक घटना के बाद ही यह गीत धीरे-धीरे हर स्वतंत्रता सेनानी का मंत्र और ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ प्रतिरोध की सबसे बुलंद आवाज बन गया।

1. अ.भा. मुस्लिम लीग द्वारा वंदे मातरम् के विरोध का घटनाक्रम नीचे विस्तृत रूप से प्रस्तुत है-

अमृतसर अधिवेशन और विरोध की शुरुआत-

'वंदे मातरम्' के खिलाफ मुस्लिम लीग का सबसे पहला और आधिकारिक विरोध साल दर्ज किया गया था। दिसंबर 1908 के अंत में शुरू होकर जनवरी 1909 तक चले मुस्लिम लीग के दूसरे राष्ट्रीय अधिवेशन (अमृतसर) में पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष सैयद अली इमाम ने इस गीत पर गहरी आपत्ति जताई थी। उन्होंने खुले मंच से 'वंदे मातरम्' को एक सांप्रदायिक रुदन करार दिया था। लीग का प्राथमिक तर्क यह था कि इस गीत के उत्तरार्ध में मातृभूमि की तुलना हिंदू देवियों (दुर्गा और लक्ष्मी) से की गई है, जो इस्लाम के एकेश्वरवाद (तौहीद) के सिद्धांतों के खिलाफ है क्योंकि इस्लाम में अल्लाह के अलावा किसी और की इबादत या वंदना वर्जित मानी गई है।

काकीनाडा गतिरोध और बढ़ता वैचारिक मतभेद-

समय के साथ यह धार्मिक मतभेद राजनीतिक मंचों पर भी दिखने लगा, जिसका एक बड़ा उदाहरण साल 1923 के कांग्रेस के काकीनाडा अधिवेशन में सामने आया। हालांकि यह कांग्रेस का अधिवेशन था, लेकिन इसके अध्यक्ष मुस्लिम लीग की विचारधारा से जुड़े और खिलाफत आंदोलन के प्रमुख नेता मौलाना मोहम्मद अली जौहर थे। जब पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर परंपरा के अनुसार मंच पर वंदे मातरम् गाने के लिए खड़े हुए, तो मौलाना मोहम्मद अली ने इस पर यह कहते हुए कड़ा विरोध जताया कि इस्लाम में संगीत की मनाही है और यह गीत उनकी धार्मिक भावनाओं को आहत करता है। पलुस्कर ने उनके विरोध को खारिज करते हुए गीत पूरा किया, लेकिन इस घटना ने यह साफ कर दिया कि मुस्लिम नेतृत्व के भीतर इस गीत को लेकर असंतोष गहराता जा रहा था।

राजनीतिक टकराव और जिन्ना का कड़ा रुख-

साल 1937 के प्रांतीय चुनावों के बाद जब देश के कई प्रांतों में कांग्रेस की सरकारें बनीं और विधानसभा की कार्यवाही की शुरुआत में 'वंदे मातरम्' का गायन अनिवार्य किया जाने लगा, तब यह विवाद अपने चरम पर पहुंच गया। मुस्लिम लीग के नेता मोहम्मद अली जिन्ना ने इसके खिलाफ मोर्चा खोल दिया। 15 अक्टूबर 1937 को लखनऊ में मुस्लिम लीग के वार्षिक अधिवेशन के दौरान जिन्ना ने कांग्रेस सरकारों द्वारा इस गीत को लागू करने की नीति की तीखी आलोचना की। इसके बाद 01 मार्च 1938 को लाहौर के 'द न्यू टाइम्स' अखबार में छपे अपने एक लेख में जिन्ना ने स्पष्ट घोषणा की कि पूरे भारत के मुसलमानों ने वंदे मातरम् या इसके किसी भी संशोधित संस्करण को एक बाध्यकारी राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार करने से पूरी तरह इनकार कर दिया है।

पीरपुर समिति रिपोर्ट और विवाद का पटाक्षेप-

साल 1938 के अंत में राजा सैयद मोहम्मद मेहदी द्वारा तैयार की गई मुस्लिम लीग की 'पीरपुर समिति रिपोर्ट' में इस विवाद को आधिकारिक तौर पर प्रलेखित किया गया। इस रिपोर्ट में कांग्रेस शासित राज्यों में मुसलमानों पर होने वाले कथित राजनीतिक और सांस्कृतिक अत्याचारों की एक सूची तैयार की गई थी, जिसमें वंदे मातरम् को जबरन थोपे जाने को मुस्लिम पहचान पर एक बड़ा हमला बताया गया था। अक्टूबर 1938 में कराची में हुए सिंध प्रांतीय मुस्लिम लीग सम्मेलन में जिन्ना ने पुनः दोहराया कि यह गीत मूल रूप से गैर-मुस्लिम भावनाओं से प्रेरित है। इस गतिरोध को सुलझाने के लिए आखिरकार अक्टूबर 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति ने रवींद्रनाथ टैगोर की सलाह पर एक प्रस्ताव पारित किया। इसके तहत गीत के अंतिम छंदों को हटाकर केवल शुरुआती दो पदों (जिसमें केवल प्राकृतिक सुंदरता की अमूर्त वंदना थी) को ही आधिकारिक दर्जा दिया गया, ताकि सांप्रदायिक सौहार्द बना रहे।

पटना अधिवेशन-

अखिल भारतीय मुस्लिम लीग द्वारा साल 1938 के अंत में जारी की गई राजा सैयद मोहम्मद मेहदी (पीरपुर के राजा) की अध्यक्षता वाली पीरपुर समिति की रिपोर्ट ने वंदे मातरम् विवाद को एक नया मोड़ दे दिया। दिसंबर 1938 में पटना में आयोजित मुस्लिम लीग के 26वें वार्षिक अधिवेशन के दौरान इस रिपोर्ट के निष्कर्षों को प्रमुखता से पेश किया गया था। इस विस्तृत दस्तावेज़ में कांग्रेस-शासित प्रांतों में मुसलमानों पर होने वाले कथित सांस्कृतिक और राजनीतिक अत्याचारों की एक सूची तैयार की गई थी। रिपोर्ट में आरोप लगाया गया कि विधानसभाओं और स्कूलों में वंदे मातरम् के गायन को अनिवार्य करना मुस्लिम पहचान पर सीधा हमला और बहुसंख्यकवादी एजेंडे को थोपने जैसा था। लीग ने दलील दी कि कांग्रेस द्वारा गीत को छोटा किए जाने के बाद भी इसका मूल चरित्र नहीं बदला और इसे एक ऐसा नफरत का गान बताया गया जो मूल रूप से मुस्लिम विरोधी भावनाओं से प्रेरित था। इस रिपोर्ट और पटना अधिवेशन के प्रस्तावों ने मुस्लिम समुदाय के भीतर इस वैचारिक दूरी को और गहरा कर दिया, जिसका इस्तेमाल आगे चलकर लीग ने द्विराष्ट्र सिद्धांत और पाकिस्तान की मांग को न्यायसंगत ठहराने के लिए एक प्रमुख राजनीतिक हथियार के रूप में किया।

2. गीत को छोटा करने में नेहरू की भूमिका-

अक्टूबर 1937 में मुस्लिम लीग के लखनऊ अधिवेशन के बाद मोहम्मद अली जिन्ना के कड़े विरोध के सामने जवाहरलाल नेहरू द्वारा वंदे मातरम् विवाद को संभालने के तरीके की इतिहासकारों द्वारा तीखी आलोचना की जाती है। आलोचकों का मानना है कि नेहरू का यह कदम सांप्रदायिक तुष्टीकरण और दबाव के आगे घुटने टेकने की राजनीति का एक शुरुआती उदाहरण था, जिसने राष्ट्रीय प्रतीकों के साथ समझौता करने की परंपरा शुरू की। इस पूरे घटनाक्रम और नेहरू की भूमिका का आलोचनात्मक विश्लेषण नीचे दिया गया है-

सुभाष चंद्र बोस के साथ पत्राचार और नेहरू का विरोधाभास-

लखनऊ अधिवेशन के तुरंत बाद जहां मुस्लिम लीग ने इस गीत के खिलाफ राष्ट्रव्यापी अभियान शुरू किया था, नेहरू इसे लेकर बेहद रक्षात्मक हो गए। उस समय सुभाष चंद्र बोस ने नेहरू को पत्र लिखकर सुझाव दिया कि सांप्रदायिक गतिरोध को दूर करने के लिए गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की सलाह ली जानी चाहिए।

20 अक्टूबर 1937 को बोस को लिखे अपने जवाब में नेहरू का गहरा विरोधाभास सामने आया। एक तरफ तो नेहरू ने माना कि यह विरोध सांप्रदायिक ताकतों द्वारा जानबूझकर खड़ा किया गया है, लेकिन दूसरी तरफ उन्होंने बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास 'आनंदमठ' का अंग्रेजी अनुवाद पढ़ने के बाद यह भी मान लिया कि इस गीत की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि मुसलमानों को नाराज करने वाली हो सकती है। आलोचक नेहरू की इस बात के लिए सबसे ज्यादा आलोचना करते हैं कि उन्होंने देश के सबसे प्रतिष्ठित स्वतंत्रता मंत्र को एक सांप्रदायिक और मजहबी चश्मे से देखना स्वीकार कर लिया, जिससे परोक्ष रूप से जिन्ना के दावों को ही मजबूती मिली।

रवींद्रनाथ टैगोर के साथ बैठक और उनके प्रभाव का इस्तेमाल-

मुस्लिम लीग के दबाव से बाहर निकलने और एक सुरक्षित रास्ता खोजने के लिए नेहरू 25 अक्टूबर 1937 को कलकत्ता (अब कोलकाता) गए और रवींद्रनाथ टैगोर से मुलाकात की। 26 अक्टूबर 1937 को टैगोर ने नेहरू को एक पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने कहा कि गीत के शुरुआती दो पदों में केवल मातृभूमि की प्राकृतिक सुंदरता का वर्णन है, लेकिन बाद के पदों में दुर्गा और लक्ष्मी जैसी हिंदू देवियों का स्पष्ट संदर्भ है। टैगोर ने तर्क दिया कि किसी गैर-हिंदू समुदाय से इन पदों को गाने की उम्मीद करना उनकी धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचा सकता है।

नेहरू ने टैगोर के इस सांस्कृतिक कद और प्रभाव का इस्तेमाल अपने राजनैतिक समझौते को सही ठहराने के लिए एक ढाल के रूप में किया, ताकि कांग्रेस के भीतर इस फैसले का विरोध न हो सके।

कांग्रेस कार्यसमिति द्वारा गीत का अंगभंग-

टैगोर की इस राय को हथियार बनाकर नेहरू ने कलकत्ता में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक का रुख पूरी तरह से बदल दिया। 29 अक्टूबर 1937 को नेहरू के नेतृत्व में सीडब्ल्यूसी ने एक विवादास्पद प्रस्ताव पारित किया, जिसके तहत 'वंदे मातरम्' को छोटा कर दिया गया और घोषणा की गई कि राष्ट्रीय मंचों पर केवल इसके शुरुआती दो पदों को ही गाया जाएगा। नेहरू ने सार्वजनिक रूप से इस गंभीर काट-छांट का बचाव करते हुए कहा कि गीत के बाकी हिस्सों में ऐसी विचारधारा, कल्पना और रूपक हैं जिन्हें विभिन्न समूहों के लोग स्वीकार नहीं कर सकते। इस नीति को लागू करने के लिए नेहरू, सुभाष चंद्र बोस और मौलाना अबुल कलाम आजाद की एक उप-समिति भी बनाई गई।

1937 का मूल कांग्रेस प्रस्ताव -

अक्टूबर 1937 में कलकत्ता में जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता और निर्देशन में कांग्रेस कार्यसमिति ने वंदे मातरम् पर एक आधिकारिक प्रस्ताव पारित किया था। इस प्रस्ताव में राजनीति और धर्म के घालमेल को रोकने की कोशिश की गई थी, जिसे आलोचक कांग्रेस का पहला बड़ा वैचारिक आत्मसमर्पण मानते हैं।

प्रस्ताव का मुख्य अंश: प्रस्ताव में स्पष्ट रूप से लिखा गया- कार्यसमिति यह मानती है कि स्वतंत्रता की लड़ाई में वंदे मातरम् एक शक्तिशाली मंत्र रहा है और इसके साथ देश का गहरा भावनात्मक लगाव है, लेकिन सांप्रदायिक सौहार्द को बनाए रखने के लिए कांग्रेस यह निर्णय लेती है कि भविष्य में किसी भी राष्ट्रीय या सार्वजनिक मंच पर केवल इस गीत के शुरुआती दो पदों को ही गाया जाएगा।

गीत को छोटा करने का तर्क- प्रस्ताव में आगे कहा गया कि गीत के शुरुआती दो पदों में केवल मातृभूमि की प्राकृतिक सुंदरता (सुजलाम्, सुफलाम्) का अमूर्त वर्णन है, जिसमें किसी भी धार्मिक मूर्तिपूजा या देवी-देवताओं का संदर्भ नहीं है। इसलिए यह हिस्सा सभी धर्मों के लोगों के लिए स्वीकार्य होना चाहिए।

बचे हुए हिस्से पर सेंसर: प्रस्ताव के अंतिम हिस्से में यह निर्देश दिया गया कि यदि कोई व्यक्ति या आयोजक इन दो पदों के आगे का हिस्सा गाना चाहता है, तो उसे तब तक इसकी अनुमति नहीं होगी जब तक कि वहां उपस्थित सभी समुदायों के लोग इसके लिए अपनी स्पष्ट सहमति न दे दें।

नेहरू के दृष्टिकोण पर निष्कर्ष -आधुनिक और समकालीन इतिहासकारों के अनुसार, नेहरू की यह रणनीति पूरी तरह से विफल साबित हुई।

राजनैतिक आत्मसमर्पण: जिस गीत ने 1905 के बंग-भंग आंदोलन में पूरे देश को एकजुट किया था, उसे एक सांप्रदायिक वीटो के आगे टुकड़ों में बांटकर नेहरू ने स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे बड़े प्रतीक को कमजोर कर दिया।

सांप्रदायिकता को रोकने में नाकामी: इस आत्मसमर्पण के बावजूद जिन्ना या मुस्लिम लीग संतुष्ट नहीं हुए। उन्होंने इस संशोधित छोटे संस्करण को भी खारिज कर दिया और 1938 की 'पीरपुर समिति रिपोर्ट' में कांग्रेस पर मुस्लिम विरोधी होने का आरोप लगाना जारी रखा।

तुष्टिकरण की नींव: आलोचकों के अनुसार नेहरू के इस कदम ने देश को यह संदेश दिया कि यदि कोई वर्ग पर्याप्त रूप से सांप्रदायिक दबाव बनाए, तो भारत की मुख्य राष्ट्रीय पहचान और प्रतीकों से भी समझौता किया जा सकता है।

'वंदे मातरम' के प्रति नेहरू की उदासीनता

'सिलेक्टेड वर्क्स ऑफ जवाहरलाल नेहरू' (Volume-6-Second-Series) में दर्ज 15 जून 1948 को डॉ. बीसी रॉय को लिखे गए एक ऐतिहासिक पत्र से यह स्पष्ट होता है कि पंडित जवाहरलाल नेहरू 'वंदे मातरम' को स्वतंत्र भारत का राष्ट्रगान बनाने के प्रति गंभीर या उत्सुक नहीं थे। उन्होंने अपने पत्र में स्पष्ट रूप से तर्क दिया था कि 'वंदे मातरम' वर्तमान संदर्भ में राष्ट्रगान के रूप में बिल्कुल अनुपयुक्त है क्योंकि यह अतीत के संघर्ष का प्रतीक है, जबकि एक राष्ट्रगान को विजय और पूर्णता का प्रतीक होना चाहिए। इसके अतिरिक्त, उनका मानना था कि 'वंदे मातरम' की धुन सैन्य या विदेशी ऑर्केस्ट्रा पर बजाने के अनुकूल नहीं है। इस गीत के प्रति उनकी व्यक्तिगत उदासीनता और दूरी इस वाक्य से सबसे अधिक उजागर होती है जहाँ उन्होंने लिखा, जहाँ तक शब्दों का सवाल है, 'वंदे मातरम' में ऐसी भाषा का उपयोग हुआ है जिसे अधिकांश लोग नहीं समझते हैं। निश्चित रूप से, मैं स्वयं इसे नहीं समझता। यह पूरा संदर्भ इस बात का ऐतिहासिक और प्रामाणिक साक्ष्य है कि भारत के प्रथम प्रधानमंत्री स्वतंत्रता संग्राम के इस सबसे प्रेरक गीत के भाषाई मर्म और भाव से गहराई से नहीं जुड़े थे।

अक्टूबर 1937 में मुस्लिम लीग के लखनऊ अधिवेशन के बाद जवाहरलाल नेहरू द्वारा अपनाई गई तुष्टिकरण की नीति (जिसे आलोचक नेहरू की 'कमजोरी और आत्मसमर्पण की नीति' भी कहते हैं) के कारण ही भारत के इस महान राष्ट्रीय गीत का अंगभंग हुआ और इसे छोटा (Delimit) किया गया।

आलोचकों का तीखा आरोप है कि नेहरू ने जिन्ना के सांप्रदायिक वीटो और मुस्लिम लीग के कट्टरपंथी दबाव के आगे पूरी तरह घुटने टेक दिए थे। जिस 'वंदे मातरम्' ने 1905 के बंग-भंग आंदोलन में अंग्रेजों के खिलाफ पूरे देश को एकजुट किया था, नेहरू ने उसके ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को दरकिनार कर उसे केवल एक मजहबी चश्मे से देखना स्वीकार कर लिया। मुस्लिम लीग को खुश करने के लिए उन्होंने पहले सुभाष चंद्र बोस और रवींद्रनाथ टैगोर के साथ पत्राचार कर एक राजनीतिक ढाल तैयार की, और फिर 29 अक्टूबर 1937 को कांग्रेस कार्यसमिति से एक विवादास्पद प्रस्ताव पारित करवाकर इस गीत के अंतिम छंदों पर कैंची चला दी। नेहरू की इस नीति ने राष्ट्रीय मंचों पर पूरे गीत के गायन पर पाबंदी लगाकर केवल शुरुआती दो पदों की अनुमति दी। इतिहासकारों के अनुसार, नेहरू की यह नीति पूरी तरह आत्मघाती और विफल साबित हुई, क्योंकि इस गंभीर काट-छांट के बाद भी मुस्लिम लीग संतुष्ट नहीं हुई और उसने दिसंबर 1938 के पटना अधिवेशन व पीरपुर रिपोर्ट में इस छोटे संस्करण को भी पूरी तरह खारिज कर दिया। आलोचक मानते हैं कि नेहरू के इस कदम ने देश की राजनीति में एक बेहद खतरनाक परंपरा की नींव रखी, जिसने यह संदेश दिया कि सांप्रदायिक दबाव बनाकर भारत के मुख्य राष्ट्रीय प्रतीकों और स्वाभिमान को भी छोटा कराया जा सकता है।

1950 में संविधान सभा का अंतिम निर्णय

आजादी के बाद जब भारत का संविधान बनकर तैयार हो रहा था, तब राष्ट्रगान को लेकर एक लंबा गतिरोध पैदा हो गया था। एक तरफ देश का एक बड़ा वर्ग 'वंदे मातरम्' को राष्ट्रगान बनाना चाहता था, वहीं दूसरी तरफ नेहरू और आधुनिक झुकाव वाले नेता रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा रचित 'जन गण मन' के पक्ष में थे। नेहरू का तर्क था कि 'जन गण मन' की धुन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बजाने और सैन्य बैंड के लिए अधिक उपयुक्त है।

24 जनवरी 1950 का ऐतिहासिक फैसला: संविधान लागू होने से ठीक दो दिन पहले, 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने इस विवाद पर एक सर्वसम्मत और अंतिम निर्णय सुनाया। उन्होंने सभा के सामने एक आधिकारिक बयान पढ़ा, जिसे बिना किसी मतदान के स्वीकार कर लिया गया।

डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने घोषणा की: गीत 'जन गण मन' भारत का राष्ट्रीय गान होगा। हालांकि, गीत 'वंदे मातरम्', जिसने भारत के स्वतंत्रता संघर्ष में एक ऐतिहासिक भूमिका निभाई है, को 'जन गण मन' के बिल्कुल बराबर का सम्मान और दर्जा दिया जाएगा और इसे भारत का राष्ट्रीय गीत माना जाएगा।

नेहरू और उनके समर्थकों की आपत्ति को देखते हुए संविधान सभा ने यह बीच का रास्ता निकाला। इसके तहत आधिकारिक और कूटनीतिक अवसरों (जैसे विदेशी राष्ट्रध्यक्षों के आगमन या सैन्य परेड) पर 'जन गण मन' बजाने की व्यवस्था की गई, जबकि राष्ट्रीय और सांस्कृतिक महत्व के कार्यक्रमों में 'वंदे मातरम्' को समान रूप से गाने का अधिकार दिया गया।

आजादी के बाद वंदेमातरम् पर कांग्रेस की नीति-

14-15 अगस्त 1947 की तैयारियों को लेकर प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु एकदम सजग थे। इस नाते उन्होंने 4 अगस्त को राजेंद्र प्रसाद को एक पत्र लिखा और कहा, “I am anxious that the programme for the 14th night and for the 15th morning sessions of the Constituent Assembly should be very carefully fixed with every detail noted. If this is not done, certain confusion may arise or objections might be taken.” उन्होंने आगे लिखा, “For the midnight session I suggest : (1) Vande Mataram song, first stanza, sung by a member of the Assembly (either Sucheta Kripalani or someone else) — the person to be informed and prepared.” [Selected Works of Jawaharlal Nehru, Volume 2, JNMF: New Delhi, 1985, p. 85]

यह एक सोचने वाली बात है कि जिस वंंदे मातरम् ने भारत की स्वाधीनता में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, परंतु भारत की स्वाधीनता के दिन उसे एक स्टेंजा तक ही सीमित कर दिया गया। उस दिन वंंदेमातरम का सम्पूर्ण गायन, भारत की स्वाधीनता की लड़ाई के प्रति एक सम्मान बनता, लेकिन प्रधानमंत्री नेहरु ऐसा करने से चूक गए.

स्वाधीन भारत में जब राष्ट्रीय गान को लेकर चर्चा शुरू हुई तो प्रधानमंत्री नेहरु इसे लेकर बेहद उत्साहित थे. मगर उनकी इस विषय में एप्रोच सामूहिक न होकर बहुत ही व्यक्तिगत नजर आती है. वह यह तो मानते थे कि बंदेमातरम का इतिहास भारत के स्वाधीनता से जुडा रहा है और एक प्रकार से उसे ब्रिटिश भारत में राष्ट्रीय गान का दर्जा प्राप्त था, लेकिन वह उसे स्वाधीन भारत के लिए उपयुक्त नहीं मानते थे. इसके पीछे उन्होंने अपने समझ से दो कारण बताये, पहला यह कि बंदेमातरम की भाषा न उन्हें समझ आती है और न ही वह जनता को समझ आएगी. हालाँकि यह एक प्रकार से थोपने वाली बात थी क्योंकि उन्हें जो समझ नहीं आया वह भारत की जनता को भी समझ नहीं आएगा, इसका फैसला उन्होंने स्वतः कैसे ले लिया? दूसरा, उन्हें लगता था कि बंदेमातरम की विदेशों में लोकप्रिय नहीं होगा. वास्तव में यह तर्क नहीं कुतर्क था क्योंकि स्वाधीन भारत की पहली सरकार फिर से अपने राष्ट्रीय प्रतीकों के निर्धारण में विदेशी राष्ट्रों की तरफ देख रही थी।

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हिन्दुस्थान समाचार / सचिन बुधौलिया